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नेपाल में शुरू हुआ चीन का विरोध

यशोदा श्रीवास्तव

काठमांडू. नेपाल की राजनीति में वर्चस्व की जंग शुरू हो गई है. सत्तारूढ़ दल यानी कम्युनिस्ट पार्टी जहां भारत पर अपने हिस्से की जमीन हड़पने का आरोप लगाकर इसके विरोध पर उतर आई है वहीं नेपाली कांग्रेस ने ऐसा ही तोहमत चीन पर मढ़कर उसके विरोध की शुरूआत कर दी है. लेकिन नेपाल के अपने दोनों बड़े पड़ोसी राष्ट के विरोध में खास अंतर यह है कि नेपाल की सत्तारूढ़ दल कम्युनिस्ट पार्टी ने धारचूला जिले के कालापानी तथा लिपुलेक नामक स्थान के भारत के नक़्शे में दर्ज करने के विरोध में नेपाली कांग्रेस सत्तारूढ़ दल के साथ रही वहीं चीन के विस्तारवादी नीति के विरोध में नेपाली कांग्रेस को सत्तारूढ़ दल का साथ नहीं मिला. कम्युनिस्ट पार्टी का कोई अनुशांगिक संगठन भी नेपाली कांग्रेस के साथ नहीं दिखा. 

बता दें कि हाल ही नेपाल में सत्तारूढ़ दल ने भारत के विरोध में जगह जगह इंडिया गो बैक के नारे लगाए तथा भारत का नक्शा भी जलाया. प्रमुख विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस ने भी सत्ता रूढ़ दल का खुले दिल से साथ दिया. सत्ता रूढ़ दल का साथ देकर नेपाली कांग्रेस ने निश्चय ही यह साबित करने की कोशिश की कि उसके लिए राष्ट की अख्ांडता व संप्रभुता अहम है इसी क्रम में उसने नेपाल की करीब 36 हेक्टेयर जमीन कब्जा करने को लेकर चीन का विरोध किया है. नेपाली कांग्रेस के इस विरोध में सत्तारूढ़ दल ने हिस्सा नहीं लिया. इससे नेपाली कांग्रेस को यह कहने का मौका मिल गया कि उसके लिए राष्ट प्रथम है जबकि सत्ता रूढ़ दल के लिए चीन प्रथम है. खास बात यह है कि नेपाली कांग्रेस का चीन विरोधी आंदोलन नेपाल मे मैदानी इलाकों में ही सिमट कर रह गया. पूर्व में नेपाल का मैदानी इलाका नेपाली कांग्रेस का गढ़ रहा है लेकिन अब यहां कम्युनिस्ट पार्टी ने अपना पांव जमा लिया है. राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि नेपाली भू भाग पर कब्जे के बहाने नेपाली कांग्रेस तराई में अपनी खोई जमीन वापस करने की कोशिश में है. चीन विरोधी नेपाली कांग्रेस का आंदेलन मुख्य रूप से नेपाल के मैदानी जिले सप्तरी, वर्दिया तथा कपिलवस्तु में ही रहा. आंदेलन बहुत प्रभावी तो नहीं कहा जा सकता लेकिन चीनी राष्टपति का पुतला जलाकर और चीन वापस जाओ का नारा लगाकर नेपाली कांग्रेस ने सत्ता रूढ़ ओली सवरकार की मुश्किलें बढ़ा दी है. नेपाली कांग्रेस शुरू से ही नेपाल में चीन के बढ़ रहे प्रभाव का समर्थक नहीं रहा है.

नेपाली कांग्रेस के सांसद अभिषेक प्रताप शाह का कहना है कि हमारा सबसे विश्वसनीय पड़ोसी भारत है. हम राजनीतिक या समाजिक रूप से भारत के बेहद के करीब है. दोनों देशों में घटित किसी भी घटनाक्रम का प्रभाव दोनों देशों पर पड़ता है ऐसे में हम चाहेंगे कि नेपाल चीन की अपेक्षा भारत के करीब रहे. और फिर हम किसके करीब रहे या किससे दूर यह बाद की बात है, अभी हमारे संप्रुभता और अखंडता की रक्षा का सवाल है. भारत ने यदि हमारे भूभाग को अपने नक्शे में दर्ज किया है तो हम इसका भी विरोध कर रहे हैं और चीन यदि हमारी भूभाग को कब्जा कर रहा है तो नेपाली कांग्रेस इसका भी विरोध कर रही है. उन्हांने कहा कि हमारे आंदेलन में सत्तारूढ़ दल ने हमारा साथ नहीं दिया जबकि हमने भारत के विरोध में उसका साथ दिया. इससे यह साबित होता है सत्ता रूढ़ दल चीन के हाथों स्वयं को गिरवी रख चुका है.

                

इस सबके बीच नेपाल के राजनीतिक विश्लेषक और प्रवुद्ध वर्ग यह मान रहा है कि नेपाल का भारत से यह विरोध वक्ती है न कि स्थाई. तमाम अंर्तविरोध व मतभेद के बावजूद नेपाल मुश्तकिल तौर पर भारत विरोधी नहीं हो सकता. क्योंकि कई ऐसे कारण है जिससे दोनों देशों की मित्रता अटूट है. भारत ने नेपाल को अपने देश में बराबरी का दर्जा दिया हुआ है. उसे भारत में वह सारी सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हो जाती है जो एक भारतीय को उपलब्ध होती है. भारत की उदारता ही है कि उसने अंग्रेजों द्वारा गठित गोरखारेजीमेंट को बरकरार रखा है. इससे नेपाल के लाखों सैन्य परिवार का जीविकोपार्जन हो रहा है. अवकाश प्राप्त गोरखा सैनिकों को प्रतिवर्ष करीब 55 करोड़ पेंशन के रूप में दी जा रही है. नेपाल की जनसंख्या का 4.5 प्रतिशत लोग अपनी जीविका के लिए भारतीय सैन्य सेवाओं पर निर्भर है. इसके अलावा अप्रत्यक्ष रूप से करीब पौने दो लाख नेपाली लोग भारत के विभिन्न शहरों मंं सुरक्षित रूप से अपनी जीविका चला रहे हैं.फोटो साभार 

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