उर्दू अख़बार से -इंसाफ अभी बाकी है

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उर्दू अख़बार से -इंसाफ अभी बाकी है

हिसाम सिद्दीक़ी
शहरियत तरमीमी कानून (सीएए) मुखालिफ मुजाहिरीन और कश्मीर से दफा-370 हटाकर रियासत को दो यूनियन टेरिटरीज में तकसीम किए जाने के मरकजी सरकार के फैसले की मुखालिफत करने वालों पर हुए और हो रहे सरकारी मजालिम के मामलात में कुछ महीनों से सुप्रीम कोर्ट का जो रवैय्या रहा है उससे गरीब तबकों खुसूसन मुसलमानों में मायूसी का जो माहौल पैदा हो गया था, डाक्टर कफील खान के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस गोविंद माथुर और जस्टिस एस डी सिंह की बेंच ने जिस किस्म के कमेण्ट्स के साथ कफील को जमानत दी उस फैसले ने लोगों में अदलिया (न्यायपालिका) के रवैय्ये से पैदा हुई मायूसी को खत्म करने में बहुत बड़ी मदद की है. इससे पहले बाम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने तब्लीगी जमात के लोगों और दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली दंगों के बहाने शहरियत तरमीमी कानून (सीएए) के खिलाफ मुजाहिरा करने वाली देवांगना कलिता को जमानत देकर मुल्क को बता दिया था कि मुल्क में सिर्फ पुलिस राज और सरकारी ज्यादतियां ही नहीं चलने दी जाएंगी क्योंकि इंसाफ अभी जिंदा है. इन फैसलों ने देश के दबे कुचले तबकों, दलितों और मुसलमानों को बहुत बड़ी हद तक तकवियत पहुचाई है.
वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी के जिस गुजरात माडल का जिक्र बार-बार किया जाता है उस माडल का एक अहम पहलू यह भी है कि अदालतों पर दबाव डाल कर या प्रासीक्यूटर्स यानी सरकारी वकीलों की मदद से हर फैसला सरकार के या सरकार जिसे चाहे उसी के हक में कराना. आहिस्ता-आहिस्ता यह माडल सुप्रीम कोर्ट से निचली अदालतों तक पर नाफिज होता दिखने लगा. कम से कम तीन चीफ जस्टिस आफ इंडिया जस्टिस पी सदाशिवम्, जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस रंजन गोगोई के कई फैसलों से ऐसा लगा कि अब सुप्रीम कोर्ट भी मोदी सरकार के दबाव में फैसले करने लगा है. बीजेपी सरकारों वाले प्रदेशों के कई हाई कोर्टों के कई जज साहबान के काम-काज को देख कर ऐसा भी लगा कि जैसे हाई कोर्ट प्रदेश सरकार के जबरदस्त दबाव में हो. शहरियत कानून (सीएए) मुखालिफीन के साथ उत्तर प्रदेश सरकार ने जो जुल्म और ज्यादतियां कीं प्रदेश की निचली अदालतें सरकार के हक में खड़ी दिखीं. लखनऊ में इंसानी बिरादरी के सदर मोहम्मद शोएब एडवोकेट, शहर के मशहूर समाजी वर्कर दीपक कबीर, रिटायर्ड आईजी बुजुर्ग एस आर दारापुरी और सदफ जाफर के मामलात पर एक नजर डालने से वाजेह (स्पष्ट) होता है कि इन सभी को गलत तरीके से फंसाया गया था. इसके बावजूद निचली अदालत ने सिर्फ पुलिस की बात सुनकर इन लोगों को जेल भेज दिया. अब इलाहाबाद हाई कोर्ट बाम्बे हाई कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट ने कई मामलात में मुबय्यना (कथित) मुल्जिमान को इंसाफ देकर अवाम के सामने न सिर्फ यह जाहिर किया है कि इंसाफ अभी बाकी है बल्कि यह भी मैसेज दिया है कि देश की अदलिया (न्यायपालिका) पूरी तरह गैर जानिबदारी (निष्पक्षता) के साथ काम करती है. कोई कितनी भी कोशिश क्यों न कर ले देश की अदलिया संविधान और कानून के मुताबिक ही काम करेगी.
