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लालू का भविष्य बता देंगे उप चुनाव
सुरेंद्र किशोर
कोई ज्योतिषी तो नहीं,पर अठारह विधान सभा क्षेत्रों के उप चुनाव नतीजे ही यह बता देंगे कि लालू प्रसाद के दल का बिहार विधान सभा के अगले आम चुनाव में कैसा भविष्य रहने वाला है।कांग्रेस जन समर्थन की दष्टि से आगे जाएगी या पीछे हटेगी।बिहार विधान सभा का अगला आम चुनाव तो करीब एक साल बाद होने वाला हैं,पर अगले महीने राज्य विधान सभा के 18 क्षेत्रों में उप चुनाव होंगे।कई विधायकों के लोक सभा के लिए चुन लिए जाने व कुछ विधायकों द्बारा दल बदल किए जाने के कारण ये सीटें खाली हुई हैं।हाल के लोक सभा चुनाव में बिहार में सिर्फ 4 सीटों पर सिमट जाने के कारण लालू प्रसाद इन दिनों उदास हैं और उन्होंने एक बार फिर येन केन प्रकारेण अपनी राजनीतिक ताकत बढèाने की कसरत शुरू कर दी है।राम विलास पासवान की भी वही स्थिति है।दूसरी आेर राजग का मनोबल बढèा हुआ है क्योंकि उसे लोक सभा की 4० में से 32 सीटें मिलीं हैं।यदि उसने बांका और सिवान में टिकट वितरण में होशियारी की होती तो उसे दो सीटें और भी मिलतीं।सिवान में जातीय समीकरण के चक्कर और बांका में अहं के टकराव के कारण राजग को नुकसान उठाना पड़ा। कई बार आम चुनावों में विजयी होने के बावजूद सत्ता दल को बाद के किन्हीं उप चुनावों में पराजय मिलने के बाद सत्ता दल को राजनीतिक ढलान का मुंह देखना
पड़ता है।क्या बिहार में अगले महीने के उप चुनावों के बाद कोई ऐसा ही राजनीतिक घटनाक्रम शुरू होने वाला है ? क्या लालू प्रसाद इन्हीं उप चुनावों के जरिए अपने राजनीतिक पुनर्जीवन की शुरूआत की उम्मीद कर सकते हैं ?प्रतिपक्ष यदि कुछ पिछले उदाहरणों के सहारे ऐसी उम्मीद कर रहा है तो कोई आश्चर्य की बात भी नहीं है।पर क्या इस बार भी ऐसा ही कुछ हो सकता है ?वैसे नीतीश की राजनीति को पराजित करना अभी कठिन ही लगता है। प्रेक्षकों के अनुसार प्रतिपक्ष को अभी बिहार में किसी बड़ी राजनीतिक सफलता की उम्मीद नहीं ही करनी चाहिए।पर कोशिश करने में क्या हर्ज है ?लालू प्रसाद और राम विलास पासवान चाहते हैं कि उप चुनावों में प्रतिपक्ष मिलकर राजग के खिलाफ उम्मीदवार खड़ा करे।पर कांग्रेस की स्थानीय राज्य शाखा के कार्यकारी अध्यक्ष डा.समीर कुमार सिंह ने कह दिया है कि कांग्रेस सभी 18 सीटों पर चुनाव लड़ेगी।कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी जगदीश टाइटलर नौ अगस्त को पटना पहुंच कर इस मामले में भी राज्य शाखा को दिशा निदेश देंगे। यदि कांग्रेस ने अलग से चुनाव लड़ा तो उससे लालू प्रसाद व राम विलास पासवान को निराशा ही होगी।पर संभवतः राजद व लोजपा मिलकर उप चुनाव लड़े।यानी अभी तो यही लगता है कि इस बार भी वैसा ही चुनावी गठबंधन बनेगा जैसा गत लोक सभा चुनाव के समय बना था।हालांकि कल के बारे में कोई नहीं जानता।पर सवाल है कि गत लोक सभा चुनाव के बाद बिहार की राजनीतिक स्थिति में कौन सा फर्क आया है जिसका लाभ राजद-लोजपा को मिलने वाला है ?