सरकार पर ग्रहण के बीच मध्यावधि चुनाव की आहट भी

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सरकार पर ग्रहण के बीच मध्यावधि चुनाव की आहट भी

यशोदा श्रीवास्तव

काठमांडू.प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को थोड़ी राहत मिलती नजर आ रही है.स्टैंडिंग कमेटी की लगातार सात बैठकों से सत्ता को लेकर लुकाछिपी का खेल चल रहा था.नेपाल की राजनीति का हाल यह था कि ओली की कुर्सी जाने में अबतब जैसी स्थिति थी.रविवार की बैठक भी मंगलवार तक के लिए फिर टल गई. इस बीच बड़ी खबर यह है कि ओली से लगातार स्तीफा मांगने वाले प्रचंड थोड़ा नरम पड़ गए. इस शर्त के साथ कि नवंबर में महासम्मेलन बुलाया जाय जिसमें तय होगा कि ओली को रहना चाहिए या नहीं?

नेपाल राजनीति के जानकार इसे ओली और प्रचंड के बीच सुलह की दृष्टि से देख रहे हैं, और यह भी कि इसमें राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने अहम भूमिका निभाई है. बताने की जरूरत नहीं कि ओली और राष्ट्रपति भंडारी के बीच राजनीति से हटकर भी गहरे संबंध हैं. इतने कि ओली जब भारत पर अपनी सरकार अपदस्थ करने का आरोप लगा रहे थे तो राष्ट्रपति की कुर्सी पर भी खतरा बता रहे थे.बहरहाल स्थितियां जो भी रही हो,ओली को कुछ दिन की मोहलत मिल गई. लेकिन एक नया सवाल उठ खड़ा हुआ कि प्रचंड के इतनी जल्दी पिघलने के पीछे राष्ट्रपति के ईतर क्या है?

बता दें कि ओली के नेतृत्व वाली नेकपा एमाले व प्रचंड के नेतृत्व वाली नेकपा माओवादी तीन साल पहले हुए आम चुनाव एक साथ मिलकर लड़े थे.यह बात यद्दपि कि सामने नहीं आया लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि दोनों के बीच फिफ्टी फिफ्टी का समझौता था.इधर ओली के कार्यकाल का ढाई वर्ष बीतते ही प्रचंड अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगे लेकिन ओली की तबियत बिगड़ गई. उन्हें अपनी दूसरी किडनी ट्रांसप्लांट के लिए अस्पताल में भर्ती होना पड़ा.इस बीच ढाई महीने और गुजर गए. प्रचंड खामोश थे.लंबी स्वास्थ्य विश्राम के बाद जब ओली सत्ता की बागडौर संभालने आए,उसके फौरन बाद से प्रचंड और ओली के बीच सत्ता की जंग शुरू हो गई. बीच में लिपुलेख, लिंपियाधुरा और कालापानी का मुद्दा आ गया.ओली ने इसे देशभक्ति का मुद्दा बनाकर भारत पर नेपाल के भूक्षेत्र पर कब्जे का झूठा आरोप मढ़ दिया.उन्होंने इस मुद्दे को इतना गर्माया कि यहां तक कह दिया कि भारत उनकी सरकार गिराना चाहता है. चूंकि ओली से स्तीफे कि मांग प्रचंड कर रहे थे इसलिए ओली समर्थकों ने प्रचंड को भारत के हाथ की कठपुतली प्रचारित करना शुरू कर दिया.प्रचंड अपनी राजनीतिक साख बचाने के लिए ओली को भारत पर लगाए गए आरोप को सिद्ध करने की चुनौती दे दी.यह भी कहा कि ओली से भारत नहीं मैं स्तीफा मांग रहा हूं.बहरहाल ओली के भविष्य को लेकर पार्टी स्टैंडिंग कमेटी की सात बैठकें हुई जो बे नतीजा रही. इस बीच सत्ता रूढ़ दल के दो बड़े नेता पूर्व पीएम माधव नेपाल व बामदेव गौतम भी ओली के खिलाफ खुलकर सामने आ गए. पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता नारायण काजी श्रेष्ठ तथा स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य भीम रावल भी ओली के विरोध में उतर गए. ओली के खिलाफ स्थितियां तेजी से बदल रही थी कि सरकार बचाने के लिए ओली ने सबसे पहले नौ मई से चल रहे बजट सत्र को ही स्थगित कर दिया.

