असली समस्या तो बुद्धि है

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असली समस्या तो बुद्धि है

हरिशंकर व्यास

भारत की समस्या हिंदू हैं. हिंदू की समस्या बुद्धि है. बुद्धि की समस्या गुलामी से बनी प्रवृत्तियां हैं. हिंदू की प्रवृत्तियां, उसका चेतन-अचेतन-अवचेतन का वह मनोभाव है जिससे बुद्धि बिना स्वतंत्रता के भभके के है, बिना मौलिकता के है. वह न प्रखर है और न निर्भीक. भीरुता, दासता, हीनता और दोयमता है औसत हिंदू बुद्धि की पहचान. निर्बुद्धि में जीना हिंदू की नियति और उसका स्वभाव है. ऐसा कैसे हुआ? मूल वजह इतिहास है. चिंरतन गुलामी और हाकिमशाही में सदियों जीने का अंतहीन हिंदू अनुभव वह मूल बीज है, जिससे वह आजादी के अवसर में भी स्वतंत्र बुद्धि और बौद्धिकता की मुक्त उड़ान भर नहीं सकता. इतिहास ने हिंदुओं की प्रकृति व स्वभाव को ऐसे पकाया है, जिससे सनातनी हिंदू का यह मूल बीज मंत्र भी भोथरा हो अर्थ खोए हुए है कि ‘पुरुषैर्थ्यते इति पुरुषार्थः’!


हमारी बुद्धि, हमारा पुरुषार्थ बिना इस भान, लक्ष्य-उद्देश्य के है कि हमें करना क्या है? हम भले-बुरे को बूझ नही पाते. बुद्धि और निर्बुद्धि का भेद नहीं कर पाते. क्या मेरी-आपकी बुद्धि ने कभी सोचा कि 1947 से पहले भारत ब्रिटेन का कैसा आर्थिक उपनिवेश था और आज हम चीन पर कैसे आश्रित हैं? जवाहरलाल नेहरू., पीवी नरसिंहराव, नरेंद्र मोदी के तीन अलग-अलग व्यक्तित्वों ने जिन उद्देश्यों में भारत का जो पुरुषार्थ बनाया था तो उससे भारत को कुल जमा क्या प्राप्त हुआ? नेहरू का भी मंत्र आत्मनिर्भरता का था और आज नरेंद्र मोदी भी वहीं सुर लिए हुए हैं. बावजूद इसके हमारा 73 साला सफर कहां पहुंचा? भारत अनजाने-अनचाहे चीन का आज ऐसा आर्थिक गुलाम है कि किसी को समझ नहीं है कि उस पर इतने निर्भर कैसे हो गए? कैसे अब हम अपनी सार्वभौमिकता, अपनी जमीन बचाएं? उससे कैसे लड़ें?

बुद्धि चकरा जाएगी यदि सोचेंगें कि 1947 से पहले भारत ज्यादा आश्रित था या आज ज्यादा आश्रितहै? हर कोई चिंता में है कि चीन से सप्लाई बंद हुई तो बर्बाद होंगे. लोगों को महंगा सामान मिलेगा, आर्थिकी बर्बाद होगी! इस बात को दूसरी तरह से समझें कि आज हम पर कौन निर्भर है? डोनाल्ड ट्रंप ने एक झटके में एच1बी वीजा खत्म किया. उन्हें, उनके प्रशासन और वहां की आईटी कंपनियों ने सोचा तक नहीं कि भारत के आईटी पेशेवर अमेरिका की मजबूरी हैं. जाहिर है, अमेरिका न आश्रित है, न भारत से दोस्ती का दिवाना है. सचमुच भारत पर क्या कोई देश (भूटान को छोड़ें) किसी भी तरह निर्भर है?


