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जेपी लोहिया पर कीचड़ उछालने वाले ये हैं कौन ?

डॉ सुनीलम

नई दिल्ली .भारत में 85 वर्ष पुराने समाजवादी आंदोलन के प्रणेता द्वय लोकनायक जयप्रकाश नारायण  का 11अक्टूबर 2019 , 117 वां जन्मदिवस और 12 अक्टूबर 2019 का 52 वां डॉ राममनोहर लोहिया जी का स्मृति दिवस है . दोनो ही आज़ादी के आंदोलन के शीर्षथ नेता थे . भारत छोड़ो आंदोलन के मुख्य नायक थे .दोनो रूसी क्रान्ति से प्रभावित थे ,दोनों ने कांग्रेस पार्टी के भीतर मिलकर 17मई 1934 को कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी  का गठन किया था .

दोनो गांधी जी के अत्यंत निकट थे.जे पी की पत्नी प्रभादेवी  ज्यादा समय गांधी जी के आश्रम में ही रहा करती थीं ,इसलिए गांधी जी जयप्रकाश जी को दामाद की तरह का सम्मान दिया करते थे. पहली बार कांग्रेस जब मंत्रिमंडल में 1937 में शामिल हुई तब से लेकर विभाजन स्वीकारने तक कई मुद्दों पर गाँधीजी कांग्रेस से नाराज हुए . हर मौके पर सोशलिस्ट गाँधीजी के साथ खड़े हुए . जिस दिन स्वतंत्रता मिली उस दिन भी गाँधीजी के साथ डॉ लोहिया थे. गांधी जी कांग्रेस पार्टी को भंग करने का सुझाव दे चुके थे तथा आज़ादी के बाद राष्ट्र निर्माण ,साम्प्रदायिक कट्टरता और सामाजिक सुधारों के लिए नया संगठन बनाना चाहते थे ,जिसपर चर्चा के लिए उन्होंने डॉ लोहिया को बिरला हाउस बुलाया था परंतु उसी दिन  गांधी की हत्या कर दी गई.

जे पी ने 1952 के चुनावी नतीजों से निराश होकर सक्रिय राजनीति छोड़ दी और वे विनोबा जी के साथ भूदान के काम मे लग गए .लाखों एकड़ जमीन भूमिहीनो को बंटवाई. उधर डॉ लोहिया ने सोशलिस्ट राजनीति को चलाया तथा कांग्रेस को सत्ताच्युत करने के लिये गैर कांग्रेसबाद की रणनीति बनाई ,जिसके चलते पहली बार 7 राज्यों में संविद सरकारें  .डॉ लोहिया का देहांत 12 अक्टूबर 1967 को हो गया.

1974 में रेल हड़ताल के बाद कांग्रेस सरकार ने इमरजेंसी लगाई तब गुजरात से शुरू हुआ छात्र आंदोलन बिहार पहुंचा ,छात्रों की पहल पर जे पी ने नेतृत्व किया जिसे जे पी आंदोलन या सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन के नाम से जाना जाता है. जे पी पहल पर जनता पार्टी बनी जिसने पहली बार 1947 के बाद 1977 में कांग्रेस को केंद्र में अपदस्थ किया. डॉ लोहिया का गैर कांग्रेसवाद का प्रयोग सफलतापूर्वक पूरा हुआ.

जे पी और लोहिया दोनो ने पूर्वोत्तर और कश्मीर में बहुत काम किया .दोनो नेपाल ,वर्मा में लोकतंत्र की बहाली में सक्रिय रहे. जेपी की बांग्लादेश को मान्यता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका रही.उधर डॉ लोहिया ने गोआ मुक्ति आंदोलन का नेतृत्व किया.


गांधी  की तरह जे पी ने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा परंतु भारतीय राजनीति को प्रभावित किया. डॉ लोहिया जवाहरलाल जी के खिलाफ लड़े भी ,हारे भी, फिर  सांसद भी बने .उन्हें कांग्रेस के खिलाफ विपक्ष का केंद्र बिंदु माना गया . अपनी केरल सरकार ने लेकर संविद सरकारों तक को उन्होंने नहीं बख्शा . गोली चालन होने पर अपनी सरकार से इस्तीफा मांगने में कोताही नहीं की.

जे पी और लोहिया को इन दिनों बदनाम करने की मुहीम चल रही है . जो लोग गांधी जी के मूर्ति भंजक हैं वहीं यह प्रयास कर रहे हैं.बताया जा रहा है कि इन्ही दो नेताओ के चलते आज भा ज पा 303 सीट पाने की स्थिति में पहुंची है.आर एस एस देश पर हावी हो गई है. यानी जे पी और लोहिया इतने ताकतवर थे कि उन्होंने मोदी और भागवत को देश पर थोप दिया . यह हास्यास्पद और आधारहीन आरोप है.

