जनादेश

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स्वास्थ्य विशेषज्ञों की बिना राय लिए किए फैसले !

राम दत्त त्रिपाठी 

भारत के ग्रामीण और क़स्बाई  इलाक़ों में Covid_19 कोविड 19  महामारी फैलने के  लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ केंद्र सरकार के एकतरफ़ा निर्णय ज़िम्मेदार है.  अगर लम्बे लाकडाउन से पहले प्रवासी कामगारों को उनके घर गांव जाने दिया गया होता तो यह स्थिति नहीं आती. देश में डाक्टरों की तीन बड़ी संस्थाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सम्बोधित संयुक्त पत्र में यह बातें कही हैं. पत्र में तत्काल सार्वजनिक स्वास्थ्य आयोग बनाने पर बल दिया गया है और  बीमारी की रोकथाम के लिए विशेषज्ञों को शामिल करने समेत कई ठोस सुझाव दिये गये हैं .साथ ही समस्त मानव समुदाय को चेतावनी भी कि प्रकृति की चेतावनी के संकेतों पर ध्यान दें , समस्त जीव जंतुओं के कल्याण का ध्यान रखें , अपने रहन सहन और स्वास्थ्य संबंधी नीतियों में बदलाव लायें , अन्यथा भविष्य में और भी ख़तरनाक बीमारी आने वाली हैं .

यह तीन संस्थाएं हैं  इंडियन पब्लिक हेल्थ एसोसिएशन (IPHA ), इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ प्रिवेंटिव ऐंड सोशल मैडिसन (IAPSM) और  इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ एपिडेमिलॉजिस्ट्स (IAE) . 


इन तीनों संस्थाओं ने प्रधानमंत्री को लिखे एक संयुक्त पत्र में कहा है कि यदि देश व्यापी कठोर लॉक डाउन लागू करने से पहले महानगरों में काम करने वाले श्रमिकों को उनके घर जाने दिया गया होता तो आज यह नौबत नहीं आती . इस पत्र में कहा गया है कि अब ये प्रवासी मज़दूर महानगरों से ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में कोविड 19 बीमारी को ले जा रहे हैं . अब चिंता की बात ये भी है कि इन इलाकों में सार्वजनिक स्वास्थ्य का ढांचा यानी अस्पताल और इलाज की सुविधाएं बहुत कमज़ोर है .विशेषज्ञ तो छोड़िए लखनऊ के फुटपाथ पर रहने वाले दार्शनिक संत राम ने भी कहा  कि सरकार अगर सबको होली पर घर भेज देती और कहती कुछ दिन वहीं रहो तो भी यह नौबत नहीं आती. लोग आराम से खुले में  रहते और रबी की फसल काटकर मज़दूरी से गुज़ारा करते. 


वास्तव में वेदों और उपनिषदों में पहले से सब कुछ कहा गया है , महात्मा गांधी ने एक सौ दस साल पहले हिन्द स्वराज में भी लिखा लेकिन मुनाफ़ाख़ोरी पर आधारित औद्योगिक सभ्यता के दबाव में सरकारें उन पर अमल नहीं करतीं . तमाम नई नई बीमारियों के बाद भी नीति निर्माताओं की ऑंखें नहीं खुलतीं . भारत में देश व्यापी लॉकडाउन जब 25 मार्च को लागू किया गया था तब कोरोना वायरस संक्रमण के केवल छह सौ छह मामले थे . अब इन मामलों की संख्या लगभग दो लाख हो गई है , जबकि पूरी तरह से जॉंच नहीं हो पा रही . पॉंच हज़ार से ज़्यादा लोग जानें गंवा चुके हैं .

इस पत्र में कहा गया है कि संभवतः सरकार ने जिन लोगों की सलाह से अचानक देश व्यापी और कठोर लॉक डाउन करने का निर्णय किया उनको सार्वजनिक स्वास्थ्य और महामारी की रोकथाम का बहुत कम अनुभव था. इस निर्णय में ज़्यादा दख़ल प्रशासनिक अधिकारियों का था जिन्होंने महामारी सार्वजनिक स्वास्थ्य,  प्रिवेंटिव मेडिसिन और सामाजिक विज्ञान के जानकार लोगों से परामर्श न के बराबर किया . 

