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ध्यान से देखिये ,ये फोटो देश के महान गणितज्ञ की है !

फज़ल इमाम मल्लिक 

पटना .ये जो फोटो देख रहे हैं देश-दुनिया में गणित के फॉर्मूले का लोहा मनवाने वाले महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह की है .फोटो को संभाल कर रख लें .देश के इतने बड़े वैज्ञानिक के निधन के बाद शासन प्रशासन और सरकार ने किस तरह उनकी उपेक्षा की यह उसका उदाहरण है .जीते जी सरकार की उपेक्षा का वे सालों से शिकार रहे पर निधन  के बाद ऐसा दृश्य देखने को मिलेगा यह किसी ने सोचा न था . नीतीश कुमार की सरकार में भी अधिकारियों ने जिस तरह का रवैया अपनाया, उसे शर्मनाक ही कहा जा सकता है. अपने नायकों का सम्मान हम जीते जी तो नहीं ही करते, मरने के बाद भी उनका सम्मान नहीं करें तो यह और भी शर्मनाक है. बिहार के इस महान सपूत के शव के साथ जिस तरह सरकार का रवैया रहा वह शर्मिंदा करने के लिए काफी है. 

वशिष्ठ नारायण सिंह की महानता का कायल देश और बिहार भले नहीं रहा हो और उन्हें उपेक्षित छोड़ दिया हो लेकिन उनकी महानता का कायल दुनिया था. वे महान गणितज्ञ थे. वशिष्‍ठ नारायण सिंह ने कभी आइंस्टीन के सिद्धांत को चु्नौती दी थी और दुनिया भर में सुर्खियां बटोरीं थीं. वे चालीस साल से मानसिक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित थे. उन्होंने पटना मेडिकल कॉलेज व अस्‍पताल (पीएमसीएच) में दम तोड़ा. उनका अंतिम संस्‍कार राजकीय सम्‍मान के साथ भोजपुर स्थित उनके पैतृक गांव में होगा.


वशिष्‍ठ नारायण सिंह 1974 में मानसिक बीमारी की वजह से कांके के मानसिक रोग अस्पताल में भर्ती किए गए थे. लेकिन 1989 में वे गढ़वारा (खंडवा) स्टेशन से लापता हो गए. सात फरवरी 1993 को छपरा के   डोरीगंज (छपरा) में एक झोपड़ीनुमा होटल के बाहर प्लेट साफ करते मिले. पिछले साल अक्टूबर में उन्‍हें पीएमसीएच के आइसीयू में भर्ती कराया गया. गुरुवार को फिर तबीयत बिगड़ने पर उन्‍हें पीएमसीएच लाया गया था. वशिष्ठ नारायण सिंह की मौत के बाद उनके पार्थिव शरीर को अस्पताल परिसर में बाहर ब्‍लड बैंक के पास रखवा दिया गया था. वहां शोकाकुल परिजनों की मदद को ले पीएमसीएच प्रशासन लापरवाह बना रहा. 


अस्‍पताल प्रबंधन ने शव ले जाने के लिए एंबुलेंस या शव वाहन तक मुहैया नहीं कराया. पार्थिव शरीर उनके पैतृक आवास पहुंचाने के लिए अस्पताल में मौजूद दलाल छह हजार रुपए की मांग कर रहे थे. लेकिन पीएमसीएच अस्पताल प्रबंधन ने परिजनों को एम्बुलेंस तक उपलब्ध नहीं कराया. सिर्फ डेथ सर्टिफिकेट जारी कर अस्पताल प्रशासन ने पल्ला झाड़ लिया. महान गणितज्ञ का शव ब्लड बैंक के बाहर देर तक पड़ा रहा और किसी ने इसकी सुध लेने की जहमत नहीं उठाई. 


निधन की खबर सुन कर न तो कोई अधिकारी आए और न ही मंत्री-संतरी पहुंचे. महान गणितज्ञ के साथ ऐसे बर्ताव को देखते हुए परिजन गुस्से में हैं. वशिष्‍ठ बाबू का शव घंटों वहीं पड़ा रहा. उनके निधन की खबर मिलते ही मीडिया पहुंची. मीडिया ने जब अस्‍पताल प्रबंधन की संवेदनहीनता उजागर की तब जाकर सरकार और जिला प्रशासन हरकत में आया. जिलाधिकारी के हस्‍तक्षेप पर परिजनों को एंबुलेंस मुहैया कराई गई. हालांकि पीएमसीएच प्रशासन ने पहले तो कहा कि वशिष्ठ नारायण सिंह को मृत अवस्था में अस्पताल लाया गया था. लेकिन, जब उनके परिजनों ने अस्पताल का जारी मृत्यु प्रमाणपत्र दिखाया तो अस्पताल प्रशासन ने चुप्पी साध ली. वैसे अस्‍पताल प्रबंधन ने लापरवाही के आरोपों से इनकार किया है.


