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फ़्रांसिसी उपनिवेश में कुछ दिन

सतीश जायसवाल

चंदन  नगर भी यनम की तरह एक फ्रेंच उपनिवेश रहा है. और इसकी ही तरह फ्रांसीसियों से पहले डचों के आधिपत्य में रहा.पुदुचेरी का फ्रांसीसी उपनिवेश 4 भौगोलिक-प्रशासनिक खण्डों में बँटा हुआ था -- पुदुचेरी, कराईकल, माहे और यह, यनम. यह पुदुचेरी से ८७० किलोमीटर की दूरी है. और आन्ध्र प्रदेश के साथ लगा हुआ है. यहां पहुंचना आन्ध्र के ही किसी हिस्से में पहुंच जाने जैसा लगा. बोली-बानी में, पहरावे-ओढ़ने में और रीति-रिवाजों में ,भी.दूसरे दिन हमें यहां के चर्च में हो रहे एक विवाह-संस्कार को देखने का अवसर मिल गया. वर-वधू सहित, उसमें शामिल सभी लोग स्थानीय तेलुगुभाषी ईसाई थे. और विवाह की उनकी विधियां वही देसी-स्थानीय थीँ जो उनके पूर्वजों के समय में भी रही होंगी. इन लोगों ने अपने यहां की विवाह विधियों और अन्य रीति-रिवाजों को उन दिनों में भी बनाये रखा था जिन दिनों यहाँ फ्रांसीसियों का अधिपत्य था. यहाँ और आसपास के स्थानीय समुदायों में बाल- विवाह का चलन लम्बे समय तक रहा है. ब्रितानी भारत में बाल-विवाह प्रतिबन्धित हो जाने के बहुत दिनों बाद तक भी. आसपास के लोग यहां,यनम में आकर बाल-विवाह कराया करते थे. बाल-विवाह का निषेध करने वाला शारदा कानून यनम में बहुत बाद में लागू हुआ.ऐंग्लो-इण्डियनों की तरह फ्रांसीसी और स्थानीय रक्त के मेल-मिलाप से उपजी नस्ल को ''क्रियोल'' कहा गया. लेकिन यनम में स्थानीय समुदायों के साथ ऐसा घुलना-मिलना शायद कम हुआ. अलबत्ता यहां के अधिकाँश तेलुगुभाषी स्थानीय लोगों ने अपनी स्थानीयता को बनाये रखते हुए फ्रांस की नागरिकता लेना पसंद किया.किसी औपनिवेशिक नगर या पुराने पत्तन की पुरातनता तक पहुँचने का एक आजमाया हुआ तरीका मेरे पास है. वहाँ की सबसे पुरानी किसी शराब की दुकान तक पहुंचते ही उस पुरातनता की आहट मिलने लगती हैं. मैंने अपना वही तरीका यहां भी आजमाने की कोशिश की. यनम में शराब सस्ती है. इसलिए, विशाखापत्तनम और आसपास के शौक़ीन लोग शराब पीने के लिए यहाँ चले आया करते हैं. वैसे कुछ शौक़ीन लोग तो दिखे और शराब की दुकानें भी दिखीं. लेकिन शराब की वैसी कोई पुरानी दुकान नहीं मिली जिसके पास उस पुरातनता की आहट हो रही हो. ऐसी कोई पुरानी दुकान यहाँ होगी जरूर, लेकिन हम वहाँ तक पहुँच नहीं पाए. यनम १९६३ में विधिवत भारत संघ के केंद्र प्रशासन के अंतर्गत आया. लेकिन विलय के इन ५०-६० वर्षों के छोटे से समय-काल में ही ३०० वर्षों का लम्बा उपनिवेश-काल यहां इतना निस्पन्द हो चुका है कि उसकी आहट तक नहीं मिल रही है !आज का यनम पूरे तौर पर इन ५०-६० वर्षों की एक नयी बसाहट है. किसी मध्यम दर्ज़ा औद्योगिक बस्ती जैसी. करीने से बसाई गयी कालोनियां. साफ़-सुथरी सड़कें. और उन पर तरतीब से की गयी रोशनियां. मुख्य सड़क के दोनों किनारों पर, हमारे अपने समय के राजनेताओं की, प्रतिमाओं की कतारबद्ध सजावट. सभी प्रतिमाएं सुनहरे रंग के पानी से एक जैसी रंगी हुयी हैं. देखने में, यह सजावट अरुचिपूर्ण लगती हैं. और विचार में, कहीं-कुछ खटकता भी है.डचों और फ्रांसीसियों के पास उनका अपना मूर्ति शिल्प था. सेरामपुर और चन्दननगर जैसे उनके दूसरे उपनिवेशों में उनका अपना मूर्तिशिल्प उनके शासकों और इतिहास नायकों की प्रतिमाओं में दिखता है. लेकिन यहाँ, यनम में उनकी कोई प्रतिमा नहीं दिखी. शायद हटा दी गयी होंगी. या शायद, हम वहाँ नहीं पहुँच सके हैं. अभी तक तो हम लोग वहाँ भी नहीं पहुँच सके थे जहां वो लोग रहा करते होंगे. उनके घर, उनके बाज़ार. कुछ ना कुछ तो वहाँ फिर भी बाकी होगा ! लोगों की स्मृतियों में, किस्से-कहानियों में.