कमाल 'अनारकली-सलीम' बनाना चाहते थे

कांकेर ने जो घंटी बजाई है ,क्या भूपेश बघेल ने सुना उसे ? क्या मुग़ल काल भारत की गुलामी का दौर था? अधर में लटक गए छात्र पत्रकारों के बीमा का दायरा बढ़ाए सरकार बिहार चुनाव से दूर जाता सुशांत का मुद्दा सड़क पर उतरे ऐक्टू व ट्रेड यूनियन नेता किसानों के प्रतिरोध की आवाज दूर और देर तक सुनाई देगी क्या मोदी के वोटर तक आपकी बात पहुंच रही है .... खेती को तबाह कर देगा कृषि विधेयक- मजदूर किसान मंच दशहरे से दिवाली के बीच लोकतंत्र का पर्व बेनूर हो गई वो रुहानी कश्मीरी रुमानियत सिविल सर्जन तो भाग खड़े हो गए चंचल .. चलो भांग पिया जाए क्यों भड़काने वाले बयान देते हैं फारूक अब्दुल्ला एक समाजवादी धरोहर जेपी अंतरराष्ट्रीय सेंटर को बेचने की तैयारी कोरोना के दौर में राजनीति भी बदल गई बिशप फेलिक्स टोप्पो ने सीएम को लिखा पत्र राफेल पर सीएजी ने तो सवाल उठा ही दिया हरिवंश कथा और संसदीय व्यथा राष्ट्रव्यापी मजदूरों के प्रतिवाद में हुए कार्यक्रम