नेपाल, श्रीलंका तक नहीं हैं. अमेरिका, चीन आदि तमाम महाशक्ति देश अपने पर दूसरों की निर्भरता बना कर महाशक्ति हैं जबकि भारत वह देश है, जिस पर न कोई निर्भर है और न वह किसी का सहारा है. ठीक विपरीत हमारी मजबूरियां हैं! हर छोटी-बड़ी चीज के लिए दूसरे पर आश्रित हैं. सोचें यदि अमेरिकी कंपनियां फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप, गूगल आदि की भारत को सेवा देना बंद कर दें तो भारत की अधकचरी बुद्धि के लिए प्लेटफॉर्म ही नहीं बचेंगे. क्या शर्मनाक बात है जो टिक-टॉक पर भारत में लोग ऐसे रोते दिखाई दिए मानों बिना चीनी ऐप के हमारा काम नहीं चल सकता है!


क्या यह यर्थाथ भारत की सामूहिक चेतना में, हिंदुओं की बुद्धि में विचार बनाता है? कैसा हिंदू मानस है, कैसी बुद्धि है जो ख्याल तक नहीं कि हमने बनाया क्या है, जिससे हम अपने बूते दुनिया को प्रभावित करें. हमारी धुरी पर भी दुनिया कभी घूमे! पर ऐसा तब सोच सकते हैं जब बुद्धि में उड़ने का, बेबाकी से विचार का और विचार के लिए लक्ष्य-उद्देश्य, पुरुषार्थ का भभका बना हुआ हो.


मैं भटक रहा हूं. मूल सवाल हिंदू की बुद्धि का है. इतिहास में गुलामी के अनुभव ने हमारी बुद्धि को दस तरह से कुंद बनाया है. उसी के चलते आज भी हाकिमशाही तंत्र, उसके आगे नागरिक की भीरुता, दासता, हीनता व दोयमता के स्वभाव ने हमें उस दीन-हीन अवस्था में पहुंचाया है, जिसमें हमारी दुनिया को जरूरत नहीं है लेकिन हमें उनका सहारा चाहिए. हमें उनसे काम चाहिए. रोजगार-पूंजी चाहिए. सुरक्षा चाहिए, ल़ड़ाकू विमान चाहिए, गोला-बारूद चाहिए. और सबसे ज्यादा अमेरिका, यूरोप, आसियान आदि से वह हौसला चाहिए कि चीन से लड़ो, हम तुम्हारे साथ हैं!


क्या नाम दें ऐसी दीन-हीन अवस्था को? कैसे है यह अवस्था? वजह इतिहास और गुलामी है तो आजाद भारत का अपराध है जो उसने 73 सालों में अपने नागरिकों को और खासकर हिंदुओं को निर्भीक, बुद्धिमान, स्वतंत्र बनाने के लिए कुछ नहीं किया! हिंदुओं की बुद्धि को वैसे ही दास बनाए रखा जैसे अंग्रेज, मुगल बनाते थे. मतलब हुकूमत, पॉवर की बेड़ियों में जकड़े रखना. तंत्र पहले गण बाद में. तंत्र और तंत्र का राजा तय करेगा कि लोगों को कैसे जीवन जीना है. तंत्र माईबाप और प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री, अफसर पॉवर-सत्ता का वह मंदिर, जिसमें प्रजा को सिर्फ भक्ति-याचना करनी है और प्रसाद ले कर, सत्ता पर निर्भर हो कर अपने को बचाना है, अपने को चलाना है या अपने-आपको बनाना है.

उस नाते लगता है 1947 की आजादी व लोकतंत्र दोनों भारत के हिंदुओं के लिए वह शॉर्टकट हैं, जिसने चार्वाक ऋषि के अर्थ और काम के लक्ष्य की सिर्फ लालसा है तो इनके पीछे हिंदुओं को भगाए रखने का जुगाड़ भी है. आदि वेद और मनु दर्शन के बताए पुरुषार्थ या कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में अर्थ और काम में दो लक्ष्यों में ही हिंदू जीवन असलियत में धड़कता है. विद्या-बुद्धि का मतलब नहीं. वह महज अर्थ-काम का कामचलाऊ साधन है तो धर्म लक्ष्य ऐसी रूढ़ि में तब्दील है कि गंगा में डुबकी लगाओ, मंदिर बनाओ, भगवा पहनो, कर्मकांड करो और सिद्धि हुई मोक्ष व धर्म की.नया इंडिया से साभार 

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