कोई महत्वपूर्ण फर्क तो नजर नहीं आ रहा है।हां,स्कूली शिक्षकों के आंदोलन से जरूर राजग और नीतीश सरकार थोड़ा दबाव में है। याद रहे कि पिछले दिनों नीतीश सरकार ने प्राप्तांकों यानी माक्र्स के आधार पर राज्य भर में करीब दो लाख स्कूली शिक्षकों की बहालियां कर लीं।शिक्षक नियोजन नियमावली , 2००6 के अनुसार जब उनकी मूल्यांकन परीक्षा का समय आया तो शिक्षकों ने उस प्रस्तावित परीक्षा में शामिल होने से ही मना कर दिया।वे आंदोलन करने लगे और प्रतिपक्ष ने उन्हें शह देना
शुरू कर दिया।बिहार सरकार कह रही है कि निश्चित वेतन पर बहाल इन शिक्षकों के मूल्यांकन परीक्षा में विफल हो जाने पर भी उन्हें नौकरी से नहीं निकाला जाएगा।पर उन्हें वेतन वद्घि का लाभ नहीं मिलेगा।उन्हें इस बीच खुद को बेहतर बनाना होगा।उस मूल्यांकन परीक्षा में पहली कक्षा से आठवीं कक्षा तक के स्तर के ही प्रश्न होंगे।पर उन प्रश्नों के जवाब देने के लिए भी मूल्यांकन परीक्षा में बैठने को वे तैयार नहीं हो रहे हैं।
दूसरी आेर शिक्षक, उनके नेतागण और प्रतिपक्षी दल इन नव नियुक्त शिक्षकों को अब किसी मूल्यांकन परीक्षा से गुजरे बिना ही पूर्ण सरकारी वेतनमान देने की मांग के समर्थन में आंदोलन कर रहे हैं।इसको लेकर राजनीतिक व शैक्षणिक माहौल गर्मा गया है।इन शिक्षकों की बहाली का लाभ गत लोक सभा चुनाव में राजग को मिला था।बिहार में बहुत वर्षों के बाद इतनी अधिक संख्या में लोगों को रोजगार मिला था ।दूसरी आेर तब राजद इन्हीं शिक्षकों के बारे में कह रहा था कि इनकी बहाली जाली माक्र्स सीटों के आधार पर गलत तरीके से हुई है।राजग तब इन शिक्षकेां के बचाव में था।पर अब स्थिति बदली हुई है। नव नियुक्त शिक्षक गुस्से में हैं।पर आम लोगों की इनके साथ कम ही सहानुभूति देखी जा रही है।अगले उप चुनाव में इन शिक्षकों के मामले का कितना असर पड़ता है,यह देखना दिलचस्प होगा।पर कुछ असर तो पड़ ही सकता है। दूसरी आेर सरकारी भ्रष्टाचार पर काबू पाने में नीतीश सरकार की विफलता का लाभ अगले उप चुनावों में उठाने की कोशिश प्रतिपक्ष कर सकता है।क्योंकि जनता सचमुच सरकारी भ्रष्टाचार से पीड़ित है।पर भ्रष्टाचार के मामले में राजद-लोजपा का रिकार्ड राजग की अपेक्षा खराब ही रहा है।दूसरी आेर मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि भ्रष्ट लोक सेवकों की संपत्ति जब्त करने के उददेश्य से बिहार विधान सभा से विधेयक पास करा कर उसे मंजूरी के लिए केंद्र सरकार को छह माह पहले ही भेज दिया गया है।पर केंद्र सरकार उस पर अपनी मंजूरी नहीं दे रही है।इससे राज्य में भ्रष्टाचार के खिलाफ कारगर कार्रवाई करने में दिक्कत हो रही है।मुख्य मंत्री अपने अनुभवों के आधार पर यह भी कह रहे हैं कि भष्टाचार बिहार के विकास में सबसे अधिक बाधक बन गया है। बिहार सरकार चाहती है कि भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफतार लोक सेवकों को अदालतें जल्द से जल्द सजा दे।उनकी नौकरी और पेंशन समाप्त हो।उनकी नाजायज संपत्ति जब्त हो।