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आरटीआई की धार भोथरी करती सरकार !

संजय कुमार सिंह 

सूचना आयुक्तों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से रिपोर्ट मांगी है. गुरुवार को राजस्थान पत्रिका में पहले पन्ने पर यह खबर थी. इस खबर के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से कहा है कि वे स्टेटस रिपोर्ट दाखिल कर बतायें कि सूचना आयुक्तों के पदों को लेकर क्या-क्या किया गया है. अदालत ने यह भी बताने के लिए कहा है कि वे इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 15 फरवरी के निर्देशों का पालन कर रहे हैं कि नहीं. यह खबर आपको किसी और अखबार में पहले पन्ने पर दिखी?    

इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने कहा है कि सरकारें नियुक्ति को लेकर निर्देशों का पालन नहीं कर रही हैं और अभ्यर्थियों को शॉर्ट लिस्ट करने की प्रक्रिया तथा शॉर्ट लिस्ट किए गए उम्मीदवारों के नाम वेबसाइट पर प्रकाशित किए जाने चाहिए. अखबार ने लिखा है कि 15 फरवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि छह महीने में सभी खाली पद भरे जाएं. इस खबर के साथ अखबार ने छापा है कि राजस्थान में (कांग्रेस की सरकार है) दो पद खाली और 9500 पद लंबित हैं. 

मैं जो अखबार देखता हूं उनमें पहले पन्ने पर यह खबर मुझे किसी भी अखबार में नहीं दिखी. नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर कोई विज्ञापन नहीं है फिर भी यह खबर नहीं है. दैनिक भास्कर में दो पहले पन्ने हैं - दोनों में नहीं है. मैं दैनिक जागरण का राष्ट्रीय संस्करण देखता हूं. इसमें पहले पन्ने पर विज्ञापन बिल्कुल नहीं होता है पर यह खबर यहां इसके बाद भी नहीं है. अमर उजाला में एक विज्ञापन है जो ना बड़ा ना छोटा है पर खबर यहां भी नहीं है. नवभारत टाइम्स में पहले पन्ने पर भरपूर विज्ञापन है. खबर यहां भी नहीं है. दैनिक हिन्दुस्तान में पहले पन्ने पर पूरा विज्ञापन है. तीसरे को पहला पन्ना बनाया गया है और करीब आधे पन्ने पर विज्ञापन है. खबर यहां भी नहीं है. कुल मिलाकर, पहले पन्ने पर विज्ञापन हो या नहीं, खबर नहीं है.  

आप जानते हैं कि आरटीआई (सूचना अधिकार) कानून केंद्र की पिछली कांग्रेस सरकार ने दिया है जिसे भारतीय जनता पार्टी की मौजूदा सरकार ने भ्रष्ट प्रचारित कर चुनाव में हरा दिया और येन-केन-प्रकारेण दोबारा सत्ता पा गई है. पर आरटीआई कानून का बुरा हाल है और सुप्रीम कोर्ट में मामला इसीलिए चल रहा है. सूचना के अधिकार कानून का सीधा संबंध अखबारों से हैं और निश्चित रूप से आज राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित खबर दूसरे अखबारों में भी पहले पन्ने पर छप सकती थी लेकिन नहीं है तो इसीलिए कि अखबारों को यह खबर महत्वपूर्ण नहीं लग रही है. निश्चित रूप से यह संपादकीय विवेक और आजादी का मामला है. मैं उसपर कोई टिप्पणी नहीं करता. 

सूचना के अधिकार से संबंधित दूसरी खबरों को अखबार कैसे छापते हैं इसकी चर्चा आज इस खबर के संदर्भ में  उचित रहेगी. 12 अक्तूबर को आरटीआई दिवस था और इस मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जो कहा वह दैनिक जागरण में 13 अक्तूबर को राजनीति के खबरों के पन्ने पर टॉप के सात कॉलम में छपा था. इस खबर का शीर्षक है, लोकतंत्र में मील का पत्थर साबित हुआ आरटीआई : शाह. उपशीर्षक है, बोले, शासन में पारदर्शिता लाना सरकार की प्राथमिकता, अब डैशबोर्ड पर उपलब्ध है सरकारी कामकाज की हर जानकारी. खबर में क्या कैसे कहा गया है और उसमें किए गए दावों और कथन की सत्यता पर मैं टिप्पणी नहीं करूंगा. ना उदाहरणों से इसे गलत साबित करने की कोशिश करूंगा. 

मैं सिर्फ यह बताना चाहता हूं कि उसी दिन एक और खबर आरटीआई पर इस सरकार का रुख साबित करने वाली थी जो उस दिन किसी हिन्दी अखबार में नहीं दिखी थी. वह खबर जानने लायक है और सरकार के उपरोक्त दावे के मद्देनजर तो बिल्कुल ही. यह खबर द टेलीग्राफ में छपी थी. इस खबर का शीर्षक हिन्दी में होता तो इस तरह होता, स्पष्टता जांच में नाकाम रहे सूचना पैनल. सूचना के अधिकार कानून की 14वीं सालगिरह पर किए गए एक सर्वेक्षण में देश के ज्यादातर सूचना आयोग अपारदर्शी और सूचना अधिकार का उल्लंघन करते पाए गए हैं. 

सर्वेक्षण के भाग के रूप में नागरिक समाज के दो संगठन - सतर्क नागरिक संगठन और सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज ने 28 राज्य सूचना आयोगों (एसआईसी) और केंद्रीय सूचना आयोग में आरटीआई आवेदन देकर एक जैसी सूचना मांगी. 29 में से 12 आयोगों ने ही पूरी सूचना दी. इसका शीर्षक है, “आरटीआई रिपोर्ट कार्ड: खाली पद और लंबित मामलों से जूझ रहे देश भर के सूचना आयोग”. इसमें कहा गया है, “आरटीआई कानून लागू होने की 14वीं सालगिरह पर जारी की गई रिपोर्ट के मुताबिक फरवरी 2019 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भी सूचना आयुक्तों की समय पर नियुक्ति नहीं हो रही है. इसकी वजह से देश भर के सूचना आयोगों में लंबित मामलों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है और लोगों को सही समय पर सूचना नहीं मिल पा रही है.”

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