जनादेश

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बाढ़ में डूब गया नीतीश का सुशासन

नागेंद्र 

पटना .एक दृश्य ख्यातिलब्ध लोकगायिका शारदा सिन्हा के घर का है. उन्हें कई दिन पानी में घिरे रहने के बाद उनके घर से जिस तरह सुरक्षित निकाला गया, वह अपने आप में भयावह नजारा प्रस्तुत करता है. एक अन्य दृश्य में घर की सीढ़ियों पर खड़ी शारदा सिन्हा दिखा रही हैं कि पहली मंजिल किस तरह डूबी हुई है और पानी इतनी तेजी से आया कि कुछ भी सम्भालने का वक्त नहीं मिला. एक और नजारा है जिसमें पानी में डूब चुकी सड़क पर जार-जार रोता एक इंसान अपना रिक्शा बचाने की जद्दोजहद में उलझा है और सामने से आवाज आ रही है, ‘रोइए नहीं, अपना रिक्शा यहीं छोड़ दीजिये, हम लोग देखते रहेंगे. अपनी जान बचाइए.’ लेकिन रिक्शे वाले की समझ में कुछ नहीं आ रहा... सूबे के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का साजो-सामान के साथ सड़क पर बेजारी में खड़े होना भी सबने देखा ही. ये सारे नजारे पटना पर बरपे बारिशी कहर के हैं. ऐसे तमाम नजारे और हैं जहां सब कुछ या बहुत कुछ खत्म हो चुका है, भविष्य की उम्मीदें भी. नजारे ऐसे-ऐसे कि देखकर हिम्मत बंधाने वाले की हिम्मत भी जवाब दे जाए. यह सब बाढ़ में तो कई बार देखा लेकिन महज तेज बारिश के कारण इतना भयावह नजारा वह भी विकसित ही नहीं, तेज विकास की दौड़ में शामिल एक शहर में पहली बार देखने को मिला. पटना ही नहीं बिहार के २० से ज्यादा शहर और जिले बारिश के इस कहर से बेदम दिखे. यूपी के बनारस, गोरखपुर सहित कई जिलों में भी कमोबेस ऐसा ही नजारा है. हर साल की तरह बाढ़ का संकट भी साथ-साथ बना ही हुआ है.


ये हालात बड़ा सवाल खड़ा कर रहे हैं. सवाल शहरी विकास की अंधी दौड़ पर, शहरी सीमाओं के अनियमित-अनियोजित विस्तार पर, हमारे नीति नियंताओं द्वारा इस सब की अनदेखी और विकास की हमारी परिभाषा और समझ पर. सवाल है उस आपदा-विपदा से निकले संदेश पर कि उससे हमने क्या सबक लिया था? लिया था तो फिर ऐसा कुछ क्यों नहीं किया कि वह सब अगली बार होता न दिखाई देता? बड़ा सवाल यह भी  नहीं है कि बारिश कितनी हुई, उसने कितना और कब का रिकार्ड तोड़ा.असल सवाल यह है कि हर रिकार्ड टूटने पर हमने अगली बार रिकार्ड बनने से रोकने के लिए क्या किया?

यह सवाल भी सिर्फ पटना पर नहीं है. पटना तो भुक्तभोगी है, जिसने सवालों को बस थोड़ा विस्तार दे दिया है. अब यह हम पर है कि इन सवालों पर अब भी गम्भीर होते हैं या कि सब कुछ निपट जाने के बाद फिर उसी कोकून में चले जाते हैं, जहां हर आपदा के बाद जाने की हमारी आदत हो चुकी है. यह सबक लेकर आगे की विकास नीतियों पर पुनर्विचार का समय है. सोचने का समय भी कि हमसे कहां-कहां, क्या-क्या अनदेखी हुई है, जो ऐसे भयावह नतीजे दिखा रहा है.