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि लाक डाउन के इस निर्णय का मानव जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है और अर्थव्यवस्था भी चौपट हुई है .सरकार की नीतियां बार – बार बदलीं  और बहुत तर्क संगत भी नहीं थीं . ये नीतियां बनाने वालों की गलती थी .इन संस्थाओं की ओर से सरकार को सलाह दी गई है कि कम से कम अब केन्द्र राज्य और जिला स्तर पर संयुक्त समितियां बनायी जाए जिनको सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमारियों की रोकथाम और समाजविज्ञान का अनुभव हो . 

इन विशेषज्ञों ने यह भी सलाह दिया है कि सरकार के पास कोरोना वायरस से संबंधित जो जानकारियां हैं उन्हें सबको उपलब्ध कराया जाए . तत्काल एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आयोग बनाया जाए जिसके अंदर विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के कार्य कारी दल हों और जो सरकार को सलाह दे.इन विशेषज्ञों ने कहा है कि ये बीमारी के फैलाव के रोकने के और रोकथाम और इलाज की देख रेख करेगा .इसके साथ साथ यह भी ज़रूरी है कि लोगों को अपना पारिवारिक और सामाजिक दायरा बरकरार रखने की सुविधा दी जाए क्योंकि अकेलेपन से तनाव चिंता और अवसाद की बीमारियां हो जाती हैं .याद दिला दें कि डिप्रेशन से अनेक लोगों ने आत्म हत्याएं भी की .


इन विशेषज्ञों ने यह भी सलाह दी है कि जिन लोगों को फ्लू जैसी बीमारी है अथवा सॉंस की बीमारी है , उन पर विशेष नज़र रखें .इन लोगों ने यह भी कहा है कि कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों को खोज कर और उनको अलग रखने की व्यवस्था की जाये .जाँच पड़ताल में प्राइवेट डाक्टरों अस्पतालों का भी सहयोग लिया जाए . इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ज़्यादातर मरीज़ों को अस्पताल में भर्ती करने की ज़रूरत नहीं है और वो शारीरिक अथवा दैहिक  दूरी बनाए रखते हुए घर पर रह कर भी इलाज कर सकते हैं .


रिपोर्ट में साफ़ साफ़ कहा गया है कि अगर प्रवासी कामगारों को महानगरों में महामारी फैलने से पहले अपने गॉंव घर जाने दिया जाता तो वे बीमारी की चपेट में आने और उसे गाँव में फैलाने बच जाते .सरकार की नीतियों की गलती से ही अब ये बीमारी समाज में बड़े पैमाने पर फैल गई है , जबकि न तो इसकी कोई वैक्सीन है न कोई इलाज उपलब्ध है और न ही निकट भविष्य में उपलब्ध होने की संभावना है .

लॉकडाउन की वजह से पूरे देश की अर्थव्यवस्था चरमरा गई ख़ास करके ग़रीब और कमज़ोर लोगभुखमरी के कगार पर आ गए है .लाखों छोटे बड़ी फैक्ट्रियां और कुटीर  उद्योग बंद होने से करोड़ों लोगों के काम धंधे चौपट हो गए .इस रिपोर्ट में कहा गया कि देश व्यापी लॉकडाउन के बजाय उन क्षेत्रों में प्रतिबंध लगाने चाहिए था , जहाँ पर बीमारी का इस असर ज़्यादा है .

इस पत्र में इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है कि इस संक्रमण से प्रभावित लोगों के साथ सहानुभूति और आदर के साथ पेश आना चाहिए न कि उन्हें दाग़ी समझ कर उनका सामाजिक बहिष्कार या तिरस्कार.इसके लिए मीडिया और लोकल संगठनों व संस्थाओं को भी सतर्क रहने की सलाह दी गई है .रिपोर्ट में इस बात पर वे बल दिया गया है इस बीमारी की रोकथाम और छानबीन जाँच पड़ताल में लगे लोगों को निजी सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराया जाये .


