जनादेश

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फिर दिखी हिंदी मीडिया की दरिद्रता !

संजय कुमार सिंह 

टेलीविजन के साथ-साथ हिन्दी अखबारों में भी काम के विषयों की चर्चा नहीं होती है.अखबारों में भी कमोबेश यही हाल है.इन दिनों चर्चा के तमाम मुद्दों के साथ एक मुद्दा यह हो सकता है कि भारतीय जनता पार्टी ने महाराष्ट्र में जबरन सरकार बनाने की कोशिश की तो उससे क्या नफा-नुकसान हुआ, कितना उचित था और उसमें संवैधानिक संस्थाओं की कितनी और कैसी भागीदारी रही और उसका क्या मतलब या प्रभाव होगा.मैंने महसूस किया है कि अखबारों और टेलीविजन से ऐसे विषय गोल रहते हैं जिनमें भाजपा या सरकार की आलोचना हो सकती हो.इसलिए, चर्चा का मुद्दा यह है कि शिवसेना कांग्रेस और एनसीपी की सरकार कितने दिन टिक पाएगी, कैसे यह बेमेल सरकार है आदि.इस संबंध में यह स्पष्ट है कि शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी ने जो किया खुलकर किया और लगभग विधिवत किया.पर स्थिति यह है कि भाजपा और उसके समर्थक जो करें वह ठीक मान लिया जाता है और दूसरे अगर वही करें तो पुराने मामलों को भूलकर उसे गलत बताया जाने लगता है.इस संबंध में किसी एक दिन के अखबारों के संपादकीय पन्ने से सही अंदाजा नहीं लगेगा और संभव है जिसने आज किसी विषय पर चर्चा की हो वह कल किसी और पर करे या कर चुका हो.

इसके बावजूद, हिन्दी अखबारों के संपादकीय पृष्ठ विषयांतर होने के लिए भी देखने लायक है.हालत यह है कि खबरों के मामले में मजबूत अखबार भी विचार के मामले में कमजोर है.आज इंडियन एक्सप्रेस के संपादकीय पृष्ठ पर दो में पहला आलेख, न्यू लुक बीजेपी, ओल्ड कांग्रेस (नई दिखने वाली भाजपा, पुरानी कांग्रेस) शीर्षक से प्रकाशित है.गिरीश कुबेर के इस लेख के मुताबिक, महाराष्ट्र से पता चला है कि भाजपा तेजी से वही बनती जा रही है जिसके खिलाफ होने का दावा वह करती रही है.तीन संपादकीय में एक, और पहला, फ्रॉम सेना टू पार्टी है.इसमें कहा गया है कि शिवसेना सत्ता में ढेर सारे अनावश्यक बैगेज (भार) के साथ आई है.

इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर मुंबई डेटलाइन की एक बाईलाइन वाली एक्सक्लूसिव खबर भी है.शीर्षक है, सेना की पेशकश स्वीकार करके हमारी पार्टी ने राजनीतिक गलतियां की.महाराष्ट्र भाजपा के दिग्गज नेता एकनाथ खड्से ने इसमें कहा है कि पार्टी ने सिद्धांतों से समझौता किया था.खड्से कहते हैं कि वे भाजपा छोड़कर शिवसेना में जाने की सोच रहे हैं क्योंकि सिद्धांतों से समझौता करके लोगों की भावनाएं आहत करने वाली पार्टी के साथ रहने का क्या मतलब है.

टाइम्स ऑफ इंडिया में भी आज पहला आलेख इस विषय पर है, जब धूल जम जाएगी.गीता शेशु के इस आलेख में कहा गया है कि महाराष्ट्र में शिव सेना, एनसीपी और कांग्रेस को बहुत सारी समस्याएं दूर करनी है.इसमें कहा गया है कि महाराष्ट्र में इस समय चल रहे राजनीतिक सर्कस में संवैधानिक मूल्यों के प्रति जिम्मेदारियों को निन्दनीय ढंग से निभाया गया है.जब मामला स्थिर हो जाएगा तो क्या इनमें से कोई भी एक गंभीरता से शासन की इन संस्थाओं में फिर से विश्वास स्थापित करने के लिए काम करेगा?

टाइम्स ऑफ इंडिया में आज तीन में से दो संपादकीय इसी विषय पर है.पहले का शीर्षक है गठजोड़ का प्रयोग.इसमें कहा गया है कि भाजपा की केंद्रीयकृत (व्यक्तिकेंद्रित) कार्यशैली के विकल्प के रूप में महाराष्ट्र अगाडी ने एक संभावित विकल्प की पेशकश की है.कहने की जरूरत नहीं है कि टाइम्स ऑफ इंडिया का संपादकीय पन्ना समस्या को समस्या के रूप में देख रहा है और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के साथ इसपर आगे कौन चर्चा करेगा जैसे मुद्दे उठाए हैं.शिवसेना का कांग्रेस और एनसीपी जैसे दलों के साथ मिलकर सरकार चलाने का प्रयोग निश्चित रूप से नया है और इसके प्रदर्शन को देखने के बाद ही कुछ कहना ठीक रहेगा.अखबार भी यही मानता लग रहा है।

इसके मुकाबले हिन्दुस्तान टाइम्स में संपादकीय पन्ने पर आज तीन आलेख और दो संपादकीय हैं.इनमें दो आलेख महराष्ट्र की राजनीति पर हैं जबकि दोनों संपादकीय किसी और विषय पर है.पहला लेख आशीष चंदोरकर का है जो महाराष्ट्र में परस्पर विरोध पर है.दूसरे आलेख का शीर्षक हि्न्दी में होता तो कुछ इस तरह होता, सेना के नेतृत्व वाला गठजोड़ सुविधा की राजनीति है.सवाल उठता है कि देश सेवा के लिए राजनीति में आता कौन है और सत्ता में आने से पहले नरेन्द्र मोदी ने बाते चाहे जैसी की हों, सत्ता मिलने बाद इससे पूरी तरह बदल गए.महाराष्ट्र में तो सत्ता पर कब्जे की लड़ाई में बुरी तरह हार गए.तमाम संवैधानिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर मुख्यमंत्री को शपथ दिलाने, मीडिया को भी सूचना नहीं देने और सबसे पहले ट्वीट से बधाई देने का कोई फायदा नहीं हुआ.द टेलीग्राफ में भी संपादकीय पृष्ठ पर दो आलेख और दो संपादकीय हैं और दोनों में एक-एक महाराष्ट्र से संबंधित है.लेख स्वपन दासगुप्ता का है और संपादकीय, सॉरडिड ड्रामा शीर्षक से इसी विषय पर है.इसके मुकाबले हिन्दी अखबारों की दरिद्रता या विविधता देखिए.कुछेक अपवाद जरूर हैं.पर हिन्दी के ज्यादा अखबारों में महाराष्ट्र की राजनीति की चर्चा कम है.संपादकीय में भी. 

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