जनादेश

जब तक जिए शान से जिये चन्द्रशेखर असली समस्या तो बुद्धि है सादगी में मुस्कुराता चेहरा यानी चंद्रशेखर गांव ,गरीब और पेड़ के लिए सत्याग्रह गुजर जाना एक दरख्त का जोमैटो में चीन का निवेश रुका कोई क्यों बनती है आयुषी क्या समय पर हो जाएगा वैक्सीन का ट्रायल हरफनमौला पत्रकार की तलाश काफ़्का और वह बच्ची ! कोरोना ने चर्च भी बंद कराया सरकार अपनी जिम्मेदारियों से क्यों भाग रही है? वसूली का दबाव अलोकतांत्रिक विपक्षी दलों ने कहा ,राजधर्म का पालन हो पुर्तगाल ,गोवा और आजादी कब शुरू हुई बाबाओं की अंधविश्वास फ़ैक्ट्री कोरोना से बाल बाल बचे नीतीश आंदोलनकारी या अतिक्रमणकारी ओली के बाद प्रचंड की भी राह आसान नही खामोश हो गई सितारों को उंगली से नचाने वाली आवाज

एक थे जॉर्ज फर्नांडीज !

के विक्रम राव

जॉर्ज फर्नांडिस की 90वीं जयंती (3 जून 2020) है. गत वर्ष 29 जनवरी को वे चले गए. कई साथियों ने अनुरोध किया है कि कुछ लिखूं. जॉर्ज पर न्यूज़प्रिंट के लाखों रीम्स और फिल्मरोल के हजारों मीटर प्रयुक्त हो चुके हैं. फिर भी दो अनजान, अथवा कम ज्ञात घटनाओं का आज उल्लेख करना समीचीन होगा.

मेरा मानना है कि यदि फ़रवरी 1967 में जॉर्ज की मेहनत रंग पकड़ती तो भारत को गैर-कांग्रेसी प्रधान मंत्री दस वर्ष पूर्व ही मिल जाता. मार्च 1977 (एमर्जेंसी के बाद) तक बाट नहीं जोहना पड़ता. यह वाकया खुद जॉर्ज ने मुझे बताया था. उनके करीब के साथी भी जानते हों, शायद. चूँकि यह भ्रूणावस्था में ही निष्फल हो गई थी, अतः भुला दी गई. चर्चित नहीं हो पाई. सफल बगावत ही क्रांति कहलाती है. विफल इन्कलाब को मात्र विद्रोह कहते हैं. बात चौथे लोकसभा (1967) चुनाव की है. कांग्रेस के दिग्गज एस. के. पाटिल, के. कामराज, अतुल्य घोष आदि हार गये थे. इन सबसे इंदिरा गाँधी को आशंका रहती थी. इंदिरा तब तक “गूंगी गुड़िया” (लोहिया के शब्दों में) थीं. शनैः शनैः गुनगुनाना आ रहा था. कांग्रेस पार्टी को तब लोकसभा की कुल 520 सीटों में से 283 मिली थीं. बहुमत से केवल 22 अधिक. राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन थे जो प्रधान मंत्री से रुष्ट थे, क्योंकि उन्हें दूसरी बार निर्वाचित होने का मौका देना तय नहीं था. उधर कांग्रेस पार्टी में पचास से अधिक सांसद इंदिरा गाँधी के नेतृत्व से खफा भी थे. तभी कन्नौज से दुबारा जीतकर आये डॉ. राममनोहर लोहिया ने गैरकांग्रेसवाद की लहर को आंधी में परिवर्तित कर दिया था. उधर मध्य प्रदेश, तमिल नाडू और केरल में कांग्रेस धुल गयी थी. राजस्थान में पुराने कांग्रेसी राज्यपाल बाबू सम्पूर्णानन्द ने स्वतंत्र पार्टी की महारानी गायत्री देवी को प्रवंचना करके काट दिया था, मोहनलाल सुखाड़िया को रात ढले चुपचाप मुख्यमंत्री की शपथ दिलवा दी. जयपुर में खूनखराबा और गोलीबारी हुई. फिर भी उस दौर में चंडीगढ़ से गुवाहाटी तक रेलयात्री कांग्रेस-मुक्त भूमि से यात्रा करता था. लखनऊ में संयुक्त विधायक दल बना. कांग्रेसी मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्त को हटाकर, केवल डेढ़ दर्जन विधायक लेकर चरण सिंह मुख्यमंत्री बन गए. गुप्ताजी बीस दिनों के लिए, तो चरण सिंह ग्यारह माह के लिए.

उधर लोहिया इंदिरा गाँधी को गिरा देने का यत्न करते रहे. उन्होंने जॉर्ज को यशवंतराव चव्हाण के पास भेजा कि बीस-बाईस सांसदों को लेकर निकल आओ. प्रधान मंत्री पद प्रतीक्षा में है. अगले दशकों में ऐसे ही सत्ता परिवर्तन 1979 में जनता पार्टी (मोरारजी देसाईं) और 1989 कांग्रेस (राजीव गाँधी) के बाद किया गया था . इससे चरण सिंह तथा चंद्रशेखर के नसीब खुल गये थे.

