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एस्मा को हाईकोर्ट में चुनौती देगा वर्कर्स फ्रंट

लखनऊ .कोरोना महामारी से निपटने में पूरे तौर पर विफल रही और कारपोरेट की सेवा में लगी आरएसएस-भाजपा की सरकार अंदर से बेहद डरी हुई और यहीं वजह है कि वह आपातकाल की ओर बढ़ रही है. यहां तक कि उत्तर प्रदेश में एस्मा लगाकर उसने कर्मचारियों से सांकेतिक प्रदर्शन तक का अधिकार छीन लिया है. यह प्रतिक्रिया वर्कर्स फ्रंट के अध्यक्ष दिनकर कपूर ने उत्तर प्रदेश सरकार के कार्मिक विभाग के अपर मुख्य सचिव द्वारा प्रदेश में एस्मा लगाने पर व्यक्त की.

    उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी के समय जनता को राहत देने के लिए जब प्रदेश के कर्मचारी अपनी जान की बाजी लगाकर लोगों की जिंदगी बचा रहे थे, अपने परिवारों तक से न मिलकर कोरोना पीड़ितों की मदद कर रहे थे और यहां तक कि रविवार और अवकाश में भी दिन-रात काम कर रहे थे. उस समय केन्द्र सरकार के आदेश के बाद राज्य सरकार ने भी सभी विभागों, निगमों व प्राधिकरणों के कर्मचारियों के महंगाई भत्ते पर डेढ़ साल के लिए रोक लगा दी. इतना ही नहीं उसने एक कदम और आगे बढ़कर यातायात, आवास, सचिवालय, पुलिस सेवा जैसे अन्य भत्तों को पहले स्थगित किया और बाद में उसको पूर्णतया खत्म कर दिया. स्वभावतः इससे पूरे मनोयोग से राष्ट्रसेवा में लगे कर्मचारियों के मनोबल को गहरा धक्का लगा और उन्होंने अपने अंदर पैदा हुए आक्रोश की अभिव्यक्ति अपने काम को मुस्तैदी से करते हुए महज बांह पर काली पट्टी बांधकर किया. यहीं नहीं राज्य कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष अजय सिंह और शिक्षक कर्मचारी समन्वय समिति के संयोजक अमरनाथ यादव ने विभिन्न तिथियों पर सांकेतिक विरोध का ही कार्यक्रम रखा था. क्योंकि कोरोना महामारी की परिस्थितियों को देखते हुए कर्मचारी संगठन और कर्मचारी भी आवश्यक सेवाओं में व्यवधान नहीं उत्पन्न करना चाहते है. बावजूद इसके सरकार ने उत्तर प्रदेश अत्यावश्यक सेवाओं का अनुरक्षण अधिनियम 1966 की घारा 3 की उपघारा 1 के द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रयोग करते हुए अगामी छः माह के लिए हड़ताल पर रोक लगा दी. लेकिन इतने से ही इस डरी हुई सरकार को संतुष्टि नहीं मिली कल उसने एक और आदेश जारी करके धरना, सांकेतिक प्रदर्शन एवं प्रदर्शन को भी प्रतिबंधित कर दिया. कार्मिक विभाग अनुभाग 4 द्वारा जारी इस आदेश में कहा गया कि कोई भी कर्मचारी यदि इसमें भाग लेता है तो उसके विरूद्ध कार्यवाही की जायेगी और मान्यता प्राप्त संघों की मान्यता समाप्त कर दी जायेगी.

उन्होंने कहा कि यह संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार 19 का उल्लंधन है जो हमें अभिव्यक्ति की आजादी देता है. यह अतंराष्ट्रीय श्रम संगठन के 1930 में जबरी काम कराने के संकल्प और 1948 में पारित श्रम संगठन बनाकर अपनी बात कहने के संकल्प का उल्लंधन है. गौरतलब है कि भारत सरकार इन संकल्पों से बंधी है और यह उसके लिए बाध्यकारी है. उन्होंने कहा कि सांकेतिक प्रदर्शन से भी रोकने का सरकार का फैसला मनमाना और विधि विरूद्ध है जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी जायेगी.

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