एदुआर्दो गालेआनो को याद करते हुए

क्या मुग़ल काल भारत की गुलामी का दौर था? अधर में लटक गए छात्र पत्रकारों के बीमा का दायरा बढ़ाए सरकार बिहार चुनाव से दूर जाता सुशांत का मुद्दा सड़क पर उतरे ऐक्टू व ट्रेड यूनियन नेता किसानों के प्रतिरोध की आवाज दूर और देर तक सुनाई देगी क्या मोदी के वोटर तक आपकी बात पहुंच रही है .... खेती को तबाह कर देगा कृषि विधेयक- मजदूर किसान मंच दशहरे से दिवाली के बीच लोकतंत्र का पर्व बेनूर हो गई वो रुहानी कश्मीरी रुमानियत सिविल सर्जन तो भाग खड़े हो गए चंचल .. चलो भांग पिया जाए क्यों भड़काने वाले बयान देते हैं फारूक अब्दुल्ला एक समाजवादी धरोहर जेपी अंतरराष्ट्रीय सेंटर को बेचने की तैयारी कोरोना के दौर में राजनीति भी बदल गई बिशप फेलिक्स टोप्पो ने सीएम को लिखा पत्र राफेल पर सीएजी ने तो सवाल उठा ही दिया हरिवंश कथा और संसदीय व्यथा राष्ट्रव्यापी मजदूरों के प्रतिवाद में हुए कार्यक्रम समाज के राजनीतिकरण पर जोर देना होगा

एदुआर्दो गालेआनो को याद करते हुए


मनोहर नायक

वह 14 अप्रैल 2015 का दिन था, रोज़ की तरह मैं अपने मित्र, टाइम्स ऑफ़ इंडिया में स्पोर्ट्स के ग्रुप एडीटर आलोक सिन्हा के साथ आईटीओ में इंडियन एक्सप्रेस बिल्डिंग के लिये निकला . आलोक फ़ुटबॉल के फ़ैन और चेल्सी उनका पसंदीदा क्लब है . रास्ते में बातचीत शुरू करते हुये मैंने कहा कि एदुगार्दो गालेआनो के निधन ( 13 अप्रैल) की ख़बर हिंदी-अंग्रेज़ी में तो और कहीं है नहीं, आपके यहाँ अच्छी है पर खेल पन्ने पर है . उन्होंने कहा कि उनकी फ़ुटबॉल पर अद्भुत पुस्तक है, मैंने कहा कि पर उनकी और भी चर्चित पुस्तकें हैं जिनमें एक को तो क्लासिक का दर्ज़ा हासिल है,... उन्हें कम से कम विदेश पेज पर वैसा ही स्पेस देना चाहिए था जैसा ग्रास ( जर्मन कवि, उपन्यासकार ग्यूंटर ग्रास का निधन भी उसी दिन हुआ था) को दिया गया , आलोक सहमत हुए .अगले दिन फिर इसी पर चर्चा हुई क्योंकि उस दिन टाइम्स समूह के ही इकॉनामिक्स टाइम्स ने एदुगार्दो पर टिप्पणी छापी , वही खेल पन्ने पर.... शायद तीसरे या चौथे दिन कवि, लेखक असद ज़ैदी उन्हें तब अख़बारों की मुख्यभूमि में लाये जब उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस के सम्पादकीय पृष्ठ पर गालेआनो का समग्र, सारगर्भित मूल्यांकन पेश किया . एदुगार्दो की पहली पुस्तक जो हस्तगत हुई, वह ' ओपेन वेन्स ऑफ़ लैटिन अमरीका ' थी, इसे असद ज़ैदी के three essays collective ने प्रकाशित किया था... पर उरुग्वे के इन महामना से शायद 2009 में किंचित परिचित तब हुआ जब ' इंडिया टुडे ' के हमारे मित्र मोहम्मद वक़ास ने नेट पर उनकी किसी किताब पर आधारित स्टोरी 'आज समाज ' के लिये भेजी थी, जहां में तब काम करता था .