जॉर्ज ने मुझे बाद में बताया था कि चव्हाण सुनकर पहले तो बड़े प्रफुल्लित हुए थे, पर फिर सशंकित हो गए थे, मुहावरा याद याद करके कि कप और ओंठ के दरम्यान प्याला छूट भी सकता है. उनके पूछने पर जॉर्ज ने आश्वस्त किया कि कुल संख्या 270 तक पहुँच जायेगी. बाद में क्षेत्रीय पार्टियाँ भी महानदी में झरने बनकर मिल जाएँगी. समस्त समर्थक-सांसदों से मिले बिना चव्हाण कूदने को तैयार नहीं हुए . हालाँकि काफी समय वे प्रयासरत भी रहे.

चव्हाण को रिझाने में मराठा गौरव का वास्ता दिलाया गया कि इस बार अहमद शाह अब्दाली की हार पानीपत (हस्तिनापुर) में तय है. पर सतारा के इस मराठा ने जॉर्ज का डाला चारा नहीं छुआ. सह्याद्री का यह शेर हिमालय को चीन की लाल सेना से बचाने अक्टूबर 1962 में रक्षा मंत्री बनकर आया था, मगर चव्हाण ने यही हरकत दस वर्ष बाद की थी जब जनता पार्टी टूटी थी. नेता विपक्ष से वे सीधे उपप्रधान मंत्री बने थे. चरण (चेयर) सिंह के साथ.

जॉर्ज के साथ एक अन्य घटना भी हुई थी . पर तब न इन्टरनेट था और न तेज संचार प्रणाली. इसलिए बात अधूरी रह गयी थी. इन्दिरा गाँधी की हत्या के बाद राजीव गाँधी ने योजनाबद्ध तरीके से हेमवतीनंदन बहुगुणा को अमिताभ बच्चन से (प्रयागराज में) तथा अटल बिहारी वाजपेयी को माधवराव सिंधिया से (ग्वालियर में) पराजित करवाया. जॉर्ज उत्तर बंगलौर से तब रेल मंत्री रहे सीके जाफर शरीफ से शिकस्त खा गए. उस वक्त तेलुगु देशम पार्टी के अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश के मुख्य मंत्री एनटी रामाराव ने तीनों को (बहुगुणा, अटलजी तथा जॉर्ज को) आन्ध्र में सीटों का वादा किया था. हैदराबाद में टाइम्स ऑफ़ इंडिया का मैं संवाददाता था. मेरी रपट छपी भी थी. एनटी रामाराव के सहयोगी सांसद पर्वतनेनी उपेन्द्र ने मुझे यह बताया था (बाद में वे विश्वनाथ प्रताप सिंह काबीना में सूचना एवं प्रसारण मंत्री भी थे). तेलुगु देशम सुप्रीमो का सुझाव था कि पूर्व राजधानी कर्नूल (रॉयलसीमा) से जॉर्ज को प्रत्याशी बनाया जाय. गौरतलब बात है कि आंध्र प्रदेश से इंदिरा-कांग्रेस 42 में से एक ही सीट हारती थी. मगर 1984 में केवल एक-दो ही जीत पायीं. इंदिरा की सहानुभूति वाली लहर फीकी रही. जॉर्ज कर्नूल से लड़ते तो? इस क्षेत्र से लड़े पूर्व मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री रहे के. विजय भास्कर रेड्डी जो 1977 (जनता पार्टी की आंधी में) और 1980 में 75 प्रतिशत वोट पाकर जीते थे, उन्हें 1984 में तेलुगु देशम पार्टी के अनजाने प्रत्याशी अयप्पा रेड्डी ने 49.9 प्रतिशत वोट पाकर हरा दिया. जार्ज फर्नांडीज तो इस जनपदीय तेलुगु देशम कार्यकर्त्ता से कहीं ज्यादा सशक्त होते. बेंगलूर उत्तर से जार्ज फर्नांडीज 41 प्रतिशत वोट पाकर भी जाफर शरीफ के मुकाबले हार गये.

जॉर्ज के भाजपा सरकार से सहयोग करने पर अक्सर टीका टिप्पणी होती रहती है. भारत के सोशलिस्टों की नियति रही कि अकेले डांड थामकर अपनी नाव को वर्षों से खेते रहे. किनारा पाये ही नहीं. लोहिया ने पुस्तक “विल टू पॉवर” में समाज परिवर्तन के लिए सत्ता पाने की अपरिहार्यता समझायी थी. तभी हैदराबाद अधिवेशन में (1955) नारा दिया था, “तख़्त पर कब्ज़ा, ताज पर कब्ज़ा, सात बरस के राज पर कब्ज़ा.” मकसद यही था कि भारत बदलना है. जॉर्ज तो लोहिया की पतवार थे. दीनदयाल उपाध्याय-लोहिया की रणनीति को आकार देने की कोशिश की थी. महान सोशलिस्ट विचारक रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने पटना आवास (1956) पर मुझ (समाजवादी युवक सभा सदस्य) को बताया था कि नेहरु-सत्ता का ऐसा नसीब रहा है कि सोशलिस्ट टूटते गए, बिखरते रहे हैं. जॉर्ज ने गैर-कांग्रेसियों को दृढ़ता से संगठित करने की दिशा में कोशिश की थी. सिर्फ आंशिक कामयाबी ही पाई.

Share On Facebook

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :