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मांगा वेतन तो थमाया हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन

आलोक कुमार

पटना.चारों तरफ की मुसीबत से घिर गया है बिहार. वैश्विक कोरोना, चमकी बुखार, बाढ़, कटाव,वर्षा, वज्रपात, टिड्डियों का आक्रमण आदि के बीच कोरोना वॉरियर्स लोगों की भी समस्या है. उनको नियमित वेतन भुगतान नहीं किया जा रहा है.678 मेडिकल कॉलेज, सदर अस्पताल और पीएचसी के 35 हजार कर्मियों का वेतन रुका हुआ है.स्वास्थ्यकर्मी और उनसे जुड़े संगठनों ने प्रदेश सरकार सहित स्वास्थ्य विभाग के आलाधिकारियों से मुलाकात कर कई बार पैसे की मांग की। सैलरी और मानदेय की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन किया। इसके बाद भी पैसा नहीं मिला।मार्च के अंतिम सप्ताह में स्वास्थ्यकर्मी हड़ताल की तैयारी कर रहे थे, लेकिन कोरोना वायरस की महामारी को लेकर उन्होंने योजना स्थगित कर दी.सैलरी और मानदेय की मांग को लेकर प्रदेश के स्वास्थ्यकर्मियाें ने 8 फरवरी को वेतन नहीं तो काम नहीं के नारे के साथ धरना-प्रदर्शन शुरू किया था.

प्रदेश के 678 मेडिकल कॉलेज, सदर हॉस्पिटल, पीएचसी-सीएससी, रेफरल हॉस्पिटलों सहित दूसरे सरकारी हॉस्पिटलों में कार्यरत डॉक्टर, मेडिकल ऑफिसर, पैरामेडिकल स्टाफ सहित अन्य स्वास्थ्यकर्मी खाली पेट लोगों को कोरोना वायरस से बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं. प्रदेश के सरकारी हॉस्पिटलों में कार्यरत स्वास्थ्यकर्मियों को पिछले 6 से 8 महीने से सैलरी नहीं मिली है। स्वास्थ्यकर्मी और उनसे जुड़े संगठनों ने प्रदेश सरकार सहित स्वास्थ्य विभाग के आलाधिकारियों से मुलाकात कर कई बार पैसे की मांग की। सैलरी और मानदेय की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन किया.इसके बाद भी पैसा नहीं मिला.


इस संबंध में स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने हर महीने स्वास्थ्यकर्मियों को वेतन रिलीज करने का दावा किया है, जबकि स्वास्थ्य विभाग से जुड़े संगठन बिहार चिकित्सा एवं जन स्वास्थ्य कर्मचारी संघ के महामंत्री विश्वनाथ सिंह ने उनके दावे काे गलत बताया है. विश्वनाथ सिंह के मुताबिक प्रदेश के 7 मेडिकल कॉलेज व हॉस्पिटल, 36 सदर हॉस्पिटल, 38 सब डिविजनल हॉस्पिटल और 67 रेफरल हॉस्पिटल सहित लगभग 530 पीएचसी-सीएसी हॉस्पिटलों में कार्यरत लगभग 15 हजार डॉक्टर व 20 हजार कर्मचारियों को पिछले 6 से 8 महीने से सैलरी नहीं मिली है.


मार्च के अंतिम सप्ताह में स्वास्थ्यकर्मी हड़ताल की तैयारी कर रहे थे, लेकिन कोरोना वायरस की महामारी को लेकर उन्होंने योजना स्थगित कर दी. सैलरी और मानदेय की मांग को लेकर प्रदेश के स्वास्थ्यकर्मियाें ने 8 फरवरी को वेतन नहीं तो काम नहीं के नारे के साथ धरना-प्रदर्शन शुरू किया था. लेकिन, अधिकारियों के आश्वासन के बाद हड़ताल स्थगित कर दिया गया. 17 दिनों के इंतजार के बाद जब पैसा नहीं मिला, तो फिर 25 फरवरी को धरना-प्रदर्शन किया था.

