विकास दुबे की कहानी में कोई झोल नहीं है ?

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विकास दुबे की कहानी में कोई झोल नहीं है ?

राजेंद्र कुमार  

लखनऊ .जिस विकास दुबे यूपी पुलिस करीब हफ्ते भर से हर शहर में तलाश रही थी वह मध्य प्रदेश के उज्जैन के महाकाल मंदिर में मिला .उसने खुद एलान किया कि वह विकास दुबे है .फिर उसे मंदिर के गार्ड ने पकड़ा .भले एमपी के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी और पुलिस की पीठ थपथपा लें .क्या इस कहानी में कोई झोल नहीं नजर आता .  ये वाही विकास दुबे है जिसने छह दिन पहले आठ पुलिसवालों को गोलियों से भून दिया. डिप्टी एसपी का भेजा उड़ा दिया था, उसे गुरुवार की सुबह उज्जैन के महाकाल मंदिर परिसर में गिरफ्तार कर लिया गया. कानपुर कांड  के सातवें दिन इस अपराधी का पकड़ा जाना भले की पुलिस के लिए एक कामयाबी है, लेकिन छह दिनों में ही पचास हजार से पांच लाख का इनामी अपराधी घोषित हुए विकास दुबे ने अकेले ही यूपी पुलिस के समूचे तंत्र की कलई तो खोल ही दी है. कमलेश तिवारी हत्या कांड के अभियुक्त गुजरात में पकडे गए थे .इसे भी याद रखे .यह यूपी पुलिस के कामकाज पर एक टिपण्णी है .और उज्जैन में महाकाल में गिरफ़्तारी की कहानी में तो झोल ही झोल है .इसका पता तो बाद में ही चलेगा .

एक चाकू बैग में रख कर यह अपराधी बीते छह दिनों से आधुनिक हथियारों और उपकरणों से लैस कई जिलों के पुलिस अफसरों के ताता-थैया कराता रहा. ऐसे शातिर अपराधी को मंदिर के एक गार्ड ने पकड़ लिया. उसकी गिरफ्तारी का यह घटनाक्रम साबित करता है कि सूबे का ख़ुफ़िया विभाग, एटीएस और एसटीएफ जैसी संस्थाएं विकास को पकड़े के मामले में कदम-कदम पर असफल साबित हुई हैं. इन्हें उसके बारे में कहीं भी कोई पुख्ता सूचना नही मिली.  यूपी पुलिस की इन तीनों एजेंसियों को भी मीडिया के जरिये ही विकास दुबे के पकड़े जाने की जानकारी हुई. 

आतंकी प्रकरणों के बाद यह पहला मौका हैं जब देश भर में यूपी के ख़ुफ़िया महकमें, एटीएस और एसटीएफ की नाकामी का पता चला. वास्तव में यूपी का ख़ुफ़िया महकमा पहले भी कई बार समय से सूचनाएं मुहैया कराने में असफल साबित होता रहा हैं, पर इस बार एटीएस और एसटीएफ भी नाकाम रहे हैं. राज्य के कई पूर्व पुलिस महानिदेशकों का कहना है कि राज्य की पुलिस और ख़ुफ़िया महकमें को लेकर उम्मीदों का पहाड़ इतना ऊंचा कि हर घटना का ठीकरा अंतत: खुफिया तंत्र पर ही टूटता है, लेकिन इस तंत्र की लगातार धुंधली हो रही आंखों और कमजोर चश्मे पर गौर करने को कोई तैयार नहीं है. इस तंत्र को मजबूत करने की अब तक की कवायद जुबानी ही रही हैं. 

सरकार चाहे मायावती की रही हो या अखिलेश यादव अथवा वर्तमान सरकार हो सबने ख़ुफ़िया महकमें को मजबूत करने की घोषणाएं तो की लेकिन उसे मैनपावर, संसाधन तथा स्वतंत्रता देने में परहेज किया. जबकि हर सरकार को पता है कि उसे समाज के हर स्तर पर हो रही समाजिक हलचल, आतंकी तथा नक्सलियों के नेटवर्क के बारे में खुफिया महकमें से ही एलर्ट मिलता है. राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त लोगों के बारे में तथा घुसपैठ कर आये बंगलादेशियों से लेकर सीमा पार से तस्करी कर लाये जाने वाले नकली नोट को लेकर भी ख़ुफ़िया के अधिकारी ही सरकार को सूचना देते हैं. लेकिन इस महकमें की जरूरतों पर सरकारों ने ध्यान नही दिया, जिसके चलते आज यह महकमा समय से सरकार और पुलिस को खुफिया सूचनाएं मुहैया कराने में असफल साबित हो रहा है. 