2010 के विश्व कप में 'आज समाज ' में ही फ़ुटबॉल पर उनकी किताब के नेट पर उपलब्ध हिस्सों से एक पेज बनाया--- गोल, गोलकीपर, रेफ़री, मैनेजर, पेले आदि . मैं अनुवाद करके पास ही बैठे कार्टूनिस्ट मित्र मंसूर नक़वी को देता जाता और मंसूर इन पर बेहतरीन रेखांकन बनाते जाते . फिर बाद में 'ओपेन वेन्स...' मिली . प्रेस क्लब में एक दिन अचानक मित्र आलम श्रीनिवासन दोस्ताने में ' मिरर्स ' दे गये . कुछ महीनों बाद यह यहाँ से वहाँ हो गयी जहाँ से फिर कोई ख़बर नहीं आती , बाद में यह मुश्किल से और महंगी मिली .अब तो उनकी अनेक पुस्तकें ठीकठाक दाम पर अमेज़न आदि पर सुलभ हैं . अच्छी बात यह है कि अब उनकी पुस्तकें हिंदी में भी अनुदित हो रहीं हैं... गार्गी प्रकाशन ने रेयाज़ुल हक़ के सम्पादन में उनकी चुनी हुई रचनाओं के अंशों को लेकर ' आग की यादें ' पुस्तक निकाली है, जो उन्हें जानने में काफ़ी मददगार है . गार्गी ने ही ' ओपेन वेन्स ऑफ़ लैटिन अमरीका ' का अनुवाद ' लातिन अमरीका के रिसते जख़्म ' के नाम से किया है... दिनेश पोसवाल का अनुवाद सहज और बढ़िया है . यह एदुआर्दो की कालजयी कृति है... इस पर लौट कर आते हैं, पहले थोड़ा फ़ुटबॉल...!
खेलों के बेतरह शौक़ीन और टेनिस व फ़ुटबॉल पर लट्टू मेरे बेटे आनंद ने कुछ साल पहले जन्म दिन पर भेंट दी थी, ' सॉकर इन सन एंड शैडो '... वही मशहूर किताब जिसके कारण गालेआनो दो राष्ट्रीय अख़बारों में खेल के पन्नों में महदूद होकर रह गये थे . अपने देश के और बच्चों की तरह एदुआर्दो भी फ़ुटबॉल खिलाड़ी बनना चाहते थे... खिलाड़ी न बन पाये पर उसके जुनून की गिरफ़्त में ताउम्र रहे . पुस्तक के 'आत्म स्वीकृति ' अध्याय में वे लिखते हैं, ' ... सालों बीत गये और अंतत: अपने को स्वीकार करना मैंने सीख लिया, कि मैं कौन हूँ : अच्छी फ़ुटबॉल का एक भिखारी . मैं दुनिया भर में, स्टेडियमों में हाथ फैलाये जाता हूँ और कहता हूँ : ' भगवान के लिये एक सुंदर मूव .' और जब बढ़िया फ़ुटबॉल होती है तो मैं धन्यवाद देता हूँ और मैं इसकी ख़ाक परवाह नहीं करता कि कौन सी टीम या देश यह कारनामा कर रहा है . ' एदुआर्दो के इस मिज़ाज से प्रेरित होकर फ़ुटबॉल देखने का तनाव काफ़ी कम हुआ .