चाहे नदी के पास यहां कोई प्रेम-कहानी नहीं है , लेकिन ३०० बरसों के इतने लम्बे दिन बिना किसी कहानी के कैसे हो सकते हैं ? यनम में फ्रांसीसी भूतों की कहानियां भी बताई जाती रही हैं. फ्रांसीसी भूत और उनके करतब हमारे यहां के भूतों और उनके करतबों जैसे ही रहे होंगे या उनसे कुछ अलग ? यह जानने की जिज्ञासा होती है. श्मसान और वीराने हमारे यहां के भूत-प्रेतों के रहने और उनके मिलने की जानी-पहिचानी जगहें होती हैं. तो फ्रांसीसी भूत भी यहाँ ऐसी ही किन्हीं जगहों में रहते होंगे. और रातों में निकलते होंगे. कल, जब हमको यहाँ से निकलना है तब ऐसा हो सकता है कि जाते-जाते हम वहाँ पहुँच जाएँ और उनका पता मिलने लगे.यनम में डच या फ्रांसीसी शासकों और उनके इतिहास नायकों की कोई प्रतिमा नहीं दिखना एक खटकने वाली बात भी थी. लेकिन फ्रेंच शासकों की स्मृति में एक चर्च यहां जरूर है. सेन्ट ऐन्स कैथलिक चर्च फ्रेंच शासकों की स्मृति में बनवाया गया था. यह, यहां के पुराने चर्च से बाद का है. यनम का पुराना चर्च तो १७६९ का है. लेकिन शासकों की स्मृति में बनवाया गया सेन्ट ऐन्स चर्च १८४६ का है. यूरोपीय शिल्प में बने इस चर्च का शिलान्यास किन्हीं फादर मिशेल लेकनम ने किया था. लेकिन चर्च के पूरा होने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गयी. हो सकता है कि उनकी अतृप्त आत्मा अभी तक यहां भटकती होगी.चर्च के सामने ही पुरानी सिमेट्री है. वह धूप में निस्पन्द पड़ी हुयी मिली. सिमेट्री के भीतर वीराने का वास था. और दरवाज़े पर पड़ा हुआ ताला, मालूम नहीं कब से नहीं खुला था. शायद अरसे से यहाँ किसी का आना-जाना नहीं हुआ था. किन्हीं के नाते-रिश्तेदार भी शायद अब उतनी दूर, फ़्रांस से चलकर यहाँ नहीं आते होंगे.डचों के पास नील की खेती करने का कौशल था. उन्होंने अपना यह कौशल भारतीयों को सिखाया था. वहाँ, बंगाल के सेरामपुर और चन्दन नगर में तो स्थानीय लोगों को नील की खेती करने का कौशल डचों ने ही सिखाया था. यहाँ, यनम में भी सिखाया होगा. उनके समय में यनम नील का एक बड़ा व्यापारिक केंद्र रहा होगा. यहां से उनके व्यापारिक जहाज गोदावरी नदी के रास्ते समुद्र के लिए निकलते होंगे. और दूर देशों तक जाते होंगे. अब यहाँ उन दिनों के नील के कुँओं के अवेशष भर रह गए हैं. नील का रोज़गार-व्यापार नहीं.यनम में कोई बड़ा युद्ध हुआ हो, ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता. फिर भी डचों ने यहां, पास के ही एक गांव -- नीलपल्ली में अपने लिए एक किला बनवाया था. शायद, किले में उनका खजाना रहा होगा. यहां उनकी अपनी टकसाल भी थी. वहाँ मुद्राएं ढाली जाती थीं. वहाँ जाने और उस टकसाल को देखने का मन था. लेकिन अब वहाँ ना उनका किला बचा और ना ही उनकी टकसाल. डचों के जाने के बाद यनम फ्रांसीसियों का हो गया. और नीलपल्ली गांव अंग्रेजों के आधिपत्य में आ गया.उन दिनों मंगलवार के दिन भरने वाला, यनम का साप्ताहिक हाट मंगलावरम बड़ा प्रसिद्द था. उसकी प्रसिद्धि वहाँ मिलने वाले इम्पोर्टेड सामानों के लिए थी. और उन दिनों में भी भारतीयों को इम्पोर्टेड सामान ललचाता था. इसके लिए दूर-दूर से लोग यहां आते थे. यह देखकर अंग्रेजों के आधिपत्य वाले नीलपल्ली ने भी अपने यहां मंगलवारी हाट शुरू कर दिया. इस पर अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच एक लंबा विवाद चला. यह विवाद, उस समय के मद्रास प्रेसिडेंसी तक पहुंचा, जो अंग्रेजों का मुख्यालय था. वहाँ इस विवाद का फैसला यनम के पक्ष में हुआ. यनम का वह मंगलवारी हाट तब से चला आ रहा है. क्या उन दिनों की कुछ रौनक वहाँ आज भी बची हुयी होगी ? क्या पता. जिस दिन हम लोग वहाँ थे, वह मंगलवार का दिन नहीं था.


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