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लड़खड़ा रही है अर्थव्यवस्था !

शेखर गुप्ता 

भारत आज एक गंभीर रूप लेते रणनीतिक खतरे का सामना कर रहा है. यह खतरा इसलिए नहीं पैदा हुआ है कि पाकिस्तान ने एलओसी पर एक और ब्रिगेड को तैनात कर दिया है, या कि उसने कोई बेहद नाटकीय मिसाइल परीक्षण कर डाला है. न ही चीन ने सीमा पर कोई नई घुसपैठ की है.

यह खतरा तीन तरह का नहीं है. न तो यह सैन्य किस्म का है, न ही यह हमारे पारंपरिक दुश्मनों की ओर से पैदा किया गया है, और न ही यह हमारी सीमा के पार से उभर रहा है. यह खतरा तीन तरह का जरूर है. इसका स्वरूप आर्थिक है, यह आंतरिक है, और यह पिछले दो दशकों में कमाई गई हमारी थाती को बरबाद करने पर आमादा है. यह थाती है— ‘अंतरराष्ट्रीय साख’ यानी 9/11 कांड के बाद की दुनिया में एक ‘भद्रलोक’ वाली छवि से बनी हमारी साख. यह साख कुछ तो हमारी स्थिरता और लोकतन्त्र के कारण, और मुख्यतः हमारी बढ़ती आर्थिक मजबूती के कारण बनी थी.

इसे आसानी से इस तरह समझा जा सकता है— जब आपकी अर्थव्यवस्था 8 प्रतिशत या इससे ज्यादा की दर से बढ़ रही हो, तो इसे आप अपने लिए सात खून माफ वाला मामला मान सकते हैं. 7 प्रतिशत की दर पर इसे पांच खून माफ वाला मामला मान सकते हैं. मगर जब यह 5 प्रतिशत की दर पर आ गई तो मान लीजिए कि आप खतरनाक स्थिति में पहुंच गए हैं. यह वो स्थिति है जहां एक उभरती विश्व शक्ति तीसरी दुनिया की किसी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था में तब्दील हो जाती है, जिसकी प्रति व्यक्ति आय महज 2000 डॉलर के निचले दायरे में होती है (श्रीलंका की इससे दोगुनी है).


1991 की गर्मियों में शुरू किए गए आर्थिक सुधारों के बाद 25 वर्षों में भारत पश्चिम से लेकर पूरब और मध्य-पूर्व तक पूरी दुनिया का चहेता बन गया था. भारत की अनूठी सामाजिक-राजनीतिक विशेषताओं, दुनिया के बड़े हिस्से जब अपनी विविधता-बहुलता से जूझ रहे हैं तब इनके बीच भी फलने-फूलने की भारत की क्षमता, इसकी लोकतान्त्रिक व्यवस्था और रणनीतिक संयम आदि ने दुनिया में इसका कद ऊंचा कर दिया था. यह करगिल युद्ध, 26/11 के भारतीय संसद पर हमले के बाद के ‘ऑपरेशन पराक्रम’ के दौरान भारत को मिले व्यापक समर्थन से स्पष्ट हो गया था.


लेकिन हमारी सबसे बड़ी ताकत थी आर्थिक. एक्स्प्रेस ट्रेन की गति से दौड़ रही दुनिया में भारत न केवल सबसे तेजी से वृद्धि कर रही दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था था बल्कि वह टेक्नोलोजी की अपनी ताकत, नए आविष्कारों, विदेशी पूंजी के प्रति मैत्री भाव, मजबूत बाज़ार और टैक्स व्यवस्था के चलते पूरी दुनिया को आकर्षित करता था. उसने 2008 की वैश्विक आर्थिक गिरावट से खुद को जिस तरह बचाए रखा उसके कारण उसे दुनियाभर में प्रशंसा मिली थी.इन वर्षों में उथलपुथल भरी दुनिया में भारत एक संयमित, समझ में आने वाले, और महादेश के आकार के एक मजबूत द्वीप के रूप में उभरा था, वैश्विक पोर्टफोलियो और प्रत्यक्ष निवेश के चुंबक के रूप में. इस वजह से चीन समेत सभी बड़ी ताकतें और उनकी कंपनियां भारत की स्थिरता तथा सुरक्षा में अपना हित देखती थीं.

इस तरह, एक दहकती अर्थव्यवस्था उस दौर में भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत बन गई जब इसका सैन्य खर्च गिर गया था और सेना का आधुनिकीकरण अपनी दिशा और गति खो बैठा था.बढ़ती जीडीपी तब हजारों टन परमाणु हथियारों से ज्यादा शक्तिशाली अस्त्र था. अगर कोई बड़ी ताकत आपके ‘सौवरेन’ या कॉर्पोरेट बॉन्ड में पैसे लगा रही है तो वह ऐसी किसी कार्रवाई या नीति में हिस्सेदारी कतई नहीं करेगी जिससे आपके यहां अस्थिरता पैदा होती हो. चीन के मामले में भी व्यापार सरप्लस अगर 60 अरब डॉलर पर पहुंच गया तो यह भारत में उपभोक्ता अर्थव्यवस्था में उछाल पर निर्भर था.

वे बेशक हमें काफी मशीनरी, बिजली संयंत्र, और इंजिनियरिंग के सामान बेचते हैं. लेकिन दूसरी कौन अर्थव्यवस्था है जो इतने बड़े आकार की है, और हजारों अरब डॉलर के खराब क्वालिटी के उनके कबाड़— खिलौनों, चप्पलों, फर्नीचर, पारासोल, अगरबत्तियों, भड़कीले लिबास, प्लास्टिक चूड़ियों, आदि— की भूखी है, जो भारत के कस्बों और गांवों की दुकानों में भरा दिखता है?

दूसरी किसी अर्थव्यवस्था के मुक़ाबले भारी मात्रा में आयात करने की भारत की क्षमता पर चीन की निर्भरता भारत के लिए एक तरह से एक रणनीतिक पूंजी बन गई. इसलिए जरा गौर कीजिए कि जब करगिल (1999), संसद पर हमले (2001-2), और 26/11 कांड (2008) के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच संकट पैदा हुआ तब चीन की प्रतिक्रिया क्या थी. आज के मुक़ाबले इन मौकों पर उसकी प्रतिक्रिया भारत के लिहाज से बेहतर और ज्यादा सहायतापूर्ण थी. यहां तक कि 2009 में दलाई लामा के तवांग दौरे से जब तनाव पैदा हुआ था तब भी मनमोहन सिंह की कमजोर सरकार ने बड़ी बहादुरी से चीन को आंख दिखा दी थी और उसे बिना किसी शोरशराबे के शांत कर दिया था.

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में ज़्यादातर समय तक वृद्धि की गति न केवल बनाए रखी गई थी बल्कि 2012-14 के गतिरोध के बाद उसमें तेजी भी लाई गई. इससे भारत को, और नरेंद्र मोदी को लाभ भी हुआ था. दुनियभर के नेताओं के बीच उनकी छवि और उनका कद काफी ऊंचा उठा था. लेकिन उन्होंने नोटबंदी करके खुद ही इस गति पर ब्रेक लगा दिया. उसके बाद से ही भारत की आर्थिक वृद्धि में गिरावट जारी है.द प्रिंट से ,जारी 

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