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कड़ाके की ठंढ से बचाती 'कांगड़ी '

मनु श्रीवत्स 

जम्मू-कश्मीर इन दिनों जबरदस्त शीतलहर से जकड़ा हुआ है. ऐसे में सर्दी से बचने के लिए तरह-तरह के साधन और उपकरण आजमाए जा रहे हैं. मगर तमाम तरह के आधुनिक उपकरणों के बादजूद आज भी कश्मीर की पारंपरिक ‘कांगडी’ ही अपनी गर्माहट से लाखों लोगों को भयंकर ठंड से बचा रही है.आकर्षक और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उपलब्ध होने के बावजूद कश्मीर में ‘कांगडी’ का आकर्षण व आवश्यकता कम नही हुई है. तमाम तरह की आधुनिक सुविधाएं भी ‘कांगडी’ की मांग और ज़रूरत को कम नहीं कर पाईं हैं. आज भी ‘कांगडी’ की अपनी पहचान कायम है.


‘कांगड़ी’ को बनाना आसान नहीं है, बेहद संयम और धीरज के साथ एक ‘कांगड़ी’ बनकर तैयार होती है. कुम्हार द्वारा तैयार एक मिट्टी के कटोरेनुमा बर्तन के इर्द-गिर्द कश्मीर में पाई जाने वाली विकर नाम की लकड़ी (बांस से मिलती जुलती) के टुकड़ों से एक तरह की टोकरी बुनी जाती है. बुनी गई इसी लकड़ी की टोकरी के ठीक बीचोबीच मिट्टी के कटोरे को इस प्रकार से बिठा दिया जाता है कि आसानी से मिट्टी का कटोरा न हिलता-डुलता है और न ही आसानी से टोकरी से बाहर निकल पाता है.


कड़ी मेहनत से तैयार की गई ‘कांगड़ी’ को बाद में कारीगर अपने-अपने ढ़ग से सजाते हैं. इसी सजावट से ‘कांगड़ी’ की कीमत तय की जाती है, जो 200 रुपए से लेकर 2000 रुपए तक हो सकती है. विशेष रूप से तैयार करवाई गई रंगीन व सजावटी ‘कांगड़ी’ की कीमत 2000 रुपए से भी ज्यादा होती है.बांडीपुरी कांगड़ी और चिरार कांगड़ी को काफी लोकप्रिय माना जाता हैं. कश्मीरी हस्तशिल्प का ‘कांगड़ी’ एक नायाब उदाहरण है. हस्तनिर्मित बेहद ख़ूबसूरत ‘कांगड़ी’ की ख़ूबसूरती देखते ही बनती है. यही नहीं पर्यावरण के लिहाज़ से भी कांगड़ी बेहद अनुकूल है.देश के गर्म इलाकों से कश्मीर आने वाले पर्यटक भी ‘कांगड़ी’ के आकर्षण से अपने को रोक नहीं पाते और अक्सर अपने ‘ड्राईंग-रूम’ में सजाने मात्र के लिए ही ‘कांगड़ी’ को ख़रीद कर ले जाते हैं.




जम्मू-कश्मीर के लगभग सभी हिस्सो में ‘कांगडी’ लोकप्रिय रही है. कश्मीर घाटी, लद्दाख और जम्मू क्षेत्र के पहाड़ी इलाकों में रहने वाला हर कोई सर्दियों में ‘कांगडी’ का इस्तेमाल करता है. जम्मू-कश्मीर के साथ लगते हिमाचल के कुछ इलाकों में भी स्थानीय लोग ‘कांगड़ी’ का इस्तेमाल करते हैं. यहां तक की जम्मू के मैदानी इलाको में भी सर्दियों में ‘कांगडी’ दिखाई दे जाती हैहस्तनिर्मित कांगड़ी को बनाना अगर एक कला है, तो कांगड़ी को सेंकना और इसका इस्तेमाल करना भी कम महारत का काम नहीं है. सही ढंग से कांगड़ी को सेंकना और धधकते कोयलों को कांगड़ी में डालना अपनेआप में एक कौशल है. ठीक ढंग से सेंकने के साथ-साथ कांगड़ी को ‘गर्म’ करना भी हर किसी के बस की बात नही है. लंबे समय तक कांगड़ी गर्म रहे इसका भी एक ख़ास तरीका है.



