बिहार में राजनीति तो बंगाल में लापरवाही का नतीजा सामने

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बिहार में राजनीति तो बंगाल में लापरवाही का नतीजा सामने

प्रभाकर मणि तिवारी

पटना /कोलकाता .बिहार और पश्चिम बंगाल में कोरोना संक्रमण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं. बिहार में जहां इसकी वजह से राजनीति और कोताही है वहीं पश्चिम बंगाल में आम लोगों की लापरवाही से नए मामले दिन दूना रात चौगुना गति से बढ़ रहे हैं. बिहार में तो आलम यह है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी के दफ्तर के कर्मचारी तक कोरोना की चपेट में हैं. इससे परेशान नीतीश तक को कोरोना की जांच करानी पड़ी. लगातार बढ़ते मामलों को ध्यान में रखते हुए अब राजधानी पटना समेत कई जिलो में दोबारा लॉकडाउन करना पड़ा है. लगभग यही स्थिति पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता समेत कम से कम नौ जिलों की हैं. यहां कंटेनमेंट इलाको में नौ जुलाई की शाम से दोबारा सख्ती से लॉकडाउन लागू कर दिया गया है.

बिहार में सरकार की प्राथमिकता सूची में कोरोना नहीं बल्कि विधानसभा चुनाव सबसे ऊपर है. यही वजह है कि तमाम राजनीतिक दल सियासी गणित बिठाने में जुट गए हैं. नतीजतन कोरोना की जम कर अनदेखी की गई. उसका नतीजा अब तेजी से बढ़ते मामलों के साथ सामने आया है. अब दूसरा कोई रास्ता नहीं देख कर सरकार ने देखते हुए भागलपुर, पटना, किशनगंज और नवादा को फिर से लॉकडाउन कर दिया है.इस दौरान आवश्यक सेवाओं को छोड़कर सभी गतिविधियों पर रोक लगा दी गई है. पटना समेत इन तमाम इलाकों में 10 से 16 जुलाई तक पूर्ण लॉकडाउन रहेगा.

खासकर पटना में एक सप्ताह में कोरोना संक्रमितों की संख्या तेजी से बढ़ी है. शुरुआती 100 दिनों में जितने संक्रमित जिले में मिले थे, लगभग उतने ही मरीज बीते एक सप्ताह में सामने आए हैं. 22 मार्च को यहां पहला मरीज मिला था. इसके 100 दिनों में यानी 30 जून तक यह संख्या 718 पर थी.सात जुलाई तक यह संख्या 1402 पर पहुंच गई. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सचिवालय स्थित दफ्तर की सुरक्षा में तैनात गार्ड के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद दूसरे सुरक्षा कर्मियों की भी जांच की जा रही है. संक्रमित सुरक्षा गार्ड को होम क्वारंटाइन में भेज दिया गया है. दूसरी ओर, उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के पीए समेत चार लोग कोरोना पाजीटिव निकले हैं. उसके बाद पूरे दफ्तर को सील कर दिया गया है.

पड़ोसी पश्चिम बंगाल में कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों को देखते हुए ममता सरकार ने राज्य के सभी कंटेनमेंट जोन में सम्पूर्ण लॉक डाउन लागू दिया है. इन क्षेत्रों में जरूरी सेवाओं को छोड़कर सभी प्रकार की गतिविधियां बंद की गई हैं. इस दौरान कंटेनमेंट जोन में परिवहन सेवा पूर्ण रूप से बंद रहेगी. इन इलाकों में सिर्फ जरूरी वस्तुओं की दुकानें खोलने की अनुमति होगी. पुलिस प्रशासन को लाकडाउन सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए गए हैं.


तेजी से बढ़ते कोरोना संक्रमण के बीच पहाड़ियों की रानी के नाम से मशहूर दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में नौ से 31 जुलाई तक पर्यटन से संबंधित तमाम गतिविधियों पर पाबंदी लगा दी गई है. अभी एक सप्ताह पहले ही देशी-विदेशी सैलानियों में मशहूर इस पर्यटन केंद्र को सौ दिनों बाद दोबारा खोला गया था. लेकिन संक्रमण की आशंका से गोरखालैंड टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) ने पर्यटन पर पाबंदी लगाते हुए तमाम पर्यटकों को वापस भेज दिया है. है. जीटीए ने बिना खास जरूरत के इलाके के लोगों को मैदानी इलाको में आवाजाही नहीं करने का निर्देश दिया है.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बताती हैं, “संक्रमण बढ़ने की वजह से सरकार को मजबूरी में सख्ती करनी पड़ रही है. राज्य में मास्क पहनना अनिवार्य है. बिना मास्क के बाहर निकलने वालों को लौटा दिया जाएगा. कोरोना से उपजी परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए ही सरकार ने मास्क नहीं पहनने वालों पर कोई जुर्माना नहीं लगाने का फैसला किया है.”

समाजशास्त्रियों का कहना है कि इस स्थिति के लिए काफी हद तक लोग भी जिम्मेदार हैं. लॉकडाउन में ढील मिलते ही लोगों की भीड़ बाजारों से शापिंग माल्स तक उमड़ने लगी थी. अब उसी का खामियाजा भरना पड़ रहा है. एक गैर-सरकारी संगठन के संयोजक संजय घोष कहते हैं, ‘कोरोना के बढ़ते संक्रमण के बावजूद लोग मास्क के इस्तेमाल और सोशल डिस्टेंसिंग के नियम का पालन नहीं कर रहे हैं. या तो उनमें जागरुकता का अभाव है या फिर वे हद दर्जे तक लापरवाह हैं. कोलकाता की बसों में उमड़ती भीड़ इसका सबसे बड़ा सबूत है.विशेषज्ञों का कहना है कि अगर लोगों ने अपना रवैया नहीं बदला तो आगे लंबे समय तक इसी तरह लॉकडाउन और अनलॉक के दो पाटों के बीच पिसते रहना पड़ सकता है.

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