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सेहत को फायदा पहुंचे ऐसा हलवा बनाएं !

पूर्णिमा अरुण

जनवरी की ठिठुरती ठंड में गर्म-गर्म हलवे शौक से खाए जाते हैं. आजकल दावतें हलवे के बिना पूरी नहीं होती.इनमें गाजर का हलवा विशेष भी है और आम भी क्योंकि घर-घर सरलता से बना लिया जाता है. गाजर अपने आप में ही गुणकारी कंद है. वात,पित,कफ तीनों के लिए लाभप्रद. खून की कमी,आँखों की रतौंधी से लेकर बवासीर तक में मददगार है. ऐसे गुणकारी कंद का हलवा स्वास्थ्यवर्धक ही होगा बशर्तें बनाने का तारिका सही हो.

गाजर के हलवे में अमूमन मावा (दूध को कढ़ा कर बनाया जाता है)मिला दिया जाता है. यह हलवे का स्वाद जरूर बढ़ा देता है लेकिन इससे हलवा गरिष्ठ(भारी)हो जाता है. भारी होने से हलवा पचाना मुश्किल हो जाता है. जब पचेगा ही नहीं तो शरीर को क्या लगेगा.दावतों और दुकानों में मिलने वाला हलवा ऐसा ही है. घर पर हम इस तरह से हलवा बना सकते हैं जो स्वास्थवर्धक हो. इसके लिए कद्दूकस किए गाजर को सबसे पहले गाय के घी में भून लें उसके बाद जरूरत लगे तो दूध में या बिना दूध के ही गाजर को पकने दें. गाजर गल जाने के बाद उसमें बूरा मिलाए.अगर मेवें (बादाम,पिस्ता,काजू,किशमिश) डालने हो तो वे भी घी में छोंक कर डालें.घी में भूनने का लाभ यह है कि गाजर के पौष्कतत्व घी में समा जाते हैं. आयुर्वेद के हिसाब से घी अच्छा माध्यम होने से पौष्कतत्वों को मस्तिष्क तक पहुंचा सकता है.

जाड़ों में खाया जाने वाला दूसरा प्रिय हलवा मूंग की दाल का है. इसे बनाना थोड़ी मेहनत का काम है. इसलिए घरों में कम ही बनता है लगभग दावतों में या हलवाई के यहाँ से लेकर ही स्वाद लिया जाता है. हलवाई शब्द भी हलवे से ही उपजा है.हलवे का अरबी में मतलब है मीठा और मिठाई बनाने वाला हुआ हलवाई. आयुर्वेद के अनुसार हलवा उचित है या नहीं,कहा नहीं जा सकता लेकिन हलवा बनाने की पुरानी परम्परा रही है जैसे रोटी बनाने की है. जब रोटी भी अपनी हो गई तो हलवा भी अपना हो गया है. सूजी का हलवा तो बतौर प्रसाद पाया ही जाता है -चाहे गुरुद्वारे का कडा प्रसाद हो या रामनवमी का. मीठे के रूप में यह दक्षिण भारतीय थाली में रवा केसरी के रूप में सजता है तो पंजाब में हलकी रंगत लिये होता है. मुगलिया मिठाई में काजू,किशमिश,बादाम,पिस्ता आदि मेवों से लबरेज रहता है. मेरे ख्याल से तो यह गाजर से भी ज्यादा प्रचलित है क्योंकि बारह महीने बनाया जाता है. अभी हाल ही में एक दावत में निराले ही रूप में नजर आया. गोलगप्पे के अन्दर भर कर रखा था. कई जनों को समझ नहीं आया.गोलगप्पा यानि पानीपूरी और हलवे के साथ? फिर पुरानी दिल्ली का नाश्ता याद आया 'निगोड़ी-हलवा'. वही था.तेज नमक की अजवाइन डली मोटे आटे की गोलगप्पे आकार की पूरी,तेज मीठे हलवे के साथ खायी जाती हैं.मीठे और नमकीन का स्वाद एक साथ लिया जाता है.निश्चय ही यह वात को कम करता ही होगा. कभी गले में खराश हो तो आटे या सूजी का पानी जैसा पतला और काली मिर्च डला हलवा खाने से आराम देता है, इसे आम बोली में सीरा भी कहते हैं.

शकरकन्दी भी गाजर की तरह गुणकारी है. बस यह गाजर की तरह गर्म तासिर की नहीं है. हड्डियों को मजबूत करने के साथ ही खून की कमी को पूरा करती है.उबाल कर खाने से यह ज्यादा कफकारी हो जाती हैं. इसका भी घी में भून कर बनाया हलवा बदन दर्द में आराम देता है बशर्ते इसे शाम से पहले खा लें.यूं तो हलवों की भी लम्बी फेहरिस्त है- बेसन का,चुकन्दर का,आलु का,कद्दू का वगैरह-वगैरह. लेकिन दो हलवों का जिक्र जरूर करना चाहते हैं जो मिठाई के रूप में प्रसिद्ध हैं. एक करांची हलवा या बाम्बे हलवा दूसरा सोहन हलवा. करांची हलवा अरारोट से बनाया जाता है.अरारोट स्वास्थ के अनुकूल है.सोहन हलवा को मज़ाक में घी हलवा भी कहा जा सकता है, यह गेहूँ के आटे और घी से बनता है.

जाड़ों में आप जैसा भी हलवा खाइए पर उसमें केसर,जायफल जैसी गर्म तासिर की चीजें होनी जरूरी हैं और सुबह और शाम छः बजे से दस बजे के मध्य न खाएं.

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