घोर अंतरविरोध से जूझ रहे ओली ने हाल ही अयोध्या को लेकर भी विवादित बयान दिया कि वह नेपाल के वीरगंज में है. उन्होंने भारत पर नेपाल की संस्कृति पर अतिक्रमण करने का भी आरोप लगाया. इस बयान से भी ओली की खूब किरकिरी हुई.उन्हें अपने दल में ही उपहास का पात्र बनना पड़ा.इस तरह भारत विरोध में ऊलजलूल बयान के पीछे ओली की मंशा मात्र स्वयं को देशभक्त सिद्ध कर अपनी सरकार बरकरार रखना है. बावजूद इसके ओली सरकार के बचने की संभावना न के बरबर ही थी लेकिन अब जब मुख्य मुद्दई (प्रचंड) ही नरम पड़ गया तो "बकरा कुछ दिन और अपनी मां" के साथ रह ले.

सत्ता के इस जोर आजमाइश में प्रचंड के नरम पड़ने के पीछे कई कारण गिनाए जा सकते हैं. लेकिन इस मुद्दे पर नेपाली कांग्रेस सांंसद अभिषेक प्रताप शाह का कथन बड़ा स्पष्ट है जो कई संभावनाओं की ओर इंगित करता है. उनका कहना है कि अभी फिलहाल ओली पूर्ण बहुमत मे हैं लेकिन सरकार पर ग्रहण लग चुका है. एनकेन प्रकारेण यदि ओली अपनी सरकार बचा लेते हैं तो यह महज कुछ दिन के लिए ही मुमकिन है. ओली के जाने के बाद निस्संदेह पीएम पद के प्रबल दावेदार प्रचंड ही हैं लेकिन इधर माधव नेपाल, बामदेव गौतम तथा सुबाष न्योमांग का भी नाम सामने आया है. मौजूदा संसद में 36 सांसद प्रचंड गुट के हैं लेकिन इतने से तो सरकार बनती नहीं. इसी तरह नेकपा एमाले के 80 सांसद हैं. इसमें माधव नेपाल,बामदेव गौतम तथा पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं के समर्थक सांसद हैं.कुल 265 सदस्यों वाले प्रतिनिधि सभा में सरकार के लिए 83 सदस्यों का समर्थन जरूरी है. ओली के स्तीफे के बाद जरूरी सदस्य संख्या का दावा कोई नहीं कर सकता.ऐसे में नई सरकार को नेपाली कांग्रेस के 21 और मधेसी दलों के करीब एक दर्जन सदस्यों के समर्थन की जरूरत होगी.


अभिषेक शाह ने अपनी पार्टी का रुख साफ करते हुए कहा कि नेपाली कांग्रेस किसी से बंधी हुई नहीं है. लेकिन नेपाल को मध्यावधि चुनाव से बचाने के लिए,राजनीतिक अस्थिरता रोकने के लिए जो भी सरकार बनाने की स्थिति में होगा,उसे समर्थन दे सकती है.


अभिषेक प्रताप शाह के कथन से स्पष्ट है कि ओली की सरकार जाने की दशा में अपनी सरकार बनने को लेकर मुत्मइन न होना प्रचंड के नरम पड़ने की वजह हो सकता है. इस बीच नवंबर तक की मोहलत में वे अपनी स्थिति का मूल्यांकन और सरकार बनाने को लेकर गुणाभाग भी कर सकते हैं. अब राष्ट्रपति विद्या भंडारी ने किस शर्त पर ओली और प्रचंड के बीच सुलह करवाया, यह सामने नहीं आ सका लेकिन चर्चा तेज है कि नवंबर के महासम्मेलन में दो बातें हो सकती है, यदि नेकपा एमाले और नेकपा माओवादी के बीच गठबंधन लंबे समय तक बने रहने की गुंजाइश बनी तो ओली इस महासम्मेलन में प्रचंड को सत्ता सौंपने की घोषणा कर सकते हैं और यदि इसमें कुछ संशय हुआ तो किसी अन्य को सरकार बनाने की मोहलत देने के बजाय मध्यावधि चुनाव भी करा सकते हैं.


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