जनादेश

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जांच के नामपर लीपापोती तो नहीं ?

राजेंद्र कुमार 

लखनऊ .नौकरशाह और नेता का गठजोड़ हमेशा ही घोटाले को अंजाम देता रहा है. सूबे की योगी सरकार भी एक ऐसे घोटाले से अपना दामन बचाने में लगी है. ये घोटाला बिजली कर्मचारियों के पीएफ को नियमों की अनदेखी कर दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (डीएचएफएल) में निवेश करने से संबंधित है. इस मामले में आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा (ईओडब्ल्यू) ने अपनी शुरुआती जांच में यूपी पावर कारपोरेशन के पूर्व एमडी एपी मिश्र तथा स्टेट पावर सेक्टर एंप्लॉयीज ट्रस्ट के  निदेशक वित्त सुधांशु द्विवेदी और ट्रस्ट के सचिव प्रवीण गुप्ता को गिरफ्तार किया है, पर इस मामले में अभी तक ट्रस्ट के चेयरमैन रहे और पावर कॉरपोरेशन के अहम पदों पर तैनात रहे किसी आईएएस अफसर या नेता से पूछताछ तक नहीं की है. उस नौकरशाह का तो अभी तक जांच एजेंसी ने नाम ही नहीं लिया, जिसकी देखरेख में यह घोटाला शुरू हुआ पर कही पर भी दस्तावेजों में उसका हस्ताक्षर ही नही है.

अब इसी अफसर को फसाने और बचाने की कवायद सूबे की नौकरशाही में गुपचुप तरीके से शुरू हो गई है. यह हाल भी तब है, जबकि इस मामले की जाँच सीबीआई से कराने का ऐलान  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कर चुकें हैं. और ईओडब्ल्यू की शुरुआती जांच में यह साफ हो गया है कि मुंबई स्थित विवादास्पद कंपनी, दीवान हाउसिंग फायनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड में बिजली कर्मचारियों के पीएफ का पैसा जमा कराने में आईएएस अधिकारी संजय अग्रवाल की अहम  भूमिका रही थी. उनकी जानकारी में ही बिजली महकमें के अफसरों ने कर्मचारियों के पीएफ की धनराशि डीएचएफएल में जमा करने का सिलसिला शुरू हुआ और बीते तीन सालों में 4101.70 करोड़ रुपये डीएचएफएल में जमा हुआ. अब डीएचएफएल में बिजलीकर्मियों के पीएफ के 2267.90 करोड़ रुपये फंस गए हैं. और संजय अग्रवाल के केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने के बाद पावर कॉरपोरेशन के अहम पदों  पर तैनात रहे बड़े अफसरों जिनमें वर्तमान प्रमुख सचिव ऊर्जा भी शामिल है ने डीएचएफएल में जमा बिजली कर्मचारियों के पीएफ को लेकर चिंता नहीं की. एक गुमनाम शिकायत पर यह घोटाला बीते दिनों खुला.

जिसके बाद ही सरकार ने सक्रियता दिखाते हुए इस मामले की जांच सीबीआई से कराने का ऐलान करते हुए सूबे की ईओडब्ल्यू को दोषियों का पता लगाने की जिम्मेदारी सौपी है. फिर भी  ईओडब्ल्यू के अफसरों ने अभी तक न तो  डीएचएफएल के अफसरों से इस मामले में कोई पूछताछ की है और न ही केंद्र में तैनात आईएएस अफसर संजय अग्रवाल से पूछताछ करने के लिए कोई कार्रवाई ही ही है. आईएएस अधिकारी से पूछताछ के लिए सरकार के अनुमति लेनी होती है, ये जानते हुए भी अभी तक ईओडब्ल्यू के अफसरों ने इस मामले में कोई पहल नहीं ही है. वही दूसरी तरफ यह ये चर्चा होने लगी है कि सूबे में मुख्य सचिव की कुर्सी पर संजय अग्रवाल की तैनाती न होने पाए, इसके लिए इस मामले में उनका नाम एक अपर मुख्य सचिव के कहने पर उछाला जा रहा है.

इसमें कितनी सच्चाई है? यह तो अभी किसी को नहीं पता पर पर संजय अग्रवाल के पक्ष में यह दावा भी उनके साथी अधिकारी कर रहे हैं कि संजय अग्रवाल की बिजली कर्मचरियों के पीएफ की धनराशि  डीएचएफएल में जमा कराने में कोई भूमिका नहीं थी. संजय अग्रवाल के पक्ष में यह तर्क देने  वाले उनके साथी आईएएस कहते हैं कि जिन दस्तावेजों के आधार पर बिजली कर्मचरियों के पीएफ की धनराशि डीएचएफएल के खाते में जमा की गई उस पर संजय अग्रवाल के हस्ताक्षर नहीं हैं. हां यह जरुर है कि जब  बिजली कर्मचरियों के पीएफ की धनराशि डीएचएफएल के खाते में जमा की गई उस पर संजय अग्रवाल प्रमुख सचिव ऊर्जा के पर पर तैनात थे. और महाराष्ट्र से जुड़े एक केंद्रीय मंत्री ने केंद्र सरकार में उनकी तैनाती के लिए पैरवी भी की थी. दीवान हाउसिंग फायनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड के मालिकानों से इन मंत्री जी जान पहचान है  ये किसी से छिपा नहीं था.

जिसके चलते ही अखिलेश सरकार में डीएचएफएल में नियमों की अनदेखी करते हुए निवेश करने संबंधी जो रास्ता आईएएस अफसरों ने बनाया, उसे योगी सरकार में भी नहीं बंद किया गया. बल्कि बेख़ौफ़ तरीके से अफसरों ने डीएचएफएल को 4101.70 करोड़ रुपये और दे दिए, जबकि अखिलेश सरकार में यह आंकड़ा 21 करोड़ रुपये तक ही पहुंचा था. पीएफ घोटाले के इस मामले में अब तक जो दस्तावेज मिले हैं, वो बताते हैं कि उत्तर प्रदेश स्टेट पावर सेक्टर इम्प्लाइज ट्रस्ट में बिजलीकर्मियों के जीपीएफ के जमा 2631.20 करोड़ रुपये और उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन कंट्रीब्यूटरी प्रॉविडेंट फंड ट्रस्ट में सीपीएफ के जमा 1491.50 करोड़ रुपये डीएचएफएल में लगाए हैं. इसमें से कुल 1854.80 करोड़ रुपये तो वापस मिल गए लेकिन, जीपीएफ के 1445.70 करोड़ व सीपीएफ के 822.20 करोड़ रुपये डीएचएफएल में फंस गए हैं. डीएचएफएल को अखिलेश सरकार के दौरान पीएफ के 21 करोड़ रुपये 17 मार्च 2017 को तब दिए गए, जब भाजपा की सरकार बनना तय हो चुका था. इसके बाद सत्ता परिवर्तन के हफ्तेभर बाद ही डीएचएफएल को दूसरी किस्त के तौर पर पहले से कहीं अधिक 33 करोड़ रुपये दिए गए. फिर तीन अप्रैल को 215 करोड़, 15 अप्रैल को 96 करोड़, पहली मई को 220 करोड़, 19 मई को 169 करोड़ रुपये डीएचएफएल को दिए जाते रहे. ट्रस्ट का 65 फीसद से अधिक 4122.70 करोड़ रुपये निवेश करने बाद तब यह सिलसिला थमा, जब डीएचएफएल के सामने ही दिक्कतें खड़ी होने लगीं और एक शिकायत की जांच के बाद इस मामले में सरकार ने एक्शन लिया. 

ईओडब्ल्यू की जांच शुरू हुई तो पता चला कि बोर्ड बैठक में ट्रस्टीज के फैसले को दरकिनार किया गया. ट्रस्ट की नियमित बैठकें करने से बचा गया. उत्तर प्रदेश राज्य पावर सेक्टर इम्प्लॉइज ट्रस्ट के ट्रस्टीज की 21 अप्रैल 2014 को और उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन अंशदायी भविष्य निधि ट्रस्ट की 24 मार्च 2017 को बैठक हुई. दोनों ही बैठकें पावर कारपोरेशन के तत्कालीन अध्यक्ष संजय अग्रवाल की अध्यक्षता में हुईं. 2014 की बैठक में तय हुआ कि ‘बैंक के निवेश की तरह सुरक्षित एवं अधिक ब्याज वाले विकल्प यदि हों, तो उन पर विचार कर प्रस्तुत किया जाए एवं आवश्यकता पड़ने पर निवेश सलाहकार की सेवाएं लेने के लिए निदेशक (वित्त) को अधिकृत किया गया.’

इसी तरह 2017 में ‘केंद्र सरकार की अधिसूचना के मुताबिक सिक्योरिटीज में निवेश पर सशर्त सहमति दी गई कि राष्ट्रीय बैंकों तथा टिपल ए रेटेड कंपनियों में सावधि जमा से अधिक सुरक्षित और अधिक ब्याज दर वाली हों. सिक्योरिटीज में निवेश का निर्णय केस-टू-केस बेसिस पर सचिव ट्रस्ट द्वारा कारपोरेशन के निदेशक(वित्त) की सहमति से लिया जाएगा.’ स्पष्ट है कि ट्रस्ट ने सिक्योरिटीज के अलावा पीएनबी हाउसिंग या एचडीएफएल जैसे में पीएफ का पैसा लगाने का अधिकार किसी को नहीं दिया लेकिन, 17 दिसंबर 2016 को 100 करोड़ पीएनबी हाउसिंग में और फिर डीएचएफएल में भारी-भरकम निवेश कर दिया गया, जिससे पीएफ के 2267.90 करोड़ रुपये फंस गए हैं.

जांच के दौरान यह भी पता चला कि अक्टूबर 2016 तक पीएफ का पैसा राष्ट्रीयकृत बैंकों के फिक्स्ड डिपाजिट में ही निवेश किया जाता रहा. और पीएफ के 4122.70 करोड़ रुपये डीएचएफएल में निवेश करने पर न ही ऊर्जा मंत्री होने के नाते तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव या मौजूदा ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा के कहीं हस्ताक्षर हैं और न ही पावर कारपोरेशन के तत्कालीन अध्यक्ष संजय अग्रवाल, प्रबंध निदेशक विशाल चौहान व एपी मिश्र के साइन हैं. 20 मई 2017 से अध्यक्ष आलोक कुमार या हाल ही में प्रबंध निदेशक पद से हटाई गईं अपर्णा यू. के भी डीएचएफएल में निवेश को लेकर कहीं हस्ताक्षर नहीं हैं.

इस सब जानकारियों के आधार पर ही सूबे की सियासत में खलबली मचा रहा बिजली विभाग का भविष्य निधि घोटाला योगी सरकार और नौकरशाही दोनों के लिए ही गले ही हड्डी बन गया है. हालांकि मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ यह कह चुके हैं कि सरकार भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करेगी. और इस मामले की जांच सीबीआई को दे दी गई है. किसी को बख्शा नहीं जाएगा. लेकिन अभी तक इस मामले में बड़े अफसरों पर जाँच अफसरों का ध्यान नही गया है, वही दूसरी प्रियंका गांधी ने कहा है कि छोटी मछलियों को पकड़कर ध्यान न भटकाएं, असली गुनाहगारों को सामने लाना होगा. सपा मुखिया अखिलेश यादव ने भी इस मामले में सरकार पर आरोप लगाया है, उन्होंने कहा है कि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी सत्ता नए-नए पत्रों से जनता का ध्यान भटका रही है. डीएचएफएल से 20 करोड़ रुपये का चंदा लेने वाले बीजेपी के मंत्री शर्माजी आप बताएं ये रिश्ता क्या कहलाता है.

अखिलेश यादव के इस आरोप का योगी सरकार ने कोई सीधा जवाब नहीं दिया है. इस संबंध में ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा का कहना है कि पावर कारपोरेशन के भ्रष्टाचारियों के खिलाफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मुहिम में अब तक तीन दागी अफसर जेल जा चुके हैं. किसी भी भ्रष्टाचारी को कतई बख्शा नहीं जाएगा. अब देखना यह है कि इस घोटाले को अंजाम देने वाले उस आईएएस अफसर तक जाँच अधिकारी कब पहुँच पाते है, जिसने एक केन्द्रीय मंत्री को खुश करते हुय केंद्र में तैनाती पायी.

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