‘कांगड़ी’ के मिट्टी के कटोरे में सबसे पहले चुल्हे की गर्म राख डाली जाती है. इस राख के ऊपर चिनार के सूखे पत्तों की एक परत बिछाई जाती है.इन्हीं सूखे पत्तों पर दो-तीन धधकते कोयले डाल दिए जाते हैं. ‘कांगड़ी’ अधिक देर तक गर्म रहे और ठंडी न पड़े इसके लिए धधकते कोयलों के ऊपर चुल्हे की गर्म राख की एक परत बिखेर दी जाती है. चिनार के सूखे पत्ते भीतर ही भीतर सुलगते रहते हैं. इस तरह से तैयार व गर्म की गई कांगड़ी तीन से चार घंटों तक आराम से गर्म रहती है.


गर्म ‘कागड़ी’ को लेकर चलते-फिरते रहना और अपने रोज़मर्रा के काम करते रहना भी अपनेआप में ज़बरदस्त कुशलता का काम है. लंबे अभ्यास से कई लोग ऐसे पारंगत हो जाते हैं कि रात में बड़े आराम से बिस्तर में भी ‘कांगड़ी’ को लेकर सो जाते हैं. हालांकि, बिस्तर में कांगड़ी को लेकर सो पाना सभी के लिए संभव नही है, इसके लिए ‘कांगड़ी’ को सेंकने का पर्याप्त अनुभव चाहिए.


वज़न में हल्की होने और कहीं भी ले जाने की आसानी के कारण भी आम लोगों में ‘कांगड़ी’ बेहद लोकप्रिय है. कश्मीर में आम लोग कांगड़ी को फिरन (एक विशेष कश्मीरी परिधान) में लेकर बड़े आराम व सुविधा के साथ कहीं भी चले जाते हैं. बाज़ार जाते हुए, सफ़र करते हुए, खेतों में काम करते हुए, हर कहीं, कांगड़ी को अपने संग रख कर सेंकते हुए कश्मीर में लोग नज़र आ जाते हैं. कड़कड़ाती ठंड से बचने के लिए ‘कांगड़ी’ के मुकाबले दूसरी कोई ‘मोबाईल’ सुविधा उपलब्ध नहीं है.


‘कांगड़ी’ कश्मीर की ख़ास पहचान रही है. कश्मीर घाटी में ‘कांगड़ी’ के बिना सर्दियां गुज़ारना किसी भी तरह से मुमकिन नहीं है. कश्मीर की भयंकर सर्दी में ‘कांगड़ी’ ही हर किसी का सहारा रही है. सर्दी से बचने के लिए कश्मीर में समाज का हर वर्ग ‘कांगड़ी’ का इस्तेमाल करता आया है. आम आदमी से लेकर संपन्न वर्ग तक में ‘कांगड़ी’ की ज़रूरत बनी हुई है.घाटी के हर घर में ‘कांगड़ी’ का होना लाज़मी है. कई दशकों से ‘कांगड़ी’ घाटी के हर घर का एक अभिन्न हिस्सा रही है.कश्मीर घाटी में हर घर में एक नहीं बल्कि असंख्य ‘कांगड़ियों’ का ढेर रहता है. घर के प्रत्येक सदस्य की अपनी एक ‘कांगड़ी’ होती है. बुजुर्गों के लिए तो ‘कांगड़ी’ किसी वरदान से कम नहीं. यही नहीं मेहमानों के लिए भी बकायदा घाटी के हर घर में ‘कांगड़ी’ रखी जाती है.


सर्दियों में कश्मीर में किसी भी घर में किसी मेहमान के आने पर उसका स्वागत गर्म ‘कांगड़ी’ से ही किया जाता है. मेहमान को चाय-नाश्ता पेश करने से पहले गर्मा-गर्म ‘कांगड़ी’ ही सौंपी जाती है, ताकि वो ठंड़ से फौरन अपना बचाव कर सके.अपनी भाषा, संस्कृति से भावनात्मक रूप से जुड़े कश्मीरी समाज में ‘कांगड़ी’ को लेकर एक भावनात्मक जुड़ाव है और कश्मारी समाज ‘कांगड़ी’ को अपनी संस्कृति का एक अहम हिस्सा मानता है. ‘कांगड़ी’ को लेकर कश्मीरी भाषा में कईं लोकगीत भी प्रचलित हैं. यही नहीं कश्मीर में शादियों में बेटियों की विदाई के समय विशेषरूप से तैयार करवाई गई ख़ूबसूरत रंगीन ‘कांगड़ी’ उपहार में दिए जाने का प्रचलन भी है.