' स्टेडियम ' अध्याय में वे लिखते हैं, ' क्या आप कभी ख़ाली स्टेडियम में गये हैं . कोशिश कीजिये ... मैदान के बीचोंबीच खड़े होइये और सुनिये . एक ख़ाली स्टेडियम से ख़ाली और कोई कुछ नहीं होता . दर्शक विहीन स्टेडियम से ज़्यादा नि:शब्द भी और कुछ नहीं होता .... वेम्बले में, 1966 के वर्ल्ड कप का शोर, जिसे इंग्लैंड ने जीता था, आज भी सुनायी देता है . और अगर ध्यान से सुनें तो 1953 की कराहें भी सुनाई देंगी जब हंगेरियनों ने इंग्लैंड को हराया था . मोंतेविदेओ का सेंतेनेरियो स्टेडियम अतीत राग में डूबा हुआ उरुग्वे फ़ुटबॉल के वैभव के दिनों की आहें भरता रहता है . ब्राज़ील की 1950 में हुई हार के लिए माराकाना आज भी रुआंसा है . ब्यूनस आयर्स से बॉमबोनेरा में आधी सदी पहले के ड्रम आज भी गूंजते हैं . मिलान में गियूसेप्पे मिआज्जा का प्रेत गोल मारता रहता है, जिससे उसके नाम वाला स्टेडियम हिल उठता है . म्युनिख के ओलम्पिक स्टेडियम में 1974 का फ़ाइनल मैच, जो जर्मनी जीता, हर दिन, हर रात खेला जाता है . साउदी अरेबिया के किंग फ़हद स्टेडियम में बैठने के लिये संगमरमर और सोने के बॉक्स हैं और स्टैंड में भी कालीन चढ़ा हुआ है, लेकिन उसके पास कोई स्मृति नहीं है, और न बताने के लिये कुछ .' ' फ़ैन ' अध्याय में लिखते हैं , ' सप्ताह में एक बार फ़ैन घर से भागकर स्टेडियम पहुँच जाता है . हल्ला मचाने वालों के शोर से हवा भरी रहती है, ड्रम्स, पटाखे और बैनर . शहर ओझल हो जाता है, दिनचर्या भुला दी जाती है. मंदिर बच रहता है . फ़ैन चाहे तो यह सब टीवी पर देख ले, पर वह इस पवित्र जगह की तीर्थयात्रा करना पसंद करता है, जहाँ वह अपने देवताओ को उस दिन के राक्षसों के साथ साक्षात् युद्ध करता देख सकता है. यहाँ फ़ैन अपना रूमाल हिलाता है, अपना थूक गुटकता है, पित्त भड़काता है, प्रार्थनाएँ बुदबुदाता है और कोसता है, और अचानक पूरे ज़ोर से चिल्लाता है , गोल होने के आह्लाद में वह पिस्सू की तरह लपकते हुए बगल के अनजान व्यक्ति के गले लग जाता है . फ़ुटबॉल का फ़ैन निश्चित तौर पर जानता है कि हम सबसे अच्छे हैं, रेफ़री धूर्त है और प्रतिद्वंद्वी बेईमान . शायद ही कोई फ़ैन कहे कि, ' आज मेरा क्लब खेलेगा .' वह कहता है , 'आज हम खेलेंगे . ' मैच ख़त्म हो जाता है, फ़ैन जो स्टैंड से अभी हटा नहीं है, अपनी जीत का जश्न मनाते हुए कहता है, ' हमने क्या सुंदर गोल किया .' ... गालेआनो की नज़रों से कुछ ओझल नहीं होता . 1930 के विश्व कप का जायज़ा लेते हुए वे लिखते हैं, ' मर्लिन डाइटरिच "फ़ालिंग इन लव अगेन " गा रही थीं, मायकोव्स्की इस समय आत्महत्या कर रहे थे, वहीं अंग्रेज़ गांधी को जेल में डाल रहे थे, क्योंकि वे अपने प्यारे देश के लिये आज़ादी मांग रहे थे .' 'मैनेजरों ' के अध्याय में लिखते हैं, ' मैनेजर फ़ुटबॉल को विज्ञान और मैदान को प्रयोगशाला मानते हैं , लेकिन इन मालिकों के लिये आइंस्टीन की मेधा और फ्रायड की सूक्ष्मदर्शिता काफ़ी नहीं. उन्हें तो गांधी जैसी सामर्थ्य के साथ " लेडी ऑफ़ लॉर्ड्स " जैसी चमत्कारी शक्ति भी चाहिए .'
गालेआनो का जन्म उरुग्वे की राजधानी मोंतेविदेओ में 3 सितम्बर 1940 को हुआ था . वे क्यूबा की क्रांति से प्रभावित 1960 की ' बूम जनरेशन ' की उपज थे . वे कोई प्रशिक्षित इतिहासकार नहीं थे, वे ख़ुद को ' पत्रकारिता की औलाद' कहते थे . एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि, ' पत्रकारिता को साहित्य का स्याह पक्ष मानने की एक परम्परा है, मैं इसे नहीं मानता . मैंने कई किताबें लिखीं हैं, पर मैं पत्रकार के रूप में ही प्रशिक्षित हुआ . मैं पत्रकारिता का आभारी हूँ कि उसने दुनिया की सच्चाई के प्रति मुझे जगा दिया . ' 1960 में पत्रकारिता की शुरुआत में 'मार्चा ' पत्रिका और फिर दैनिक 'एपोका ' का सम्पादन किया . इस दौरान चार साल के शोध के बाद लातिन अमरीका के इतिहास पर 1970 में उन्होंने पुस्तक लिखनी शुरू की , जो आगे चलकर प्रमाणिक दस्तावेजी पुस्तक मानी गयी . यह किताब थी ' लास वेनास आबिएर्तास दे अमेरिका लातीना ' अंग्रेज़ी में यह कहलायी ' ओपेन वेन्स ऑफ़ लैटिन अमरीका . ' 1973 में उरुग्वे में तख्ता पलट के बाद इस पर पाबंदी लगा दी गयी . चिली. ब्राजील और अर्जेटीना ने भी इस पर प्रतिबंध लगाया . यह पुस्तक लातिन अमरीका के शोषण- उत्पीड़न, संसाधनों की खोखला कर देने वाली लूट , बर्बर दमन, अत्याचार और तानाशाहियों की दारुण व रोमांचक दास्तान है . इसको लेकर अनेक क़िस्से मशहूर हैं . एक इंटरव्यू में एदुआर्दो ने अत्यंत दिलचस्प और विनोदी भाव से इस पुस्तक के लिखने को लेकर बातें की थीं, ' इस किताब का असली लेखक कॉफ़ी है. मैंने समुद्र के बराबर कॉफ़ी पी, क्योंकि तब 1970 में सुबह के समय मैं मोंतेविदेओ के विश्विद्यालय में काम करता था . मैं विश्विद्यालय प्रकाशनों का सम्पादक था . दोपहर में बतौर सम्पादक मैं एक निजी प्रकाशक के यहाँ काम करता था जहाँ मुझे हर तरह की किताबों को फिर से लिखना और सुधारना पड़ता था . आप जितनी तरह की किताबों की कल्पना कर सकते हैं, उतनी तरह की किताबें, जैसे कि मच्छरों का यौन जीवन . तब शाम के सात या आठ बजे से लेकर सुबह के पांच या छह बजे तक में ओपेन वेन्स लिखता था . '
तख्ता पलट के बाद एदुआर्दो को देश छोड़ना पड़ा . वे अर्जैटीना गये वहाँ अपनी मशहूर पत्रिका ' क्रिसिस ' (संकट) शुरू की .1976 में अर्जेटीना में तख्ता पलट के कारण उन्हें वह देश छोड़ना पड़ा क्योंकि उनका नाम उन लोगों की सरकारी फ़ेहरिस्त में था, जिन्हें हत्यारे दस्ते द्वारा मार दिया जाना था . उनका यह निर्वासित और फ़रारी जीवन एक दशक चला . गालेआनो स्पेन में रहे, जहाँ उन्होंने तीन खंडों में लातिन अमरीका का वैकल्पिक इतिहास लिखा, 'मेमोरी देल फ़ुएगो ' (आग की यादें) ... अंग्रेज़ी में यह तीन खंडों में ' मेमोरी ऑफ़ फ़ायर ' नाम से छपी और बेहद मक़बूल हुई. 1985 में वे देश लौटे . उनकी अन्य प्रमुख किताबें हैं ' डेज एंड नाइट्स ऑफ़ लव एंड वार ' , ' अब बुक ऑफ़ एम्ब्रसेज ' , 'अपने साइड डाउन : अप्रीमियम फ़ॉर द लुकिंग ग्लोबल वर्ल्ड ' , ' वॉयेजर ऑफ़ टाइम ' , 'मिरर्स ' आदि . उनकी कविता और कथा की पुस्तकें भी हैं . गालेआनो विश्व नागरिक हैं . वे हर तरह के पीड़ितों, वंचितों के प्रवक्ता हैं, ख़ास तौर पर बच्चों व महिलाओं के...सचाई और हक़ के तरफ़दार हैं, हर तरह के झूठ, फ़रेब, पाखंड के वे शत्रु हैं, लूट की संस्कृति, मुनाफाखोरी और समाज व मानवीय, संबंधों को पतित करती शक्तियों से उन्हें नफ़रत है . उनके लेखन में इसलिये ग़ुस्सा. आवेश और तीक्ष्णता है, लेकिन उनकी शैली मोहक और विचारोत्तेजक है... वह आपको अंतरंग बनाती चलती है .अपनी इस शैली का आविष्कार उन्होंने ही किया है, जिसके गद्य में कविता की लय और लालित्य है . अपने उसी इंटरव्यू में वे कहते हैं, ' मैंने इतिहास को फिर से ऐसी भाषा में लिखने की कोशिश की जिसे कोई भी समझ सके .'
अब उनके कुछ विचार, कुछ बातें जो हमें सोच-विचार का स्फुरण देतीं हैं. ध्यान देने योग्य यह है कि गालेआनो ने मुख्यतः ये बातें लातिन अमरीका के देशों, समाजों, तानाशाहियों के बारे में लिखीं हैं, लेकिन वे हमारे जीवन के आसपास की स्थितियां लगती हैं . कल, तीन सितम्बर को उनका जन्मदिन था , उनके अनमोल योगदान को याद करते हुए उनकी विरासत में से कुछ बातें . एदुआर्दो की चुनिंदा अंशों की किताब 'आग की यादें ' में ऐसे अनेकानेक अध्याय हैं , उनका क्रम भंग करते हुए उनमें से कुछ :
' मेहनत के बंटवारे की शुरुआत ' : कहते हैं कि यह राजा मनु थे, जिन्होंने भारत की जातियों को दैवीय बनाया . उसके मुंह से पुरोहित पैदा हुए, उसकी बांहों से राजा और योद्धा . उसकी जांघों से व्यापारी . उसके पैरों से ग़ुलाम और कारीगर .
और इस बुनियाद पर एक सामाजिक पिरामिड खड़ा हुआ, भारत में जिस पर तीन हज़ार से ज़्यादा कहानियों हैं.
हरेक वहीँ पैदा हुआ जहाँ उसे पैदा होना चाहिए. वही करने के लिए, जो उसे करना चाहिए . पालने में ही क़ब्र है और पैदाइश ही मंज़िल है-- हमारी ज़िंदगियां हमारी पहले की ज़िंदगियों का मुआवज़ा है या वाजिब सज़ा... .
व्यवस्था : ... कि वह कम्प्यूटर प्रोग्राम जो बैंकर को सतर्क करता है, बैंकर जो राजदूत को सचेत करता है, राजदूत जो फ़ौज़ी जनरल के साथ खाना खाता है, फ़ौज़ी जनरल जो राष्ट्रपति को मिलने के लिये बुलाता है, राष्ट्रपति जो मंत्री पर रोब दिखाता है, मंत्री जो महानिदेशक को धमकी देता है, महानिदेशक जो प्रबंधक को ज़लील करता है, प्रबंधक जो अफ़सर पर चीखता है, अफ़सर जो कर्मचारियों की तौहीन करते हैं, कर्मचारी जो मजदूरों को फटकारते हैं, मजदूर जो बीबियों से बदसलूकी करते हैं, बीबियाँ जो बच्चे को पीटती हैं, बच्चे जो कुत्तों को लात मारते हैं .
सवाल यह है कि हम जैसे लोग जो बेआवाज़ लोगों की आवाज़ बनना चाहते हैं वे इस भयानक माहौल में कैसे काम करें ? जब डंडे और बाज़ार के ज़ोर से सबको गूंगा- बहरा बनाया जा रहा है तब क्या हम अपनी बात सुना सकते हैं? आज के हमारे लोकतंत्र दरअसल चुप्पी और डर पैदा करने वाले लोकतंत्र हैं ., .. हम जैसे समाजों में रह रहे हैं वहां आबादी के बड़े हिस्से की रचनात्मक क्षमताओं और सम्भावनाओं को लगतार ख़त्म किया जा रहा है . ... गरीबों को अमीरी, ग़ुलामों को आज़ादी, हारे हुओं को जीतने और जिनकी हड्डियां तक चूस ली गयी हैं उन्हें दुनिया पर राज करने के सपने बेचे जाते हैं . ग़ैर बराबरी पैदा करने वाली व्यवस्था को बनाये रखने की ज़रूरत का अहसास टीवी, रेडियो और फ़िल्में कराती हैं जो दिन-रात सबके समझ में आ सकने वाले अंदाज में व्यवस्था का संदेश फैलाती रहती हैं . हमें सिखाया जाता है कि दुनिया हमेशा से ऐसी ही है और सब कुछ ठीक चल रहा है . शासन करने वाला दल ही देश हो जाता है और विरोध की आवाज़ उठाने वाले को बड़ी आसानी से गद्दार या विदेशी जासूस करार दिया जाता है . 'जंगल के कानून ' को ' कानून का राज ' घोषित कर दिया जाता है .
