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भाजपा और तृणमूल दोनों का रास्ता आसान नहीं

रीता तिवारी

 कोलकाता.पश्चिम बंगाल में अगले महीने विधानसभा की तीन सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव खासकर सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस और उसे टक्कर देने वाली भाजपा के लिए कड़ी चुनौती साबित होंगे. बीते लोकसभा चुनावों के बाद यह पहला मौका होगा जब यह दोनों राजनीतिक दल चुनावी मैदान में एक-दूसरे के आमने-सामने होंगे. जिन तीन सीटों के लिए उपचुनाव होने हैं उनमें से एक-एक पर तृणमूल कांग्रेस, भाजपा और कांग्रेस का कब्जा रहा है.

लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की 18 सीटों पर विजय प्राप्त करने वाली भाजपा और प्रदेश की सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस के लिए बंगाल की तीन सीटों पर होने वाला चुनाव अग्निपरीक्षा जैसा हो सकता है. 25 नवंबर को विधानसभा की तीन सीटों पर होने वाला उपचुनाव लोकसभा चुनाव के बाद राज्य में राजनीतिक हवा के रुख का संकेत देगा. आम चुनाव के बाद यह उपचुनाव राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन करने वाली भाजपा की पहली परीक्षा होगी.


जिन सीटों पर उपचुनाव होना है उनमें पश्चिम मेदिनीपुर जिले की खड़गपुर, नदिया जिले की करीमपुर और उत्तर दिनाजपुर की कालियागंज सीटें शामिल हैं. कालियगंज सीट कांग्रेस विधायक प्रमथनाथ राय के निधन से खाली हुई है जबकि खड़गपुर सीट से पिछली बार विधायक चुने गए प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने लोकसभा चुनाव जीतने की वजह से इस्तीफा दे दिया था. करीमपुर की तृणमूल विधायक महुआ मित्र ने भी कृष्णनगर संसदीय सीट से जीतने के बाद इस्तीफा दे दिया था.

भाजपा के सामने इन चुनावों में जहां लोकसभा के प्रदर्शन को दोहराने की चुनौती होगी वहीं तृणमूल कांग्रेस इन तीनों सीटों को जीत कर अपने पैरों तली खिसकती जमीन को बचाने का प्रयास करेगी. कांग्रेस और माकपा ने इन उपचुनावों में मिल कर लड़ने का फैसला किया है. इसके तहत कांग्रेस खड़गपुर व कालियगंज सीटों पर चुनाव लड़ेगी. वाममोर्चा के हिस्से खड़गपुर सीट आई है.


इस साल हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य में 42 में से 18 सीटों पर जीत दर्ज की थी और वह राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस से महज चार सीटें पीछे थी. . इन उपचुनावों के नतीजों से वर्ष 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले दोनों दलों का असर देखने को मिलेगा. भाजपा के लिए जहां असली चुनौती लोकसभा चुनाव में मिली अपनी सफलता को दोहराना है जबकि तृणमूल कांग्रेस अपना खोया राजनीतिक आधार वापस हासिल करने की कोशिश करेगी. उपचुनाव के नतीजे यह भी तय करेंगे कि विपक्षी कांग्रेस और माकपा राज्य की राजनीति में कितनी प्रासंगिक रह गई हैं. राज्य में 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को दो सीटें मिली थीं जबकि सीपीएम का खाता तक नहीं खुल सका था. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष का दावा है कि पार्टी इन तीनों सीटों पर विजयी रहेगी.


 लेकिन वह मानते हैं कि करीमपुर और कालियागंज सीटों पर उपचुनाव पार्टी के लिए कठिन परीक्षा साबित होगी. दरअसल, इन दोनों क्षेत्रों में मुसलमानों और दलितों की अच्छी खासी आबादी है. इन दोनों क्षेत्रों के ज्यादातर दलित शरणार्थी हैं. उनके पूर्वज 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पूर्वी पाकिस्तान से भाग कर भारत में आ गए थे. भाजपा राज्य की सत्ता में आने के बाद पश्चिम बंगाल में एनआरसी लागू करने पर विचार कर रही है.

वहीं, पिछले तीन महीनों से तृणमूल कांग्रेस के जनसंपर्क अभियान ‘दीदी के बोलो’ से पार्टी को उम्मीद है कि उसमें नई ऊर्जा का संचार होगा और वह अपना खोया हुआ आधार वापस पा लेगी. तृणमूल कांग्रेस महासचिव पार्थ चटर्जी कहते हैं कि पश्चिम बंगाल के लोग बीते पांच-छह  महीनों में समझ गये हैं कि भाजपा सांप्रदायिक और विभाजनकारी ताकत है. उपचुनावों में पार्टी (तृणमूल कांग्रेस) सभी तीनों सीट जीतेगी क्योंकि राज्य के लोगों का ममता बनर्जी पर विश्वास है. दूसरी ओर, कांग्रेस प्रदेश प्रमुख सोमेन मित्र ने उम्मीद जताई है कि माकपा व कागंरेस के साथ साथ मिल कर लड़ने से लोगों को महसूस होगा कि यह गठबंधन ही बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का एकमात्र विकल्प है.

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