अदालतों और जज साहबान खुसूसन सुप्रीम कोर्ट के लिए कहा जाता है कि उनका अस्ल काम कानून की तशरीह (व्याख्या) करने का होता है साथ ही वह यह भी देखती है कि सरकार या पुलिस ने जिस किसी के खिलाफ सख्त कानूनों का इस्तेमाल किया, उसके खिलाफ इस्तेमाल कानून की जरूरत थी भी या नहीं? कुछ दिनों से जज साहबान की अक्सरियत ने मुकदमात को इस नजर से देखने के बजाए पुलिस और सरकारी बयानात पर ही भरोसा करके मामलात को देखना शुरू कर दिया था. इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस गोविंद माथुर ने डाक्टर कफील खान के मामले में वही किया जो एक आदर्श अदालत को करना चाहिए था पुलिस ने इल्जाम लगाया था कि अलीगढ मुस्लिम युनिवर्सिटी में भड़कीली तकरीर करते हुए डाक्टर कफील ने देश तोड़ने और समाज में नफरत का जहर घोलने का काम किया. आज कल आम तौर पर अदालतें पुलिस और सरकारी फर्दे जुर्म पढ कर ही मामलात की सुनवाई करने लगी हैं. लेकिन जस्टिस माथुर ने आंख बंद करके सरकारी कहानी पर एतबार नहीं किया. उन्होंने इंसाफ और कानून के तकाजों को पूरा करते हुए  कफील के खिलाफ पुलिस और सरकार की जानिब से दाखिल  किए गए दस्तावेजात और इल्जामात की तफसील पर गहरी नजर डाली तो मामला बिल्कुल उल्टा नजर आया. इसी लिए कफील को जमानत देते हुए उन्होने कहा कि अलीगढ मुस्लिम युनिवर्सिटी में डाक्टर कफील ने जो कुछ कहा उसमें देश तोड़ने और समाज में नफरत फैलाने वाली कोई बात नहीं है बल्कि उन्होने तो फिरकावाराना हम आहंगी (सांप्रदायिक सौहार्द) और लोगों में प्यार-मोहब्बत से रहने के जज्बे को फरोग देने वाली बातें कही थीं. उन्होंने तालीम, रोजगार और सेहत से मुताल्लिक जरूरतों व सहूलतों की बातें की थीं. इसलिए उनपर देशद्रोह जैसा मामला चलाना या नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (एनएसए) के तहत उन्हें नजरबंद करने का कोई जवाज (औचित्य) नहीं है.
फाजिल जज जस्टिस गोविंद माथुर के इस फैसले के बाद उम्मीद है कि अब सरकार किसी भी बेगुनाह को इस तरह गैर कानूनी तरीके से महज सरकार में बैठे आला ओहदेदारों की जाती नाराजगी की बुनियाद पर एनएसए जैसे सख्त और खौफनाक कवानीन में फंसा कर जेल नहीं भेजेगी. इस फैसले की वजह से पूरे का पूरा मोहज्जब (सभ्य) समाज जस्टिस गोविंद माथुर का शुक्रगुजार है. यह शुक्रगुजारी सिर्फ इसलिए नहीं है कि उनकी अदालत ने डाक्टर कफील को इंसाफ दिलाया है बल्कि इसलिए है कि इस फैसले के जरिए जस्टिस गोविंद माथुर ने आम लोगों की नजरों में खोती जा रही अदलिया (न्यायपालिका) की साख को बचाने का काम किया है. प्रदेशों के हाई कोर्ट्स हों या सुप्रीम कोर्ट इन्हें एक बात अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि देश के गरीबों, दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों समेत करोड़ों लोगों का सरकारों पर भरोसा उठ चुका है. यह भरोसा उठाने या खत्म करने में सब-आर्डीनेट जुडीशियरी यानी निचली अदालतों का बहुत बड़ा रोल होता है. सुप्रीम कोर्ट ने कई साल पहले कहा था कि जिन दफाओं में सजा की मुद्दत सात साल से कम होती है ऐसी दफाओं के तहत पकड़ कर लाए जाने वालों को जेल न भेजा जाय उन्हें गिरफ्तार भी न किया जाए. इसके बावजूद पुलिस वाले आए दिन लोगों को चाकू दिखा कर, नशीली दवाओं की पुड़िया दिखाकर और ऐसी ही मामूली दफाओं वाले मामूली मामलात में पकड़ कर निचली अदालतों में पेश करते हैं और अदालतें आंख बंदकर के आम तौर पर चौदह दिन की जुडीशियल रिमाण्ड पर जेल भेज देती हैं. नतीजा यह कि आज तीस-पैंतीस कैदियों के जेल वार्डों में डेढ-दो सौ और कहीं-कहीं तो उससे भी ज्यादा कैदी भरे हुए हैं.
इस तरह आहिस्ता-आहिस्ता गरीब तबकों का भरोसा अदलिया पर से उठता गया. सरकारों पर भरोसा पहले ही खत्म हो चुका है क्योंकि सरकारें किसी भी पार्टी की रही हों सभी ने गरीबों, दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों के साथ नाइंसाफी ही की है. अब सिर्फ हाई कोर्टों अब सुप्रीम कोर्ट पर ही कुछ भरोसा बचा है. अगर यह भरोसा भी खत्म हो गया तो देश में अफरा-तफरी (अराजकता) ही पैदा हो जाएगी. जस्टिस गोविंद माथुर, बाम्बे हाई कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट के हालिया फैसलों ने अदलिया (न्यायपालिका) में आम लोगों का भरोसा न सिर्फ मजबूत किया है बल्कि यह उम्मीद जगाई है कि जस्टिस गोविंद माथुर जैसे जजों के रहते उनके साथ कोई नाइंसाफी नहीं हो सकती.  जदीद मरकज़

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