जनादेश

जब तक जिए शान से जिये चन्द्रशेखर असली समस्या तो बुद्धि है सादगी में मुस्कुराता चेहरा यानी चंद्रशेखर गांव ,गरीब और पेड़ के लिए सत्याग्रह गुजर जाना एक दरख्त का जोमैटो में चीन का निवेश रुका कोई क्यों बनती है आयुषी क्या समय पर हो जाएगा वैक्सीन का ट्रायल हरफनमौला पत्रकार की तलाश काफ़्का और वह बच्ची ! कोरोना ने चर्च भी बंद कराया सरकार अपनी जिम्मेदारियों से क्यों भाग रही है? वसूली का दबाव अलोकतांत्रिक विपक्षी दलों ने कहा ,राजधर्म का पालन हो पुर्तगाल ,गोवा और आजादी कब शुरू हुई बाबाओं की अंधविश्वास फ़ैक्ट्री कोरोना से बाल बाल बचे नीतीश आंदोलनकारी या अतिक्रमणकारी ओली के बाद प्रचंड की भी राह आसान नही खामोश हो गई सितारों को उंगली से नचाने वाली आवाज

इंदिरा से इस्तीफा मांगा पर और आगे नहीं बढे जेपी

राम दत्त त्रिपाठी 

लखनऊ .जय प्रकाश नारायण या जेपी बड़ी दुविधा में फंस गए. उन्होंने एक बयान जारी कर नैतिकता के आधार पर इंदिरा गांधी का त्यागपत्र तो मांगा , पर वह इस मुद्दे पर नया देशव्यापी  आंदोलन खड़ा करने के बजाय अपनी सारी ताक़त बिहार में सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन को प्रखंड और गांव  स्तर तक ले जाने के लिए समानांतर सरकार के कार्यक्रम पर लगाना चाहते थे. वास्तव में बिहार के बाहर जेपी आंदोलन का संगठन और ताक़त भी नहीं के बराबर थी. हालांकि अस्वस्थ जेपी ने सब जगह दौरा किया था.

जजमेंट के दो दिन बाद वह सर्वोदय समाज की एक बैठक के लिए पटना से जबलपुर जाते हुए इलाहाबाद जंक्शन के रिटायरिंग रूम में ट्रेन बदलने और कुछ देर विश्राम के लिए रूके थे. इलाहाबाद में सर्वोदय और जेपी आंदोलन के प्रमुख नेता प्रोफ़ेसर बनवारी लाल शर्मा और मैंने उनसे जानना चाहा था कि अब इस जजमेंट के बाद क्या रणनीति होगी . जे पी का कहना था कि विपक्षी दल उन पर दिल्ली आकर रैली और देश व्यापी बड़ा आंदोलन छेड़ने का दबाव बना रहे हैं. लेकिन आंदोलन की ताक़त देखते हुए वह अपना सारा ध्यान बिहार में सम्पूर्ण  क्रांति के घोषित कार्यक्रम में लगाना चाहते हैं. 

जेपी आंदोलन के एक प्रमुख नेता शिवानंद तिवारी याद करते हैं, ” यह जजमेंट जेपी के साथ ही हम लोगों ने भोजपुर के पीरो मैं सुना था. रेडियो पर. अगले दिन JP की सभा आरा में हुई और उसी सभा में नैतिकता के आधार पर उन्होंने इन्दिरा जी से त्याग पत्र माँगा था. उसी दिन शाम में आरा स्टेशन से ही जबलपुर के लिए उन्होंने प्रस्थान किया था.”


गांधी स्मारक निधि के अध्यक्ष राम चंद्र राही ने मुझे पिछली मुलाक़ात में बताया था कि जबलपुर की बैठक में सर्वोदय समाज के लोगों को भी जेपी ने यही बताया था. सबकी यही राय थी कि व्यवस्था परिवर्तन यानि सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन पर सारा ज़ोर लगाया जाए.सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा गांधी को सशर्त स्टे दिया, यानि वह लोक सभा मेम्बर के नाते मतदान नहीं कर सकतीं, लेकिन संविधान के मुताबिक़ बिना सदस्य रहे भी प्रधानमंत्री रह सकती हैं. संविधान में यह प्रावधान है कि कोई व्यक्ति विधायिका का सदस्य हुए बिना छह महीने मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधान मंत्री रह सकता है. 


जेपी जबलपुर से वापस पटना आए तो उन पर फिर दबाव पड़ना शुरू हुआ. पहले तो जेपी ने दिल्ली जाने से मना किया, लेकिन बताते हैं कि जनसंघ के नेता नाना जी देश मुख ने गांधी शांति प्रतिष्ठान के मंत्री राधा कृष्ण के ज़रिए उन्हें किसी तरह राज़ी कर लिया. जेपी दिल्ली आए तो कांग्रेस के कुछ सांसद भी उनसे मिले जिससे इंदिरा गांधी को बड़े पैमाने पर दल बदल की आशंका हो गयी. कहते हैं मास्को से कम्युनिस्ट लाबी और संजय गांधी का गुट भी अलग से काम कर रहा था. यह जेपी आंदोलन को कुचलने के लिए अंदर- अंदर आपात काल घोषित करने की तैयारी पहले से कर रहा था. 


25 जून 1975 को राम लीला मैदान में भारी भीड़ जुटी. वहाँ जेपी ने इंदिरा गांधी के त्यागपत्र की माँग तो की ही, प्रधानमंत्री आवास के सामने क्रमिक सत्याग्रह का कार्यक्रम घोषित किया. जैसे इन दिनों अमेरिका की फ़ौज के बड़े अफ़सर कह रहे हैं जेपी ने भी कहा कि पुलिस और फ़ौज के लोग जनता के दमन के लिए  ग़ैर क़ानूनी आदेश न मानें. इसी का बहाना बनाकर और देश द्रोह का जुर्म बताकर मुक़दमे दर्ज हो गए. बिना मंत्री मंडल के अनुमोदन रातों रात इमर्जेंसी लगा दी गयी. भोर में कैबिनेट को सूचित करने के बाद इंदिरा जी ने सुबह आकाशवाणी से देश में इमर्जेंसी लागू करने की घोषणा कर दी. अख़बारों  पर सेंसर लगा दिया गया. मौलिक अधिकार निलम्बित कर दिए गए.

 इंदिरा गांधी ने सारी ताक़त अपने हाथ में ले ली. खुशामदी और चापलूस लोगों का बोलबाला हो गया. इंदिरा जी जनता के दुःख दर्द से दूर हो गयीं. अख़बारों में सब तरफ़ अमन चैन और खुशहाली की खबरें थीं. अपनी लोकप्रियता के धोखे में आकर इंदिरा जी ने मार्च 1977 चुनाव करा दिए. जनता का बदला मूड वह भाँप नहीं पायीं. अपने को बंगला देश युद्ध के बाद वाली लोक प्रिय नेता समझती रहीं, जिसे दुर्गा का अवतार भी कहा गया था. जनता ने पौने दो साल की सारी कसर चुनाव में निकाली और कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गयी. आज जो लोग सत्ता में हैं वह इंदिरा जी के ख़िलाफ़ आंदोलन में शामिल थे. पर आज वे भी सत्ता के रंग में रच बस गए हैं. सत्ता  का  मूल चरित्र वही है जो पहले था. राजनीति के विद्वान तो यह भी कहते हैं कि जब सारी सत्ता एक हाथ में आ जाती है तो नशा कुछ  ज़्यादा ही बढ़ जाता है.


Share On Facebook

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :