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जाड़ों में गुलगुला नहीं गुड़ खाएं !

पूर्णिमा अरूण

उत्तर भारत में जहाँ गन्ने की पैदावार बहुतायत में है, आजकल जगह-जगह गुड़ बनाने का काम काम चल रहा है. गाड़ी-बस के सफर में मुख्य सड़कों से गुजरते समय यह देखा जा सकता है और पकते हुए गन्ने के रस की खुशबु महसूस की जा सकती है.

कोल्हू पर गन्ने का रस पिरवा कर कच्ची भट्टियों में उसे पका कर गुड़ बनाने की बहुत पुरानी परम्परा रही है. दीपावली के बाद कस्बों-गॉवों में अस्थायीतौर पर कोल्हु लगा दिये जाते हैं. जहाँ कच्ची भट्टियों में बड़े बड़े कड़ाहों पर गन्ने का रस पकने रख दिया जाता है. सुकुलाई नाम के पौधे की जड़ और डंठल के पानी से रस का मैल उतारा जाता है. धीरे-धीरे रस गाढ़ा होता जाता है. गाढ़ी राब को पत्थर की परातों में डाला जाता है जो ठंडा होने पर गुड़ का रूप ले लेता है. इस गुड़ का रंग ललाई लिये होता है. आम बोली में इसे बिना मसाले का गुड कहते हैं. बाज़ार में जिस गुड़ की भेली का रंग सफेदी की ओर हो, समझ जाएं कि रस की सफाई किसी कृत्रिम रसायन से की गई है. सफेद रंगत का यह गुड़ सेहत के लिए ठीक नहीं.

गुड़ और उससे बनी चीजें खाएं बिना जाड़ा नहीं गुजरता. गुड़ की तासिर गर्म है. यह वात नाशक है. हल्के पित्त के लिए भी ठीक है. पेशाब से जुड़ी बिमारियों से बचाव करता है. ताज़ा गुड़ कफ जरूर बढ़ा देता है इसलिए खाँसी होने पर सेवन नहीं करना चाहिए. गुड़ जितना पुराना होता है उतना ही गुणकारी होता जाता है. पुराना गुड़ पचने में सरल है. वात-पित को हरने वाला है. यह खून भी साफ करता है. गुड़ में अदरक मिला कर खाने से कफ भी ठीक हो जाता है. हरड़ के साथ खाया गुड़ पित्त नाशक है. सौंठ मिलाकर खाने से वात ठीक हो जाती है. तीनों दोषों को हरने वाले गुड़ की महिमा बड़ी है. यही नहीं यह आयरन, फोस्फोरस एवं कैल्शियम से भरपूर है. इसे खाने से इनकी कमी से होने वाली बिमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है. भोजन के बाद एक डली गुड़ खाने से पाचन अच्छा होता है.

यूँ तो गुड़ की डली खाने में अपने आप ही स्वादिष्ट लगती है फिर भी इसे हलवे, लड्डू, पिन्नी एवं चिक्की आदि बनाने में चीनी की जगह उपयोग करने से सोने में सुहागा हो जाता है. सल्फरयुक्त चीनी होने से सेहत को नुकसान पहुँचता है. गेहूँ के मीठे दलिये के अलावा मक्के एवं बाजरे की राब बनाते समय भी गुड़ का उपयोग अच्छा रहता है. गुड़ की चाशनी में भुनी मुंगफली डाल कर बनी चिक्की भी स्वादिष्ट होती है.

थोड़ी मात्रा में तो गुड़ का बारहों महीने उपयोग किया जा सकता है. कर्नाटक के सांभर में इमली के साथ गुड़ भी डाला जाता है. महाराष्ट्र की पूरन पोली भी इसके बिना नहीं बनती. गाजर-गोभी का पंजाबी अचार हो, आम की लॉन्ज हो या पना सब में पड़ता है. यहां तक कि गर्मी के दिनों में गुड़ के पानी में ही सत्तु पीना स्वादिष्ट भी है और सेहतमन्द भी. गुड का पानी ठंडी तासिर का माना जाता है.

गुड़ से ही शक्कर भी बनायी जाती है. गुड़ की राब जब पक रही होती है तो उसकी और सफाई करके उसे गदानुमा लकड़ी के हथौड़ों से कूट-कूट कर घोटते हैं तो दानेदार चूरा तैयार हो जाता है. यहीं शक्कर है जिसे गर्म-गर्म चावलों के साथ घी मिला कर खाया जाता है. इसी शक्कर को चक्करी पर चला कर शीरे को बिलकुल अलग कर देने से हल्के भूरे रंग के क्रिस्टल तैयार हो जाते हैं. यह बारिक चीनी जैसे दिखायी देते है जिसे खाण्ड कहते हैं. इसकी तासीर ठंडी होती है जाड़ों में इसका उपयोग नहीं करना चाहिए. खाण्ड को दूध के छींटे दे कर और शोधित किया जाता है तब बूरा बनता है. गन्ने के रस से लेकर बूरा बनने तक की पूरी प्रक्रिया खाण्डसारी कहलाती है. चीनी मिलों के बनने के बाद खाण्डसारी उद्योग खत्म सा होता चला गया. सल्फर से साफ हुई सफेद झक चीनी ने सब को मोहित कर लिया है. हालत इतनी बिगड़ गई है कि आधुनिक जन बूरा को पीसी हुई चीनी ही समझते हैं. खाण्डसारी में भी लागत कम करने के लिए शीरे की सफाई कृत्रिम रसायनों से की जाने लगी है.


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