पैसे की बर्बादी, भद्दा प्रदर्शन और अच्छे- बचने का ख़याल न करते हुए सिर्फ़ आपका मतलब निकालना अब कोई बुरी बात नहीं समझी जाती बल्कि कामयाब इनसान की पहचान मानी जाती है . यहाँ सब कुछ खरीदा, बेचा, किराये पर लिया और खाया-पचाया जा सकता है, यहाँ तक कि आत्मा भी . आजकल सिगरेट, गाड़ी, शराब की बोतल या घड़ी इन्सान को कुछ और होने तथा किसी और दुनिया में ही होने का जादुई अहसास देती है . विदेशी नायकों की भरमार, धनी देशों से आये ब्रॉण्डों और फ़ैशन के लिए हमारी सनक का ही नतीजा है. टीवी और सिनेमा के पर्दै देशों की सामाजिक समस्याओं और ज़मीनी राजनीतिक हालातों से कोसों दूर बनावटी और अश्लीलता की एक अलग दुनिया रचते हैं . पश्चिमी देशों से लाये गये टीवी कार्यक्रम यूरोप और अमरीका छाप लोकतंत्र का पाठ पढ़ाते हैं और वह भी बन्दूक और फ़ास्ट फ़ूड की जयजयकार के साथ .
.... साहित्य के लिए सबसे बड़ा काम बेहतर दुनिया की हमारी साझी समझ के ख़िलाफ़ बेधड़क और खुलेआम चल रहे सरकारीकरण और बाज़ारीकरण से शब्दों को बचाना है. क्योंकि आजकल 'आज़ादी' मेरे देश की एक जेल का नाम है और तानाशाह सरकारों ने ख़ुद को 'लोकतंत्र ' घोषित कर रखा है . अब ' प्यार' इनसान का अपनी गाड़ी से लगाव है, और 'क्रांति' बाज़ार में आये किसी नये ब्रॉण्डों के धमाकेदार प्रचार के काम आ रही है .अब हमें ख़ास और क़ीमती ब्रॉण्डों का साबुन रगड़ने में ' गर्व ' और फ़ास्ट-फ़ूड खाने पर ' ख़ुशी' का अहसास होता है. ' शान्त देश ' दरअसल बेनाम क़ब्रों की लगातार बढ़ती जाने वाली क़तार है और ' स्वस्थ' इनसान वह है जो सब कुछ देखता और चुप रहता है .
विद्यार्थी : दिन- प्रतिदिन बच्चों को बचपन के अधिकार से दूर किया जा रहा है. इस अधिकार की हंसी उड़ाते सच अपनी सीखें हम तक रोज़ाना पहुँचाते हैं. हमारी दुनिया धनी बच्चों को यूँ देखती है मानो वे कोई चलती-फिरती तिजोरी हों . और फिर होता यह है कि ये बच्चे असल ज़िंदगी में भी ख़ुद को रुपया-पैसा ही समझने लगते हैं.दूसरी ओर, यही दुनिया ग़रीब बच्चों को कूड़ा-कचरा समझते हुए उन्हें घूरे की चीज़ बना डालती है और मध्य वर्ग के बच्चे, जो न अमीर हैं न ग़रीब , यहाँ टीवी से यूँ बांध दिये गये हैं कि बड़ी छोटी उमर से ही इस क़ैदी जीवन के ग़ुलाम हो जाते हैं .फ़ास्ट-फ़ूड, तेज़ कारें, तेज़ ज़िन्दगी .... धनी अपने कुछ होने का अहसास बच्चे आसामान निगलते, टीवी चैनल बदलते बड़ी- बड़ी खरीदारी करते हुए पाते हैं साइबर दुनिया में घूमते इन साइबर बच्चों का नाम अकेलापन शहरों की गलियों में भटकते बेसहारा बच्चों की तरह ही होता है . धनी बच्चे जवान होकर अकेलापन ख़त्म करने और तमाम डर भुलाने के लिये नशीली दवाएं ढूंढे, इसके बहुत पहले से ही ग़रीब बच्चे पेट्रोल और गोंद में छुपा नशा ले रहे होते हैं. वहीं, जब धनी बच्चे लेजर बन्दूकों के साथ युद्ध का खेल लिए खेलते हैं , गली के बच्चों को असली गोलियां निशाना बना रही होती हैं . . .. हक़ीक़त फ़िल्मों की नकल करती है : हर चीज़ उड़ रही हैं .
