हिंदी दिवस पर हिंदी की बातें

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हिंदी दिवस पर हिंदी की बातें


हिंदी के नाम पर देश में हर साल सरकारी अनुष्ठान होता है. देश के हर सरकारी संस्थान में 14 सितंबर के मौके पर हिंदी दिवस के नाम पर तमाशा होता है. हिंदी पखवाड़ा, हिंदी सप्ताह और हिंदी दिवस के नाम पर कई तरह के पाखंड होते हैं. बड़ा से लेकर छोटा अधिकारी तक हिंदी को कामकाज में अपनाने की शपथ लेता है. विद्वानों को बुलाया जाता है, इनमें जान-पहचान वालों को तरजीह दी जाती है. खूब भाषण होते हैं. हिंदी को लेकर ढेरों बातें की जाती हैं लेकिन हिंदी दिवस की सरकारी औपचारिकता पूरी होते ही उन संस्थानों में हिंदी को फिर किसी गदालखाने में डाल कर अगले साल का इंतजार किया जाता है. जनादेश ने हिंदी दिवस पर इसी मुद्दे पर चर्चा की. चर्चा का संचालन पत्रकार हरजिंदर ने किया. चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव, आलोक जोशी, राजेंद्र तिवारी, लेखक व उपन्यासकार विभुति नारायण राय और जनादेश के संपादक अम्बरीश कुमार ने हिस्सा लिया. हरजिंदर ने चर्चा की शुरुआत करते हुए मशहूर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई को उद्धृत करते हुए कहा कि उन्होंने कहा था कि हिंदी दिवस के दिन हिंदी बोलने वाले, हिंदी बोलने वालों से कहते हैं कि हिंदी बोलें. लेकिन हम यह चर्चा कर रहे हैं कि हम हिंदी में क्यों नहीं बोलते हैं.

राहुल देव ने चर्चा में हिस्सा लेते हुए कहा कि अंग्रेजी से समस्या नहीं है कि हम कार या बस को हिंदी में बोलें. लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि हम हिंदी का कर क्या रहे हैं. हिंदी तो हम बोलते हैं. जो लोग आम अपनी सहज बातचीत में जिसमें हमलोग भी शामिल हैं कहते हैं कि यह मेरी वाइफ हैं, मेरे फादर वहां हैं, मदर घर पर रहती हैं, यह हम लोग भी बोलते हैं. जो मध्यवर्ग है वह तो यह मान कर चल रहा है कि हम हिंदी ही बोल रहे हैं. मुझे लगता है कि सवाल यह होना चाहिए कि हम हिंगलिश क्यों बोलते हैं हिंदी के नाम पर. क्योंकि ज्यादातर लोगों को यह ध्यान नहीं रहता कि वे हिंदी के अलावा कुछ और बोल रहे हैं. वे तो अपनी समझ से ही हिंदी ही बोलते हैं. भाषा को लेकर जो धुंधलका है, भावों को लेकर अभाव है, सही भावों का अभावस इन सबकी वजह से एक विचित्र स्थिति पैदा हो गई कि एक औसत हिंदी वाला, संस्कृतनिष्ठ हिंदी नहीं, साफ-सुथरी हिंदी, उर्दू मिश्रित हिंदी दो मिनट नहीं बोल सकता. उसे अंग्रेजी का सहारा लेना पड़ता है वह इस बैसाखी के बिना दो-चार मिनट हिंदी नहीं बोल सकता, मुझे लगता है इस पर बात होनी चाहिए.

आलोक जोशी का मानना था कि समस्या से निपटना बहुत मुश्किल नहीं है. मैं काफी दिन बिना हिंगलिश का प्रयोग किए हिंदी के सभी शब्द इस्तेमाल करता रहा. इसलिए कह सकता हूं कि हम हिंदी बोल नहीं सकते. लेकिन इसे भी मानना होगा कि अंग्रेजी का शब्दों का तिरस्कार कर हिंदी को कहीं पहुंचाने नहीं जा रहे हैं. हिंदी की प्रतिष्ठा के लिए आप कितना योगदान दे रहे हैं सवाल यह है. इस बात को तो मानना होगा कि लेखक-पत्रकारों को हिंदी की बजाय अंग्रेजी में लिखने में ज्यादा पैसा मिलता है. हिंदी में लिखने वाले लेखकों में से कई ऐसे हैं जो अंग्रेजी में लिखते हैं क्योंकि वहां पैसा ज्यादा मिलता है. आलोक जोशी ने राजभाषा शब्दावली से परहेज रखने की सलाह देते हुए कहा कि लोगों को समझाने के लिए भले पांच शब्दों का इस्तेमाल करें लेकिन जरूरी है कि वह बात समझा दी जाए जो कहनी है. बजाय इसके पारिभाषिक शब्दावली से उसका अनुवाद करें. आप उस बात को समझाने पर जोर दें तो हिंदी भाषा में सब कुछ कहा जा सकता.

राजेंद्र तिवारी ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि कोई भी भाषा प्रवाहमान है तब तो चलती रहेगी. हिंदी की मिसाल लें, सैंकड़ों सालों से तमाम भाषाओं को साथ लेकर आगे बढ़ती रही है. आज भी हिंदी के नाम पर जो हम हिंदी बोलते हैं उसने नब्बे फीसद शब्द दूसरी भाषाओं से हैं, वह चाहे मकान हो, दीवार हो या परदा हो, इस तरह के ढेर सारे शब्द दूसरी भाषाओं से आए हैं. यानी यह तय है कि अगर अपनी भाषा में हम दूसरी भाषा के शब्दों को समाहित करते रहेंगे तो भाषा समृद्ध होती जाएगी और दूसरी बात यह है कि अगर हमारी भाषा ज्ञान की भाषा नहीं बन पा रही है, हमारी भाषा रोजगार की भाषा नहीं बन पा रही है तो कैसे वह आगे बढ़ेगी. यह बड़ा सवाल है. अम्बरीश कुमार ने कहा कि सारा विमर्श विंध्याचल के इस पार होता है. हम विंध्याचल के उस पार जाएं, या बंगाल और कश्मीर जाएं तो उस तरफ हिंदी को लेकर वह स्थिति नहीं है जिसे लेकर हम विमर्श कर रहे हैं. तो दायरा बहुत बढ़ा नहीं है पिछले पच्चीस-तीस साल में. हिंदी और अंग्रेजी अखबारों में वेतन विसंगतियों का भी अम्बरीश ने जिक्र किया. राहुल देव ने हिंदी से जुड़े कुछ बुनियादी सवाल उठाए और कहा कि अपनी भाषा के भविष्य हम नहीं हैं, बल्कि हमारे बच्चे और हमारे बच्चों के बच्चे हैं.

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