उनके मामले की सुनवाई त्वरित अदालतों के जरिए हो।तभी जाकर उस सजा का अन्य भ्रष्ट लोक सेवकों पर असर पड़ेगा। यानी राजग इस मुददे को कांग्रेस के पाले में डाल रहा है।उधर राज्य में विकास व अपेक्षाकत बेहतर कानून व्यवस्था के कारण राजग को मतदाताआें से एक बार फिर समर्थन मिलने की संभावना कई हलकों में जताई है।याद रहे कि गत लोक सभा चुनाव के तत्काल बाद फतुहा विधान सभा चुनाव क्षेत्र में उप चुनाव हुआ था।राजद और लोजपा ने मिलकर वहां उम्मीदवार खड़ा कराया।फिर भी वहां राजग ही विजयी रहा।लोक सभा चुनाव से पहले और नीतीश कुमार के बिहार में सत्ता में आने के बाद बारी -बारी से तीन लोक सभा और तीन विधान सभा चुनाव क्षेत्रों के उप चुनाव हुए थे।सबमें सत्ताधारी राजग की ही जीत हुई। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार लालू प्रसाद ने पिछड़ों को सामंतवादी प्रवति वाले सवण्रों का भय दिखा कर पंद्रह साल उनके वोट लिए।अब लगता है कि नीतीश कुमार लालू प्रसाद के कथित जंगल राज की वापसी के खतरे का भय दिखा कर अगले कुछ साल तक लोगों के मत लेते रहेंगे।क्या ऐसा हो सचमुच पाएगा ?अगला उप चुनाव इसकी आेर पक्का संकेत दे देगा।इस लिहाज से यह महत्वपूर्ण उप चुनाव साबित हो सकता है। जिन विधान सभा चुनाव क्षेत्रों में अगले माह उप चुनाव होंगे , वे हैंं बगहा,मुंगेर,बेगू सराय,सिमरी बख्तियार पुर,कल्याण पुर,नौतन,त्रिवेणी गंज,औराई,धोरैया,घोसी,अररिया,राम गढè,बोध गया,चैन पुर,वारिस नगर,बोचहा,फुलवारी शरीफ और चेनारी। इन 18 विधान सभा चुनाव क्षेत्रों में से 13 विधान सभा क्षेत्रों के विधायक गत लोक सभा चुनाव में विजयी हो गये। जाहिर है कि इनमें से अधिकतर राजग के ही हैं।इस कारण ये सीटें खाली हुईं हैं।फुलवारी शरीफ के राजद विधायक श्याम रजक लोस चुनाव के बाद जदयू में शामिल हो गये,इसलिए उन्होंने इस्तीफा दे दिया।राजग उन्हें वहां से अपना उम्मीदवार बनाएगा।राजद के रमई राम ने अपनी विधान सभा सीट छोड़कर कांग्रेस से लोस चुनाव लड़ा था।पर पराजित होकर वे हाल में जदयू में मिल गये। विधायक ललन पासवान ने जदयू छोड़ कर राजद से सासाराम में मीरा कुमार के खिलाफ चुनाव लड़ा था।ललन पासवान हार गये। अब देखना है कि इन 18 विधान सभा चुनाव क्षेत्रों में विभिन्न दल परिवारवाद के आधार पर उम्मीदवार खड़ा करते हैं या तपे तपाए कार्यकत्र्ताआें को टिकट
देते हैं।नीतीश कुमार ने अब तक आम तौर पर अपने दल के टिकट वितरण मंे परिवारवाद को अस्वीकार ही किया है। पर इस बार उनके दल के कतिपय दबंग नव निर्वाचित सांसदों की आेर से उनके परिजनों को ही टिकट देने का दबाव बनेगा।देखना है कि नीतीश कुमार अपने ही बनाए मापदंडों को इस बार भी कायम रखते हैं या परिवारवादियों के दबाव में आ जाते हैं !चूंकि पिछले चुनाव में अपराधी व बाहुबली बुरी तरह पराजित हुए ,इसलिए यह उम्मीद तो की ही जा रही है कि इस बार विभिन्न माफियावादी राजनीतिक दल भी माफिया तत्वों से दूर ही रहेंगे।
 
 
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