लाकडाउन के दौरान हजारों श्रमिक अपने परिवार के साथ दिल्ली और हरियाणा से आकर नोयडा पहुंच गए, लेकिन खुफिया विभाग के अफसरों ने इस मामले में सरकार पहले से इस संबंध में कोई अलर्ट नही किया. विकास दुबे के मामले में भी ऐसा ही हुआ. यह अपराधी जिसने पांच दरोगा और पच्चीस सिपाहियों के सामने थाने में घुस कर एक राज्यमंत्री को मार दिया था, वह अपने साथियों के साथ में पुलिसकर्मियों को मारने की योजना बनता है. फिर अपनी योजना के अनुसार आठ पुलिकर्मियों की हत्या कर फरार हो जाता है, लेकिन इसके बारे में एक भी पुख्ता सूचना महकमा नही दे पाता. ऐसे में अब जब इस महकमें पर लोगों ने सवाल उठाये तो यो इस महकमें में डीजी के पद से रिटायर हुए अधिकारी कहते हैं कि सूबे में खुफिया विभाग ने यदि कई महत्वपूर्ण सूचनाएं हासिल की हैं, तो कई मौकों पर उसे मुंह की भी खानी पड़ी है. अब तो सभी लोग यह मानते हैं कि खुफिया तंत्र उतना सक्षम नहीं है, जितना होना चाहिए. 

खुफिया तंत्र के सक्षम न होने की कई वजहें है. अधिकारियों के अनुसार मायावती सरकार ने वर्ष 2007 में यह माना था कि सूबे का खुफिया तंत्र कमजोर है. जिसके क्रम में 26 नवंबर 2007 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने खुद एलान किया था कि अभिसूचना इकाई (खुफिया तंत्र) का पृथक काडर बनेगा और इसकी कार्य प्रणाली चुस्त-दुरुस्त करने के उद्देश्य से खुफिया तंत्र का पुनर्गठन किया जायेगा. मुख्यमंत्री के इस एलान के तत्काल बाद ही राज्य के एडीजी अभिसूचना ने महकमे में 1970 नये पदों के सृजन का प्रस्ताव शासन को भेजा था, इसमें 10 पुलिस अधीक्षक (एसपी), 45 पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी), 250 इंस्पेक्टर, 440 उपनिरीक्षक, 585 मुख्य आरक्षी एवं कम्प्यूटर एनालिस्ट, कम्प्यूटर प्रोग्रामर, टेक्निकल अधिकारी और 60 वाहन चालक विभाग को मुहैया कराने का आग्रह किया गया था. यह भी कहा गया था कि नए पदों में उन्हें ही भर्ती किया जाएगा, जो कंप्यूटर में दक्षता रखने के साथ ही हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी के जानकार होंगे, लेकिन अब तक यह प्रस्ताव फाइलों के गर्दो-गुबार में पड़ा हुआ है. 

अब अगर आज के हालात पर चर्चा करें तो यूपी पुलिस का ख़ुफ़िया महकमा कुछ कर भी रहा है या नही? इसके बारे में पुलिस महकमें में ही कोई चर्चा नही होती. खुफिया महकमें के डीजी भी जब मुख्यमंत्री से मिलते हैं तो इसे लेकर कोई प्रेसनोट तक जारी नही होता. गृह विभाग से लेकर डीजीपी तक को पता है कि खुफिया महकमें को बजट, संसाधन और मैनपावर की जरूरत है. लेकिन उसकी इन जरूरतों पर किसी का ध्यान ही नही है. यह स्थिति कई सालों से है, जबकि चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं. राज्य में आए दिन आतंकवादियों और नक्सलियों से जुड़े लोग पकड़े जाते हैं. फिर भी ख़ुफ़िया महकमें के पृथक काडर बनाने पर विचार नही हो रहा और न ही इस संगठन के बजट, संसाधन और मैनपावर को बढ़ाए जाने को लेकर कोई सोच है. जिसके चलते अब खूफिया महकमा अग्रिम सूचनाएं देने में  बार-बार चूक रहा है. विकास दुबे के मामले में भी यही हुआ है. 


 


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