बच्चे मैकडोनॉल्ड के हैपी मील में अटलांटिस से मिसाइल हासिल करमते हैं. कैचअप और ख़ुन में फ़र्क़ करना मुश्किल से मुश्किलें होता जा रहा है .
इस दुनिया में नाइंसाफी बड़े पैमाने पर है . कुछ सौ के पास पूरी मानवता की कुल आमदनी का आधा है . यह रोटियों और मछलियों का नाइंसाफ़ी भरा बंटवारा है . दुनिया एक हिंसक जगह है और अगर एक ग़रीब आदमी कुछ चुरा लेता है या अपहरण करता है या मार देता है तो इसकी निंदा करना बहुत आसान है . लेकिन इसकी जड़ों की तलाश करना और उस व्यवस्था की निंदा करना इतना आसान नहीं है जो अपराधों और नशीली दवाओं के इस्तेमाल की वजह है . हरेक दिन हरेक आदमी बहुत सारा आक्रोश और ग़ुस्सा पी रहा है .

अदालतें : लेखक डेनियल ड्रीम कहते हैं कि क़ानून मकड़ी का एक ऐसा जाल है, जिसे मक्खियों और छोटे कीड़ों को पकड़ने के लिये बुना गया है, न कि बड़ी प्रजातियों का रास्ता रोकने के लिए . एक सदी पहले, कवि खोसेर एरनदिस ने क़ानून की तुलना एक छुरे से की थी, जो कभी उसकी ओर नहीं मुड़ता, जिसने उसे पकड़ रखा हो .
व्यवस्था : हर महीने एक नयी जेल का उद्घाटन होता है. यह वह चीज़ है, जिसे अर्थशास्त्री ' विकास योजना ' कहते हैं .
लेकिन नहीं दिखने वाली जेलों का क्या? कौन सी आधिकारिक रिपोर्ट या विपक्ष की आलोचनाएँ उन लोगों की फ़ेहरिस्त पेश करती है, जिन्हें ख़ौफ़ ने क़ैदबंद कर रखा है . अपनी नौकरी गंवाने का ख़ौफ़, कम नहीं मिलने का ख़ौफ़, बोलने का ख़ौफ़, सुनने का ख़ौफ़, पढ़ने का ख़ौफ़ . ख़ामोशी के मुल्क़ में, आपकी आंखों की रोशनी आपको एक यातना शिविर में फेंक सकती है . किसी कर्मचारी को जलाना ज़रूरी नहीं है, उसे यह बता देना ही काफ़ी है कि उसे फ़ौरन बरख़ास्त कर दिया जायेगा और आगे उसे कोई काम नहीं देगा . सेंसरशिप की सचमुच तब जीत होती है जब हरेक नागरिक अपनी हरकतों और बातों के लिए ख़ुद एक संगदिल सेंसर में तब्दील हो जाये .
तानाशाही बैरकों और पुलिस थानों, छोड़े हुए रेल के डिब्बों और बेकार पड़ी नावों को जेल में बदल देती हैं . क्या ये हरेक इनसान के घर को भी जेल में नहीं बदल देतीं ?
हमारा कारगर होना हमारी निर्भीकता, चतुराई, स्पष्टता और दूसरों को अपनी ओर खींचने की क्षमता पर निर्भर करता है . मुझे उम्मीद है कि हम एक ऐसी भाषा का सृजन कर सकते हैं, जो गोधूलि का स्वागत करने वाली परम्परावादी लेखकों की भाषा से कहीं अधिक निर्भय और सुंदर होगी .

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