रिपोर्ट में यह कहा गया है कि इस समय सार्वजनिक स्वास्थ्य के ढांचे को मज़बूत करने की ज़रूरत है. याद दिला दें कि सरकारी अस्पतालों में मेडिकल कालेजों में डाक्टरों नर्सों व कर्मचारियों की बेहद कमी है . कई सालों से सरकार अपनी सेवाएँ ठेकेदारों के ज़रिये कम वेतन पर काम करना रही है . सरकार बीमा कंपनियों के ज़रिये बड़े प्राइवेट अस्पतालों को बिज़नेस दे रही है , जो इस संकट में काम नहीं आये . बड़ी फार्मास्यूटिकल कम्पनियों के दबाव में सरकार सिर्फ़ एलोपेथी को बढ़वा देती है. पर जब कुछ नहीं सूझा तब मजबूरी में आयुष मंत्रालय की ओर से रोग प्रतिरोधक क्षमता बथाने के लिए आयुर्वेदिक काढ़ा और जड़ी बूटियों की सलाह दी गयी. मीडिया स्वराज़ ने इससे पहले ही वैद्य के माध्यम से परम्परागत  उपचार पर बल दिया था. 


 संयुक्त रिपोर्ट में समस्त मानव समुदाय को भी आगाह किया गया है कि वह प्रकृति की तरफ़ से दी जा रही चेतावनी को समझें और तुरंत प्रकृति के संरक्षण के लिए ठोस और कारगर उपाय अपनाए .इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांत के अनुसार समस्त मानव समुदाय और जीव जन्तुओं के बीच सामंजस्य स्थापित किया जाए . सभी तरह के जीवों के प्रति आदर की भावना रखी जाए और उनके भी रहन सहन का ख्याल रखा जाए .याद दिला दें कि चीन समेत तमाम देशों में चौड़ी सड़कों , कारख़ानों और शहरों के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों को काटा गया . खेती की ज़मीनें ली गयीं . वहाँ रहने वाले जीव जंतुओं के बेघर कर दिया गये . फिर वे मानव आबादी में घुसे .अंधाधुंध औद्योगीकरण ने जल , जंगल , ज़मीन , वायु आसमान सबको प्रदूषित किया, जो बीमारियों का मूल कारण है .


रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि इस महामारी के बाद भी है हम लोग नहीं चेते और अपने जीवन शैली और नीतियों विशेष करके स्वास्थ्य की नीतियों में बदलाव नहीं किया तो आगे बहुत बुरे दिन आने वाले हैं और मानव समुदाय को उसकी क़ीमत चुकानी पड़ेगी और इससे भी ज़्यादा ख़तरनाक मंजर मानव समुदाय को देखने पड़ेंगे.

यहाँ यह भी याद दिलाने की ज़रूरत है कि भारत में कोरोना बीमारी ने जनवरी में ही दस्तक दे दी थी और ख़ास करके चीन में बीमारी के मुख्य केंद्र वुहान शहर से जिन लोगों को सरकार विमान द्वारा लाई थी उनमें बीमारी के लक्षण मिले थे .उसके अलावा जो लोग चीन , इटली , योरप , अमेरिका की विमान यात्रा करके लौटे थे वह भी कोरोना वायरस का संक्रमण लेकर लौट रहे थे .आगरा में से बहुत से लोग इटली एक व्यापारिक मेले में शामिल होने गए थे और बीमारी लेकर लौटे . इसी तरह चीन से भी बहुत सारे लोग वुहान से लौटे हैं जिनके वहाँ व्यापारिक या कारोबार के रिश्ते हैं.  चीन ने बीमारी के केंद्र  वुहान शहर में सख़्ती से लॉक डाउन किया, बाहरी दुनिया से सम्पर्क काट दिया, दूर इलाक़े में अस्थायी अस्पताल में  इलाज किया . घर – घर लोगों की जाँच की और सुविधाएँ पहुँचाई , भारत में सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया.

.कई लोगों का कहना है कि इसका एक बड़ा कारण अहमदाबाद में अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की रैली आयोजित करना था उसके अलावा मध्य प्रदेश में सरकार गिरानाथा .  विरोधी दलों के नेताओं ने फ़रवरी से ही चेतावनी देनी शुरू कर दी थी . लेकिन सरकार ने अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर समुचित निगरानी की व्यवस्था नहीं की अगर हवाई अड्डे पर ही लोगों को रोक कर उन्हें आस पास के होटलों में रख दिया जाता और उनकी जाँच की जाती तो ये लोग बीमारी को अपने घरों और मोहल्लों में नहीं ले जा पाते .विदेश से आने वाले ये लोग मोटे तौर पर महानगरों में रहते है और वहाँ आसानी से उनकों उनके जाँच पड़ताल करके क्वारंटाइन किया जा सकता था जो नहीं किया गया .25 मार्च तक सारी गतिविधियां चलती रही सामान्य ढंग से . प्रवासी कामगार इन संक्रमित लोगों के सम्पर्क में आए जो लोग विदेश से लौटे थे . 