इस तरह के आरोप लगाने वालों की असली मंशा साफ है. वे एक कांग्रेस पार्टी की द्वारा की गई राजनीति पर चर्चा नहीं होने देना चाहते जिसके चलते देश मे साम्प्रदायिक ताकतों को बढ़ावा मिला ,दूसरा वे सोशलिस्टों की बची हुई ताकत को भी कमजोर करना चाहते हैं जो उत्तरप्रदेश और  बिहार में भाजपा को कड़ी चुनौती दे रही है.

इस षड्यंत्र का मुख्य उद्देश्य अल्पसंख्यको के मन मे सोशलिस्टों के प्रति अविश्वास पैदा करना है ताकि उत्तरप्रदेश और बिहार में समाजवादियों को खत्म किया जा सके . भा ज पा और कांग्रेस का सीधा मुकाबला हो सके. वे देश में दो ध्रुवीय राजनीति के पक्षधर दिखलाई पड़ते हैं.तीसरे वे है जो केंद्र के लेफ्ट में किसी और को नहीं देखना चाहते .ये वही हैं जिन्होंने गांधी जी को साम्राज्यवादी एजेंट कहा था तथा इंदिरा गांधी का साथ दिया था.चौथे वे हैं जिन्हें इस बात से तकलीफ है कि दोनों घनघोर राष्ट्रवादी थे और भारतीय संस्कृति और भारतीय समाज के यथार्थ को समझ कर भारतीय मुहावरों में बात किया करते थे .

असल मे चारों  तरह के लोगों को यह कष्ट है कि गांधी जी के बाद देश मे देश मे सर्वाधिक लोकप्रियता जे पी और लोहिया ही  क्यों है?  वे अपनी विरासत नहीं बचा पा रहे हैं

जवाहरलाल नेहरू पर जितना हमला दिनरात संघी और भा ज पाई करते है उंसका मुकाबला कांग्रेसी नहीं कर पा रहे है. सरदार पटेल का अपरहण करने में संघी लगभग कामयाब हो चुके हैं. वामपंथी बुद्धिजीवी ही कांग्रेस की ओर से संघियों से बहस करते दिखलाई पड़ते हैं ,कांग्रेस पार्टी के नेता कहीं भी सड़कों पर बहस करते नज़र नहीं आते.कांग्रेस पार्टी की नीतियों , सरकारों के कारनामों और भ्रस्टाचार  के चलते ही लगातार संघ बढ़ा. यह कहने की हिम्मत उनमें नहीं है.

गांधी जी की हत्या के बाद संघ पर लगाई गई पाबंदी क्यों हटाई गई यह सबसे अहम मुद्दा होना चाहिए ? यह पाबंदी तो सरदार पटेल के द्वारा लगाई गई थी . कांग्रेस ने यदि संघ के प्रति कड़ा रवैया अपनाया होता तथा नरम हिन्दुवाद की नीति को नहीं अपनाया होता तो कांग्रेस को भी इतने बुरे दिन नहीं देखने पड़ते. बाबरी मस्जिद से लेकर शाहबानो प्रकरण तक जो कुछ हुआ उसका कौन नजरअंदाज कर सकता है.

इस तरह की मुहिम चलाने वालों से मेरा निवेदन यह है कि वे यह बतलाएंगे कि कब जेपी या लोहिया ने सम्प्रदायिकता की राजनीति को बढ़ावा दिया?  सोशलिस्टों ने भारत के विभाजन का पुरजोर विरोध किया था. यहां तक कि जब 15 अगस्त 1947 को देश आज़ादी का जश्न मना रहा था तब डॉ लोहिया गाँधीजी के साथ कोलकत्ता में हिन्दू मुस्लिम दंगाइयों को जान पर खेल कर नरसंहार करने से रोक रहे थे.

जेपी ने इंदिरा गांधी की इमरजेंसी का मुकाबला करने के लिए सभी गैर कांग्रेस ताकतों को एकजुट किया था .तभी इंदिरा गांधी की तानाशाही को खत्म किया जा सका था.जो बुद्धिजीवी बुध्दि विलास के लिए जेपी - लोहिया पर कीचड़ उछाल रहे हैं उनको याद रखना चाहिए वर्तमान आवश्यकता फासिस्ट ताकतों से लड़ने की है ,विभाजित होकर उन्हें मजबूत करने की नहीं. कांग्रेस को भी यह समझ लेना जरूरी है कि आज भी बिहार और उत्तरप्रदेश में बिना सामाजवादियों के भा ज पा - संघ से मुकाबला करना उनके लिए संभव नहीं है.


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