शुरूआत पटना से ही करें. सब १९७५ की बाढ़ का हवाला दे रहे हैं जब पटना ने पहली बार ‘पानी की भयावहता’ झेली थी. यह तीन नदियों से घिरे पटना पर उनके उफान और उससे पहले कुछ इंसानी गलतियों का मामला था. जिसने भी उसे देखा है, वही जनता है कि कितना भयावह था वह सब. लेकिन बारिश का कहर पटना वालों ने १९६७ में ही देख लिया था, हालाँकि तब उसका ऐसा भयावह असर नहीं हुआ था. शायद इसलिये, क्योंकि पटना तब एक ज़िंदा शहर था. विकास की अंधी दौड़ में अपने संसाधनों को नष्ट नहीं कर चुका था. लेकिन पटना आज जिस संकट को झेल रहा है, उसकी पिछले कुछ सालों बल्कि कई दशकों की यात्रा को देखते हुए वह नया नहीं, सिर्फ उसका भयावह रूप में दिखाई दे जाना मात्र है. वरना पहले राजेन्द्र नगर और बाद के दिनों (सत्तर के दशक) में विकसित हुई और तब एशिया की सबसे बड़ी आवासीय कालोनी कहलाने वाला कंकड़बाग तो थोड़ी-थोड़ी बारिश में भी अपने ‘डूबने’ का ट्रेलर दिखाता ही रहा है. इस संकट की ओर भी ध्यान दिलाया ही जाता रहा है कि कटोरे के आकार वाले और तेजी से कंक्रीट के जंगल में तब्दील होते पटना में कभी ’६७ जैसी बारिश हुई तब क्या होगा? इस बार आखिर वह आशंका अपने क्रूर रूप में सामने आ ही गई.


पटना को चेतावनी तो उसके शैशवकाल में ही मिल गई थी, नियामक तब भी नहीं चेते. अपने अंतिम दिनों में जब गौतम बुद्ध पाटलिपुत्र (पटना) से गुजर रहे थे तो उन्होंने कहा था,- ‘इसका भविष्य उज्जवल होगा, लेकिन इसे अग्नि और जल से हमेशा खतरा भी बना रहेगा’. दरअसल, पटना उनके इस संदेश को जिस तरह बार-बार याद करता रहा है, उस अनुपात में इससे बचाव का जरा भी इंतजाम हुआ होता तो आज ऐसी नौबत तो न ही आती. एक इंजीनियर उस दिन बता रहे थे कि जितना पानी भरा है और जिस तरह बारिश जारी है, उसके अनुरूप न तो हमारे पास तकनीक है, न संसाधन. ऐसे में संकट भयावह ही  होना था.फोटो -साभार 


नाकाम हो गई शहरों की टाउन प्लानिंग  

दरअसल यह हमारे पूरे समय, पूरे समाज का सच है कि हमने गलतियों से सबक लेना तो छोड़ ही दिया, गलती पर गलती किये जा रहे हैं. दिल्ली-एनसीआर से लेकर पटना, लखनऊ, बनारस, कानपुर, गोरखपुर, आगरा और रांची ही नहीं मुम्बई और बेंगलुरु जैसे शहरों में भी जिस तरह कंक्रीट के जंगल खड़े होते गये है, उनमें अगर कोई एक समानता है तो वह है नियमों की खुली अनदेखी. पार्किंग की जगह पर दुकानें दिखने लगीं और सड़कें पार्किंग में तब्दील हो गईं. नाले और नालियों पर अवैध कब्जे हो गये. जल निकासी के तमाम रास्ते कब बंद हो गये, नगर-निगमों तक को नहीं पता. नाले-नालियों की सफाई के कैलेन्डर तक इस अराजकता की भेंट चढ़ गये. इतना ही नहीं हुआ, इन सभी शहरों में जिस तरह तालाबों और हरियाली पर कब्जा करके यह सब हुआ उसमें और भयावह नतीजे दिखने ही थे. यह सब तो हुआ ही, लखनऊ, पटना जैसी राज्यों की राजधानियों ही नहीं दिल्ली में बैठे जिम्मेदारों तक ने हमारी आईआईटी जैसे संस्थानों के विशेषज्ञों की उन रिपोर्टों पर कोई कारगर पहल करने की जहमत नहीं उठाई जिनमें ऐसे संकटों के निदान के फार्मूले थे.