सरकार पर जहां डॉक्टर, मेडिकल ऑफिसर, पैरामेडिकल स्टॉप का लगभग 200 करोड़ रुपए बकाया है, वहीं स्वास्थ्य से जुड़े दूसरे तकनीकी कर्मचारियों की सैलरी और मानदेय के रूप में लगभग 350 करोड़ रुपए सरकार ने नहीं दिए हैं. इसकी वजह से कर्मचारियों का काफी परेशानी हो रही है. स्वास्थ्यकर्मी हरीश कुमार का कहना है कि सैलरी नहीं मिलने से घर खर्च के साथ अन्य कामों पर असर पड़ा है.

प्रदेश में कार्यरत स्वास्थ्यकर्मियों को 6 से 8 महीने से वेतन नहीं मिला है। ऐसे में यदि सरकार की ओर से स्वास्थ्यकर्मियों को वेतन नहीं मिला तो वह हड़ताल करने के लिए बाध्य होंगे। -विश्वनाथ सिंह, महामंत्री,बिहार के सभी स्वास्थ्यकर्मियों को हर महीने निर्धारित समय पर वेतन दिया जा रहा है। इसके बाद भी यदि प्रदेश के किसी हॉस्पिटल में कार्यरत कर्मी या स्वास्थ्यकर्मी को वेतन नहीं मिला है, तो वे शिकायत करें। -मंगल पांडेय, स्वास्थ्य मंत्री


जी यह हाल है कोरोना वॉरियस स्टाफ नर्सेस का.स्टाफ नर्सेस ने कहा कि वैश्विक कोरोना को दर्शाते हुए वेतन करने का आदेश दिया गया. इसके साथ सीएम नीतीस कुमार द्वारा घोषित एक माह का वेतन देने का आदेश दिया गया. वेतन तो मार्च तक मिला पर सीएम द्वारा घोषित वेतन को भी आइसोलेटेड कर दिया गया.अप्रैल,मई और जून का वेतन जुलाई माह के अंत में देने को कहा जा रहा है.इस तरह चार माह वेतन से महरूम कोरोना वॉरियस रहेंगे.उनको अपना और परिवार के लोगों की पेट भरने के लिए वेतनादि नहीं दिया जा रहा है.कोरोना वॉरियस नर्सेस का कहना है कि रेलगाड़ी का परिचालन बंद होने से लॉकडाउन के समय तीन हजार रूपये व्यय करके प्रति कार्य दिवसों पर जाना पड़ा.अनलॉक के समय टेम्पों से जाने में हजारों रू.व्यय करना पड़ रहा है.इस बीच बिहार सरकार के द्वारा स्वास्थ्यकर्मियों को वेतन के बदले हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन थमा दिया गया.यह

कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने तथा बचाव के कार्य में लगे सभी चिकित्सा कर्मियों की स्वास्थ्य का विशेष ख्याल में रखकर दिया गया. इसके लिए कोविड-19 पीड़ित रोगियों के उपचार में जुटे नियमित श्रेणी के कर्मियों, संविदा कर्मियों एवं आशा कार्यकर्ता/आशा फैसिलिटेटर को कोरोना संक्रमण से बचाव हेतु हाइड्रो क्सीक्लोरोक्वीन टैबलेट दी गयी. राज्य स्वास्थ्य समिति के कार्यपालक निदेशक मनोज कुमार ने सभी सिविल सर्जन एवं जिला कार्यक्रम प्रबंधक को पत्र लिखकर इस संबंध में दिशा-निर्देश दिया था.लांसेट की रिपोर्ट के मुताबिक हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन दवा कोविड 19 में लेने से कोई फायदा नहीं होता बल्कि इसके नुकसान ज्यादा हैं. रिपोर्ट के बाद डब्ल्यूएचओ ने हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन के क्लिनिकल ट्रायल पर रोक लगा दी. लांसेट में छपी इस रिपोर्ट पर भारतीय वैज्ञानिकों ने कई सवाल खड़े किए है.

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