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फिर पूर्वांचल राज्य बनाने की मांग !

यशोदा श्रीवास्तव

गोरखपुर .उत्तर प्रदेश के विभाजन की चर्चा के साथ ही फिर अलग पूर्वांचल की मांग शुरू हो गई है .पूर्वांचल के लोगों का मानना है कि पूर्वांचल भले ही किसी चुनाव में मतदताओं को आर्कषित करने का चुनावी मुद्दा न बनता हो लेकिन अब इस हिस्से को अलग कर यूपी के तीसरा बंटवारा वक्त की जरूरत है. आजादी के बाद से अबतक की सभी सरकारों में पूर्वांचल का दबदबा रहने के बावजूद इस हिस्से की उपेक्षा समझ से परे है. यहां उद्वोग,पर्यटन,कृषि आदि की अनंत संभावनाएं है लेकिन इसका लाभ पूर्वांचल को बिना अलग राज्य के मिल पाना संभव नहीं जान पड़ता. मौजूदा समय में एक बार फिर यूपी के तीन भाग में बंटवारे की सुगबुगाहट से पूर्वांचल राज्य की संभावना को बल मिला है.

डुमरियागंज के सांसद जगदंबिकापाल का कहना है कि निश्चय ही बड़ा प्रदेश होने के नाते यूपी के पूर्वांचल के हिस्से के विकास प्रभावित हो रहा है. कहा कि मैने स्वयं लोकसभा में पूर्वांचल राज्य की मांग की थी. सांसद पाल ने कहा कि सरकार  यदि  यूपी के बंटवारे पर विचार करती है वे चाहेंगे कि पूर्वांचल के 27 जिलों के मिलाकर अलग राज्य बनें.  पूर्वांचल के उन जिलों जहां से बुद्ध की स्मृतियां जुड़ी हुई है इसे मिलाकर सबसे पहले शाक्य प्रदेश की मांग करने वाले परम रमाशंकर की बेटी अधिवक्ता तनुआबदीन ने कहा कि यूपी कितने हिस्से में विभाजित होता है यह सरकार का फैसला है लेकिन यूपी के पूर्वांचल के कई जिले बुद्ध की स्मृतियों से पटा पड़ा है, इन सभी जिलों के समाहित कर शाक्य प्रदेश का गठन ही हो. शिक्षाविद डा अमित सिंह ने पूर्वांचल राज्य के गठन को अपरिहार्य बताते हुए कहा कि ऐसा होने पर हर स्तर पर विकास की संभावना बढ़ेगा. 

पूर्वांचल के राजभर समाज के कद्दावर नेता तथा योगी सरकार में हालत कैबिनेट मंत्री रहे ओमपरकाश राजभर के पहले से ही पूर्वांचल राज्य के हिमायती रहे हैं. इसके लिए उन्होंने पदयात्रा कर जनजागरण अभियान तक शुरू किया था. अभी भी पूर्वांचल की आबादी कई प्रदेशों की आवादी से भी अधिक है लेकिन विकास के मामले में शून्य है. यहां की चीनी मिलें एक एक कर बंद होती गई और गन्ना किसान बदहाल होता गया. पर्यटक की दृष्टि से कई महत्वपूर्ण स्थल भी राजनीति का शिकार होकर रह गए. भगवान बुद्ध की महाप्रयाण स्थली कुशीनगर, क्रीणा स्थली कपिलवस्तु सिद्धार्थनगर, देवदह जैसे केवल बुद्ध से जुड़े स्लिं को ही विकसित कर इसे पर्यटकीय स्थल का रूप दिया जाय तो विदेशी मुद्रा आय का बड़ा जरिया बन सकता है. इसके अलावा गोरखपुर का रामगढ़ताल परियोजना जिसे स्व वीरबहादुर सिंह ने शरू की थी उसे भी विकसित कर गोरखपुर के सौंदर्यीकरण का खूबसूरत हिस्सा बनाया जा सकता है. पूर्वांचल राज्य का दर्जा देकर यूपी के इस हिस्से को तराशकर विकास के नक्शे पर इसे चमकता हुआ हस्ताक्षर दर्शाया जा सकता है. 