लॉक डाउन लागू होने पर सभी ने स्वागत किया,  सहयोग दिया और ये समझा कि प्रधानमंत्री के वादे के अनुसार 3 हफ़्ते में बीमारी क़ाबू में आ जाएगी . इसलिए थाली घंटे घड़ियाल भी बजाए और उनके निर्देशों का पालन किया .इसके बाद जब लॉकडाउन बढ़ा छोटे-  छोटे उद्योग धंधे सब बंद होने लगे और प्रवासी कामगारों को कारखानों से दफ्तरों से या घरों से कार्यमुक्त कर दिया गया ,  कुछ दिनों में इनके पास खाने पीने का भी पैसा नहीं रहा . मकान मालिकों ने भी किराया न देने पर निकालना शुरू किया . सबसे बड़ी बात कि जिन हालात में ये लोग वहाँ छोटे छोटे कमरों में कई – कई लोग रहते हैं सार्वजनिक नल पर नहाते हैं और सार्वजनिक शौचालयों में लंबी लाइन लगाकर खड़े होते हैं वहाँ शारीरिक दूरी के नियम का पालन संभव नहीं .

ये लोग अपने घर परिवार से बहुत दूर थे इनके माँ बाप बीवी बच्चे गांवों में या छोटे कस्बों में थे , तब इन लोगों ने शहरों में रह रहे है अपने सगे संबंधियों को वापस घर बुलाने पर ज़ोर देना शुरू किया . लेकिन केंद्र सरकार न केवल रेल यातायात , बस और निजी कार का भी यातायात बंद कर दिया .इसकी वजह से लोगों को हज़ारों रुपया किराया देकर ट्रकों में जानवरों की तरह भरकर आने को विवश होना पड़ा . लाखों लोग लोग पैदल , साइकिल आटो रिक्शा से चले .सरकार ने जब पैदल चलने पर रोक लगायी तो बहुत लोग रेल पटरियों के सहारे आने लगे जिसमें औरंगाबाद के दर्दनाक दुर्घटना हो गई है . TV पर अख़बारों में सोशल मीडिया पर इन की तस्वीरें आयी तब भी केंद्र सरकार या रेल मंत्रालय को रहम नहीं आया .


लोग रास्तों में दम तोड़ते रहे . प्रबल जनमत का बहुत दबाव पड़ा तो श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाने का ऐलान किया गया .उसके नियम भी इतने जटिल कि पहले भेजने वाले राज्य पूरी सूची बनाये , जिन राज्यों में जाना है उत्तर प्रदेश बिहार जैसे वहाँ के DM उसका अनुमोदन करें . राज्य सरकार ट्रेन का पैसा जमा करे उसके बाद प्रवासी कामगार निजी डॉक्टरों से कोरोना मुक्त का सर्टिफ़िकेट बनवाए . तब जाकर उन्हें ट्रेनों में चढ़ने का मौक़ा मिला . रेलों में घोरअव्यवस्था से ट्रेनों में ही क़रीब सौ लोगों ने दम तोड़ दिया . पहली बार ये देखा कि ट्रेनें अपने गंतव्य से बिलकुल विपरीत दिशा में हज़ार किलोमीटर दूर चली गईं .

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने इमरान ख़ान ने तो एक बयान देकर अपने सरकार की गलती क़बूल कर ली है कि अचानक इतना सख़्त लॉकडाउन नहीं करना चाहिए था  .भारत में केंद्र सरकार , रेलवे मंत्रालय या राज्य सरकारों में इतना नैतिक साहस भी नहीं है कि वो अपनी गलती स्वीकार करके जनता से माफ़ी माँगे. अब भी समय है कि सरकार इस महामारी से निबटने  और अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए साझा मंच तैयार करे और देश में आम सहमति बनाकर काम करे.

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