इतना ही होता तब भी हम मान लेते कि शायद आगे चलकर यह सब समझ आयेगा और सिस्टम में बैठे हुए लोग कुछ नया एक्शन प्लान बनायेंगे. लेकिन यहाँ तो उलटा ही दिखाई दिया. सूबे के मुखिया ही जिस तरह हालात की समीक्षा के बाद धीर-गम्भीर मुद्रा में जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण असंतुलन से उपजे हालत का नतीजा बताते दिखे उससे यह भी साबित हुआ कि और कुछ हुआ न हुआ, विश्व के सामने ग्रेटा थनबर्ग नाम की बच्ची ने जो लताड़ लगाई है, नीतीश जी जरूर उसके प्रभाव में आ गये हैं. वे इसे ‘आपदा’ (जिस पर इंसानी जोर नहीं चलता है) बताते हुए यह भी कहने से नहीं चूके कि ‘हथिया तो बरसता ही है, अब ऐसा बरस जायेगा किसने सोचा था’. दूरदर्शी और सुशासन प्रेमी नीतीश अपने सिस्टम की अकर्मणता की ऐसी अनदेखी करते हुए सबकुछ इस तरह ‘नियति’ पर डाल देंगे कम से कम इस बार उनसे यह उम्मीद नहीं थी. यह सब कहते हुए वे शायद भूल गए कि हथिया कम बरसे या ज्यादा बरसता तो हर साल ही है. और यह भी कि जलभराव होगा या नहीं या कितना होगा, इसका इंतजार न कर व्यवस्थाएं पहले से अपना काम किया करती हैं और सामान्य नियम यही है कि यह सब हर बारिश से पहले नियमित रूप से होता है, जो हमारे बिहार-उत्तर प्रदेश में अमूमन नहीं ही होता है. आपके सिस्टम में भी नहीं हुआ. वे यह भी भूल गये कि जब आप १४-१५ सालों से लगातार मुख्यमंत्री हों, तो समय आपको इस तरह बच निकलने की इजाजत नहीं देता. आपके सिस्टम में तो यह सामान्य सा काम भी शायद नहीं हुआ कि ऐसे संकट के वक्त काम आने वाले साजो-सामान पर ही एक नजर डाल ली जाती तो कम से कम जरूरत पड़ने पर आधे से ज्यादा पम्प बेदम न हो गये होते.

नीतीश कुमार ऐसी टिप्पणी पहली बार नहीं की है. हालिया चमकी बुखार के दौर में भी उन्होंने कुछ ऐसा ही देखा था. २००८ में कोसी की उस बाढ़ में भी उन्होंने ‘प्रलय’ ही देखी थी, जब कोसी का कुसहा बांध टूटने के पहले तक वे और उनका पूरा अमला हर वह खबर दरकिनार करते रहे थे, जिसमें बांध टूटने का खतरा बताया जा रहा था. नीतीश तब भी कुछ भूले थे, इस बार भी भूल गये कि यह कोई प्राकृतिक नहीं, पूरी तरह मानव जनित आपदा है. तब उनके तंत्र ने लम्बे समय से बांध पर हो रहे रिसाव की अनदेखी की थी, इस बार उसने पटना को स्मार्ट बनाने का सपना पूरा करने की चाहत में वह सब कर डाला जो नहीं करना था.

अब पटना को एक बड़े संकट में डालने के बाद मचे हंगामे पर नीतीश जी अगर हर बार की तरह इस मामले में भी यही सोच रहे हैं कि उन्हें ‘टारगेट’ किया जा रहा है तो वे एक और गलती करने जा रहे हैं. इस बार टारगेट पर सिर्फ वे नहीं, उनके जैसी भूमिका में बैठा हर वह शख्स है, जिसकी नजर अपने तन्त्र पर नहीं है और जिसे अपनी नाकामियों से सबक न लेने की बुरी आदत है.

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