कमाल 'अनारकली-सलीम' बनाना चाहते थे

 वीर विनोद छाबड़ा
के आसिफ़ से पहले कमाल अमरोही 'मुगल-ए-आज़म' बनाना चाहते थे. दरअसल हुआ यों था कि जब के.आसिफ़ ने पहली मर्तबा 'मुगल-ए-आज़म' प्लान की थी तो उसमें अकबर के किरदार के लिए चंद्रमोहन को और सलीम के लिए सप्रू को चुना गया था. नरगिस अनारकली थी. फ़िल्म बस शुरू हुई ही थी कि तक़सीम हो गयी. इसके फाइनेंसर और प्रोड्यूसर शीराज़ अली हक़ीम पाकिस्तान चले गए. जब कमाल ने देखा कि आसिफ़ अब इसकी स्क्रिप्ट पर कोई काम नहीं कर रहे हैं तो उन्होंने एक बिलकुल अलग स्क्रिप्ट लिखी, 'अनारकली-सलीम'. तब तक कमाल की पहचान बतौर राइटर हुआ करती थी. अगर ये फिल्म बन जाती तो ये उनकी पहली डायरेक्ट की हुई मूवी होती. 'मुगल-ए-आज़म' के उलट इसमें अकबर पर फोकस कम था. उन्होंने अनारकली के लिए मीना कुमारी को चुना जो उस वक़्त पौराणिक फ़िल्मों में छोटे-मोटे रोल कर रही थीं. सलीम के किरदार में उन्होंने ओरीजिनल सलीम यानी सप्रू को ही फिट पाया.
'अनारकली-सलीम' की शूटिंग शुरू हुई. दो-तीन रील शूट हुई ही थीं कि फाइनेंसर सेठ माखनलाल को बिज़नेस में लाखों रूपए का घाटा हो गया. मोहब्बत के अफ़साने पर एक बार फिर ग्रहण लग गया. मगर कमाल मायूस नहीं हुए. उन्होंने अशोक कुमार-मधुबाला के साथ 'महल' (1949) बनाई. मधुबाला तब बहुत बड़ा नाम नहीं था. मगर 'महल' की बेमिसाल क़ामयाबी ने मधुबाला के साथ-साथ कमाल को स्टार डायरेक्टर बना दिया.
इधर के.आसिफ़ एक बार फिर 'मुगल-ए-आज़म' को लेकर अचानक एक्टिव हो गए. इस बीच चंद्रमोहन गुज़र चुके थे, लिहाज़ा अकबर के लिए पृथ्वीराज कपूर को लिया और सलीम-अनारकली के लिए दिलीप कुमार और मधुबाला को. सुना है पहले नूतन से भी बात हुई थी लेकिन नूतन ने मना कर दिया - अनारकली के किरदार में मुझसे बेहतर नरगिस या मीना कुमारी होंगी. उन दिनों नरगिस और दिलीप कुमार में पटरी नहीं खाती थी. ये एक अलग कहानी है, जिसका ज़िक्र फिर कभी. आख़िरकार मधुबाला को ही लिया गया. बताया जाता है शुरू में आसिफ़ ने मधु को रिजेक्ट कर दिया था लेकिन मधु-दिलीप की आशिकी में आसिफ को ऐसी चमक दिखाई दी जो मुगल-ए-आज़म के लिए ज़रूरी थी.
आसिफ़ को जब पता चला कि कमाल अमरोही ने भी 'अनारकली-सलीम' की स्क्रिप्ट पर काम किया है तो उन्होंने इस स्क्रिप्ट को मांगा. लेकिन कमाल ने मना कर दिया. उन्हें ख़तरा था कि उनकी स्क्रिप्ट की ओरिजिनलटी के साथ छेड़छाड़ हो सकती है. आसिफ़ ने एक लाख रूपए का ऑफर भी दिया, मगर कमाल तब भी नहीं माने. आसिफ़ बहुत नाराज़ हुए. मगर बावज़ूद इसके उन्होंने कमाल को स्क्रिप्ट राइटिंग से जोड़ लिया. उनके साथ वज़ाहत मिर्ज़ा, एहसान रिज़वी और अमानुल्लाह ख़ान भी जुड़े हुए थे. अमानुल्लाह (ज़ीनत अमान के पिता) तब कमाल अमरोही के जूनियर हुआ करते थे. कमाल उन्हें शागिर्द कहते थे. लेकिन कई बरस बाद जब फ़िल्म मुकम्मल होकर रिलीज़ हुई तो कमाल बहुत नाराज़ हुए. उन्हें स्क्रिप्ट राइटिंग में नहीं बल्कि डायलॉग के लिए क्रेडिट दिया गया. कमाल को नागवार ये भी गुज़रा कि स्क्रिप्ट राईटिंग में आसिफ़ ने खुद भी क्रेडिट लिया. कमाल का कहना था कि अगर वो चाहते तो कानून की मदद ले सकते थे क्योंकि उनके पास ओरिजिनल स्क्रिप्ट मौजूद थी.
बहरहाल, कमाल के दिल में एक किस्म की बग़ावत ने जन्म ज़रूर ले लिया कि वो आसिफ़ की 'मुगल-ए-आज़म' से बड़ा क्लासिक बना कर दिखाएंगे. कालांतर में उनकी 'पाकीज़ा' (1972) ज़रूर बहुत बड़े स्केल पर बनी, चली भी खूब, मगर मीना कुमारी की मौत की वज़ह से. हालांकि कमाल साहब का दावा था, कि मीना की मौत से पहले ही ये फ़िल्म अच्छा-ख़ासा बिज़नेस कर चुकी थी. पाकीज़ा की क़ामयाबी से मिले बेइंतहा पैसे से कमाल को लगा कि अब 'मुगल-ए-आज़म' से बड़ी फिल्म बनाने का वक़्त आ गया है. इस सिलसिले में उन्होंने 'रज़िया सुलतान' बना डाली, उस दौर के मशहूर सितारे हेमा-धर्मेंद्र को लेकर. मगर ये बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी. इसकी कई वज़हें रहीं, जिनमें बाज़ क्रिटिक्स के मुताबिक सबसे बड़ी वज़ह रज़िया के किरदार में हेमा मालिनी का ग़लत इंतखाब होना था. वो हर फ्रेम में रज़िया नहीं हेमा मालिनी नज़र आयीं और इसके लिए काफी हद ज़िम्मेदार डायरेक्टर कमाल अमरोही माने गए जो हेमा में रज़िया का किरदार पैदा नहीं कर सके.

  • |

Comments

Subscribe

Receive updates and latest news direct from our team. Simply enter your email below :