तकरीबन चालीस साल से मानसिक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह पटना के एक अपार्टमेंट में गुमनामी का जीवन बिता रहे थे. मौत से कुछ दिनों पहले तक भी किताब, कॉपी और एक पेंसिल उनके सबसे अच्छे दोस्त रहे. कहा जाता है कि अमेरिका से वे अपने साथ दस बक्से किताबें लेकर आए थे, जिन्हें वे पढ़ते रहते थे. बाकी किसी छोटे बच्चे की तरह ही उनके लिए तीन-चार दिन में एक बार कॉपी-पेंसिल लानी पड़ती थी.

शिष्ठ नारायण सिंह का जन्म दो अप्रैल 1942 को बिहार के भोजपुर जिले के बसंतपुर गांव में हुआ था. विलक्ष्ण प्रतिभा के धनी वशिष्ठ नारायण ने 1958 में नेतरहाट स्कूल में सर्वोच्च स्थान हासिल किया और 1963 में बिहार बोर्ड से हॉयर सेकंड्री की परीक्षा में टॉप किया था और पटना के साइंस कॉलेज से पढ़ाई की. पटना विश्वविद्यालय ने 1964 में नियम बदलकर इन्हें एक साल में दी थी बीएससी आनर्स की डिग्री. पटना साइंस कॉलेज के तत्कालीन प्रिंसीपल प्रो जी नाथ की सिफारिश पर 1965 में अमेरिकन साइंटिस्ट प्रो  केली मिले, प्रतिभा देख अमेरिका भेजने का अनुरोध प्रो नाथ से किया और फिर बर्कले विश्वविद्यालय से नामांकन पत्र मिला. एक साल बाद ही वे एसोसिएट साइंटिस्ट प्रोफेसर के रूप में नासा से जुड़े. 


कोलंबिया इंस्टीट्यूट ऑफ मैथेमैटिक्स में 1967 में महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली. वशिष्ठ नारायण सिंह ने 1969 में द पीस ऑफ स्पेस थयोरी से आइंस्टीन की थ्योरी को चैलेंज किया.  इसी पर उन्हें पीएचडी मिली. वे 1971 में भारत लौटे और 1972 में आइआइटी कानपुर में प्राध्यापक बने. आठ जुलाई, 1973 को उनकी शादी हुई. लेकिन साल भर बाद ही 1974 में  मानसिक बीमारी की जांच शुरू. उन्हें कांके (रांची) अस्पताल में कुछ समय के लिए भर्ती किया गया. वे 1989 में गढ़वारा (खंडवा) स्टेशन से लापता हो गए. सात फरवरी 1993 को  डोरीगंज (छपरा) में एक झोपड़ीनुमा होटल के बाहर प्लेट साफ करते मिले थे.  


सिजोफ्रेनिया बीमारी से पीडि़त वशिष्ठ नारायण सिंह अपने भाई अयोध्या सिंह के साथ पटना में रहते थे. एक वक्त था, जब इस महान गणितज्ञ का लोहा हिन्दुस्तान ही नहीं बल्की अमेरिका जैसा विकसित देश भी मानता था. लेकिन सिजोफ्रेनिया से पीड़ित होने के बाद वे पटना के एक अपार्टमेंट में गुमनामी का जीवन बिता रहे थे. वशिष्ठ नारायण सिंह के निधन की खबर सुन कर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महान गणितज्ञ को श्रद्धा सुमन अर्पित किया और उन्हें श्रद्धांजलि दी. नीतीश कुमार ने शोकाकुल परिवार से मुलाकात भी की. परिजनों से मुलाकात के दौरान नीतीश कुमार ने वशिष्ठ नारायण सिंह के नाम पर इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने का भरोसा दिया. वशिष्ठ नारायण सिंह का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ उनके पैतृक गांव में होगा. वशिष्ठ नारायण सिंह की अंत्येष्टि में शामिल होने पटना से अधिकारी आरा जाएंगे.


लेकिन वशिष्ठ नारायण सिंह के निधन के बाद पहले सिस्टम का शर्मनाक चेहरा उजागर हुआ लेकिन बाद में पटना जिला प्रशासन की तरफ से वीवीआईपी के लिए रेड कारपेट बिछाया गया. तब वशिष्ठ नारायण सिंह को श्रद्धांजलि देने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहुंचे थे. वशिष्ठ नारायण सिंह का पार्थिव शरीर कुल्हड़िया कांप्लेक्स के पास रखा गया. मुख्यमंत्री के आने की सूचना के साथ पटना जिला प्रशासन चुस्त दिखा. मुख्यमंत्री के आने के पहले आनन-फानन में कुल्हड़िया काम्प्लेक्स परिसर में रेड कारपेट बिछाया गया. उसके बाद पहुंचे मुख्यमंत्री ने महान गणितज्ञ को श्रद्धा सुमन अर्पित किया. वशिष्ठ नारायण सिंह के निधन के बाद भी बेशर्म सरकारी व्यवस्था की मीडिया में खबर आने के बाद पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा ने नीतीश पर हमला किया. उन्होंने कहा कि वशिष्ठ बाबू के निधन पर नीतीश घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं. उन्हें इनकी मौत से कोई फर्क नहीं पड़ता. कुशवाहा ने ट्वीट कर कहा है कि बेशर्म सरकारी सिस्टम ने देश के महान गणितज्ञ को भी नहीं छोड़ा.

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