जनादेश

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एजेंसी की खबरें भरते हिन्दी अखबार !

संजय कुमार सिंह 

इस बार गुरुवार के अखबारों में ऐसी कोई खबर नहीं थीं जिसे सब मिलकर टांग देते या मैं कह सकूं कि सबने छोड़ दिया. अमूमन अखबार में कोई घटना प्रधान खबर न हो तो पाठकों की दिलचस्पी के अनुसार कोई खबर होनी चाहिए जो पढ़ी जाए या पढ़ने लायक हो. इस हिसाब से मुंबई में आने वाला तूफान और गर्भवती हथनी के बम से मर जाने की दो खबरें थीं जिन्हें प्रमुखता से छापा जा सकता है. मैंने मुंबई में एक मित्र से तूफान के बारे में पूछा तो उसका कहना था कि वह 20 लाख करोड़ की आर्थिक सहायता जैसा निकला. अगर आर्थिक सहायता से कोई लाभ नहीं हुआ तो इससे कोई नुकसान नहीं हुआ. और इसी में यह खबर मार खा गई. आर्थिक पैकेज की खबर खींच-खींच कर छापने वाले अखबारों ने मुंबई के तूफान की खबर को महत्व नहीं दिया क्योंकि इससे नुकसान नहीं हुआ. 

इंडियन एक्सप्रेस में कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार की एक्सक्लूसिव खबर थी. पर टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर थी कि राम मनोहर लोहिया अस्पताल में कोविड की रिपोर्ट गलत और देरी से आ रही है. ऐसा ही एक मामला गुजरात का भी था. वहां हाईकोर्ट की पीठ ने राज्य सरकार से सख्त सवाल पूछे तो पीठ ही बदल दी गई. वह खबर दिल्ली के अखबारों में प्रमुखसा से नहीं थी. अब मुंबई हाई कोर्ट ने पीएम केयर्स फंड के बारे में सरकार से जानकारी मांगी है. देखना है इस मामले में सरकार क्या करती है पर अखबारों ने तो खबर गोल कर दी है. बुधवार को दिन में ट्वीटर पर यह खबर मुझे हिन्दुस्तान टाइम्स में दिखी थी पर गुरुवार को यह खबर अखबार से पहले पन्ने पर नहीं थी.  

गुजरात की केमिकल फैक्ट्री में विस्फोट : 8 मरे कई जख्मी - इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर पहले पन्ने पर है. दूसरी अच्छी या बड़ी खबर नहीं थी तो यह लीड हो सकती थी पर गुजरात में दुर्घटना की खबर दिल्ली में लीड बनाने का मतलब है गुजरात के कई सरकारी विभागों को निशाने पर ले आना. लोग इससे संबंधित सवाल उठाने लगेंगे. ऐसे में मुंबई के तूफान की खबर दैनिक भास्कर में लीड है. नवोदय टाइम्स ने एम्स में कोरोना विस्फोट को लीड बनाया है. अमर उजाला में लीड थी, किसानों को अपनी फसल कहीं किसी भी कीमत पर बेचने की आजादी. निश्चित रूप से सरकार की दी यह आजादी उन्हें कुछ उम्मीद दिलाएगी. देखना है इसका क्या असर होता है.

इस बीच, दैनिक जागरण ने इसी खबर को छह कॉलम में तान दिया है. शीर्षक है, मर्जी से फसल बेचने को आजाद होंगे किसान. कहने की जरूरत नहीं है कि यह खबर जितनी बड़ी है नहीं, उससे ज्यादा फैलाई गई थी. इसी तरह, महाराष्ट्र पहुंचते ही कमजोर पड़ा निसर्ग (समुद्री तूफान) ऐसा शीर्षक है जिससे लगता है कि सरकार या अखबार के डर से कमजोर पड़ गया हो. सबमें यही रूटीन की खबरें हैं. किसी भी अखबार ने पाठक के लिए अलग से कोई मेहनत नहीं की. सरकार समर्थक खबर भी नहीं बनाई जबकि गर्भवती हथनी की मौत का मामला कल सबसे ज्यादा पढ़ा गया होगा और इसपर विवाद भी पर्याप्त रहा. कहने के लिए अखबार सब अलग हैं पर खबरों के मामले में सब एक जैसे रहे. किसी में कुछ खास नहीं. यही हालत हिन्दुस्तान और नवभारत टाइम्स की रही.

विजय माल्या को लंदन से लाए जाने की अटकल से संबंधित एजेंसी की खबर को कई अखबारों ने पहले पन्ने पर छापा है. नवभारत टाइम्स में इस खबर के शीर्षक में ही बताया गया है कि सीबीआई ने इसकी पुष्टि नहीं की. इसी तरह, चीनी सैनिक पीछे हटने लगे शीर्षक से एजेंसी की एक खबर कई अखबारों में है. दैनिक हिन्दुस्तान ने इसे लीड बनाया है. शीर्षक है, लद्दाख में भारत- चीन सेना पीछे हटीं. हिन्दुस्तान में एक छोटी सी खबर है, पुलवामा में जैश के तीन आतंकी ढेर. दैनिक जागरण में इसका शीर्षक है, बड़ी कामयाबी : जैश के पाक कमांडर समेत तीन ढेर. इसके साथ एक फोटो और भर्ती की भरपूर सामग्री है.  

अखबारों में पहले सरकार के खिलाफ खबरें नहीं छपतीं थीं. फिर सरकार के पक्ष या समर्थन में खबरें छपनी शुरू हुईं और अब पीआईबी ने सरकार के खिलाफ खबरों का फैक्ट चेक करने का काम शुरू किया है. वह उन्हीं खबरों का फैक्ट चेक करता है जो सरकार के खिलाफ होती हैं. सरकार के विरोधियों या मंत्रियों के बयानों की जांच नहीं करता है कि वे सही बोल रहे हैं या गलत. उदाहरण के लिए, केरल में हथनी की मौत को भाजपा सांसद ने हत्या कहा, राहुल गांधी पर सवाल उठाए जबकि यह मामला उनके संसदीय क्षेत्र का नहीं था. मेनका ने कहा कि मल्लापुरम में जानवर क्या इंसानों के साथ भी होती रहती है बर्बरता. यह अलग बात है कि वारदात पलक्कड जिले में हुई और निशाने पर हथनी या हाथी नहीं थे बल्कि किसानों ने जंगली सूअर से फसल को बचाने के लिए यह उपाय किया था. इसपर कुछ पहले पन्ने पर नहीं था.


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