ओह ! रघुवंश बाबू नहीं रहे

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ओह ! रघुवंश बाबू नहीं रहे

प्रेमकुमार मणि
बिहार की राजनीति के प्रखर- पुरुष रघुवंश बाबू नहीं रहे . जो भी इस दुनिया में आया है , एक दिन जायेगा . लेकिन रघुवंश बाबू होना कठिन होता है . व्यक्ति रूप में मुझ से उनका सघन तो नहीं ,लेकिन ऐसा रिश्ता जरूर रहा कि हम एक दूसरे के हाल -चाल की चिंता करते रहे . पिछले दिनों जब यह पता चला कि वह कोरोना से ग्रस्त हो गए हैं ,तब फ़ोन से हाल -चाल लिया . यह सोच भी नहीं सकता था कि वे अब अस्पताल से लौट नहीं सकेंगे .
उनके जैसा निर्मल चित्त होना मुश्किल है . अजातशत्रु थे . किसी से शत्रुता नहीं . राजनीति को उन्होंने सुख -भोग का साधन नहीं सेवा का रास्ता माना . अपनी धज और अपनी ही बानी में बने रहे . आरम्भ में परिचय हुआ ,तब मैं उन्हें पढ़ा -लिखा आदमी नहीं समझता था . ऐसा लगता है ,उन्हें मेरे मनोभावों का  अनुमान हुआ ,और एक रोज जब उन्होंने बतलाया कि वह प्रोफ़ेसर भी हैं ,तब मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ . किसी बात को गहराई से जानना -समझना उनकी फितरत थी . बाहर से से वह भदेस ,लेकिन भीतर से सुसंगठित थे .
6 जून 1946 को वैशाली में जन्मे रघुवंश बाबू ने राजनीति में लम्बी पारी खेली . 1977 में पहली दफा विधायक हुए और जैसा कि मुझे स्मरण है कर्पूरी मंत्रिमंडल के सदस्य भी बने . बिहार विधान सभा के सभापति और फिर केंद्र में मंत्री बने . मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में मंत्री रूप में उन्होंने मनरेगा कार्यक्रम को सुचारु रूप से चला कर पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया . गाँवों में रहे -सहे सामंती अवशेषों को इस कार्यक्रम ने ध्वस्त कर दिया . इस से जनतंत्र की जड़ें गहरी हुई . आर्थिक लोकतंत्र भी विकसित हुआ . मनरेगा लागू होने के पहले और उसके बाद गांव में काफी फर्क आया . ज्यां द्रेज़ ने यदि इसकी परिकल्पना की थी ,तो रघुवंश बाबू ने इसे जमीन पर उतारा .
जब वह मृत्यु से जूझ रहे थे ,तब कुछ शातिर लोगों ने उनके नाम पर चिट्ठियों की राजनीति शुरू की . कितना गर्हित काम था ,यह ! अब समझ में आ रहा है . ओह ! रघुवंश बाबू , आप अपने ही किस्म के थे . आपको भूलना मुश्किल होगा . बिहार और देश के लिए आप ने जो किया उसके लिए यह देश -समाज आप का कृतज्ञ बना  रहेगा  .
आपको आखिरी प्रणाम . श्रद्धांजलि .

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