मालूम हो कि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने उप्र के विभाजन की बात तब कही थी जब इस प्रदेश की आवादी 6 करोड ही थी. आज आबदी 22 करोड है तो कम से कम इसे तीन प्रदेशों में बंटना चाहिए. उप्र के बंटवारे की आवाज पूर्व में कई बार उठी है. स्व कल्पनाथ राय ने तो इसे लेकर कई बार बड़ा आंदेलन तक किया था. उन्होंने मउ सहित पूर्वांचल के कई जिलो में पदयात्राएं की थी. भासपा के ओमप्रकाश राजभर ने तो इसे आगे बढाते हुए कहा था कि उनके राजनीति का मकशद ही पूर्वांचल है. निसंदेह इसके लिए वे पूर्वांचल के जिलों में बिगुल बजाते रहे हैं. जबकि पूर्वांचल कार्ड को बसपा प्रमुख मायाती ने भी खेला था. 2012 के विधानसभा चुनाव के एन वक्त मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने 11 सिंतबर 2011 को विधानसभा से एक प्रस्ताव पारित कर दिल्ली तक पहुंचा दिया था.

पूर्वांचल राज्य की मांग नई नही है. बहुत पहले सिदधार्थनगर जिले के निवासी तथा भगवान बुद्ध के क्रीणा स्थली कपिलवस्तु की खोज के नायक पं राम शांकर मिश्र ने बुद्ध से जुडे पूर्वांचल के 24 जिलों को मिलाकर शाक्य प्रदेश की मांग बुलंद की थी. उसके बाद ही पूर्वांचल राज्य की मांग अलग अलग संगठनों के माध्यम से उठनी शुरू हुई थी लिंकन इसे वैसी धार नहीं मिली जैसी उत्तराखंड अथवा तेलांगना के लिए मिली. हां यह जरूर कहा जा सकता है कि 1991 में केंद्र सरकार के अलग से पूर्वांचल विकास निधि की शुरूआत करने के पीछे पुर्वांचल राज्य का बढता दबाव ही था.  प्रदेश की आवादी जब 18 करोड थी तब लंबे संर्घष के बाद सन 2000 में उत्तराखंड के रूप में 27वें राज्य का गठन हुआ. अब सूबे की आवादी करीब 22 करोड है ऐसे में कम से कम पूर्वांचल राज्य के रूप में एक और प्रदेश का गठन वक्त की जरूरत है.

विकास की दृष्टि से देखे तो देश को नौ प्रधानमंत्री देने वाले इस राज्य का विकास राष्टीय औसत से बहुत पीछे है. यह हाल आजादी के सातवें दशक में है. आजादी के समय राष्टीय आय में उप्र का योगदान कुल आय का पांचवा भाग था जो घटते घटते उसका आधा हो गया. उप्र के प्रति व्यक्ति आय और राष्टीय स्तर पर प्रति व्यक्ति आय में अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है. उत्तराखंड में प्रति व्यक्ति आय 9639 रू प्रति माह है जो राष्टीय आय से भी ज्यादे है. अनेक आर्थिक मानदंडो पर राष्टीय औसत से यह राज्य बहुत पीछे है. प्रदेश में 29 प्रतिशत आवादी गरीबी रेखा से नीचे है. बुनियादी सुविधाएं भी उतनी नहीं है जितनी अन्य राज्यों में है. केवल बिजली की ही बात करें तो अन्य प्रदेश जहां शत प्रतिशत विद्वुतीकरण की ओर अग्रसर है वहीं इस प्रदेश में अभी भी 20 प्रतिशत गांव बिजली को तरस रहे हैं. शिक्षा के क्षेत्र में भी उप्र राष्टीय औसत से 4ः32 प्रतिशत पीछे हैं. हम अगर पूर्वांचल की आवादी की बात करें तो असम,गुजरात,हरियाणा,जम्मू-कश्मीर,कर्नाटक केरल सहित कई प्रदेश ऐसे हैं जिनकी आवादी पूर्वांचल से कम है. इस अविकसित क्षेत्र की आबादी करीब सवा नौ करोण है और यहां प्रति वर्ग किमी 7.55 व्यक्ति का भार है. औद्वोगिकरण के अभाव में इस क्षेत्र का 75 प्रतिशत आबादी खेतिहर मजदूर के रूप में जीवनयापन करने को मजबूर है. सिचाई सुविधा का बुरा हाल होने के नाते लोगों को अपनी खेती के लिए बादलों की ओर निहारने को विवश रहना पड़ता है. यहां की कुल क्षेत्रफल की 55.65 प्रतिशत भूमि ही सिंचित क्षेत्रफल के दायरे में आती है. पूर्वांचल की भूमि का एक बड़ा भाग उसर होने के कारण भी कृषि उत्पादन पर असर पड़ता है. पूर्वांचल की 41 चीनी मिलों में से करीब करीब सभी बंद हैं या बंदी के कगार पर है इसलिए बेरोजगारी भी बढ़ी है. अंदरखाने से खबर मिल रही है कि  केंद्र सरकार यूपी के बंटवारे पर गंभीरता से विचार कर रही है. ऐसे में पुर्वांचल के 27 जिलों को मिलाकर अलग राज्य की संभावना एक बार फिर जगी हैं.

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