वरिष्ठ पत्रकार ज़फर मेराज का कहना है कि कांगड़ी कश्मीर की संस्कृति और पहचान का एक अभिन्न अंग है. मेराज का कहना है कि कश्मीर में कांगड़ी की मदद से ही सर्दियों में ज़िन्दगी चलती है अगर ‘कांगड़ी’ की सुविधा नहीं होती तो शायद आम इंसान भयंकर सर्दी में सांस भी नही ले पाता.


ज़फर मेराज मानते हैं कि ‘कांगड़ी’ एक तरह से जीवनरक्षक का काम करती है, बर्फबारी व ठंड़ में जब सारे साधन बेकार साबित होने लगते हैं तब ‘कांगड़ी’ ही सहारा देती है.



सर्दी से निपटने के लिए उपलब्ध तमाम तरह की सुविधाओं और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के बावजूद अगर ‘कांगड़ी’ का अस्तित्व आज के आधुनिक युग में भी बचा हुआ है तो उसके पीछे जम्मू-कश्मीर की भौगोलिक परिस्थितियां और बिजली की कमी व कटौती भी प्रमुख कारण रहे हैं.


उल्लेखनीय है कि सर्दियों में हर वर्ष जम्मू-कश्मीर को गंभीर रूप से बिजली संकट का सामना करना पड़ता है. कई घंटों की बिजली कटौती में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण सफ़ेद हाथी ही साबित होते हैं. दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में भयंकर सर्दी और बर्फ़बारी के बीच हर साल बिजली के मूलभूत ढांचे को भी भारी नुक्सान पहुंचता है, जिस कारण कई दिनों तक बिजली बंद रहती है. श्रीनगर जैसे बड़े शहर को भी बर्फबारी के दौरान गंभीर रूप से बिजली कटौती का सामना करना पड़ता है.



इन हालात में भीषण सर्दी से बचने के लिए ‘कांगड़ी’ ही एकमात्र साधन व सहारा होती है. बर्फीले मौसम में जब तापमान शून्य से बेहद निचले स्तर तक चला जाता है, तो लोगों को ज़बरदस्त ठंड़ का मुकाबला करने में मात्र ‘कांगड़ी’ से ही मदद मिलती है.

कांगड़ी को यहां एक ओर कश्मीरी पहचान के रूप में जाना जाता है व सर्दियों में आम लोगों को राहत प्रदान करती है, तो वहीं दूसरी तरफ ‘कांगड़ी’ के अपने कुछ नुकसान भी हैं. ‘कांगड़ी’ का ज़रूरत से अधिक इस्तेमाल करने से चर्म रोग होने का खतरा बना रहता है.

कांगड़ी के अत्याधिक और ठीक ढंग से इस्तेमाल नहीं करने से कई तरह के त्वचा के रोग होने की आशंका बनी रहती हैं. कई बार यह चर्म रोग गंभीर रूप ले लेता है जिसे ‘कांगड़ी केंसर’ के रूप में भी जाना जाता हैं.


श्रीनगर के शेरे कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मैडिकल साईंसिस के आकंड़ों के अनुसार हाल के वर्षों में जागरुकता बढ़ने से ‘कांगड़ी केंसर’ के रोगियों में कमी आई है. मगर एक समय ऐसा भी था जब ‘कांगड़ी केंसर’ की शिकायत काफी अधिक थी. डाक्टरों का कहना है कि अब ‘कांगड़ी’ से होने वाले त्वचा संबंधि रोग के रोगियों की संख्या में काफी गिरावट आई है.यही नहीं लापरवाही से कांगड़ी सेंकने के कारण कई बार शरीर और कपड़ों के जल जाने का जोखिम भी रहता है. कुछ अनुभवहीन लोग बड़े-बजुर्गों को देखकर बिस्तर में ‘कांगड़ी’ ले कर सोने की कोशिश में भी खतरा मोल लेते हैं. बिस्तर में ‘कांगड़ी’ के पलट जाने से जलने का डर रहता है.साभार द प्रिंट फोटो साभार सोशल मीडिया 

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