जनादेश
राम नाम के जयकारों के साथ शुरू हुई विश्व प्रसिद्ध 84 कोसी परिक्रमा

रोहित बाजपेयी 'मनु'

 सीतापुर. राम नाम के जयघोष के साथ फाल्गुन मास की प्रतिपदा (24 फरवरी) को विश्व विख्यात धार्मिक नगरी नैमिष में 84 कोसी परिक्रमा का आगाज हुआ. परिक्रमा समिति के अध्यक्ष एवं पहला आश्रम के महंत भरत दास (डंका वाले बाबा) के यहाँ डंका बजते ही लाखों की तादात में श्रद्धालुओं ने परिक्रमा के लिए कूच किया. परिक्रमा का शुभारम्भ नैमिषारण्य के पौराणिक चक्रकुंड में डुबकी लगाने के बाद कुंड के तट पर स्थित मंदिर में भगवान गणेश को लड्डू का भोग अर्पित करने के साथ हुआ. इस परिक्रमा में उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों के अलावा हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, दिल्ली और कर्नाटक प्रांतों के संत, महंत और पीठाधीश्वरों समेत लाखों की संख्या में गृहस्थ श्रद्धालु शामिल हुए है. 15 दिवसीय इस परिक्रमा का समापन पूर्णिमा (05 मार्च) को मिश्रिख के दधीचि आश्रम पर होगा. इस परिक्रमा में कुल 11 पड़ाव आते है, जिनमें सात सीतापुर तथा चार हरदोई जिले में पड़ते हैं. जिनमे से पहले पड़ाव के रूप में श्रद्धालु कोरौना में विश्राम करेंगे. परिक्रमा के दौरान अधिकांश परिक्रमार्थी 252 किलोमीटर की दूरी पैदल ही तय करेंगे. इसके अलावा कई परिक्रमार्थी वाहनों से तो तमाम संत और महंत, हाथी, घोड़ा व पीनस (पालकी) से भी परिक्रमा में शामिल हुए. श्रद्धालु महिला व् पुरुष परिक्रमा के दौरान भजन कीर्तन करते व् झूमते नाचते चलते दिखाई दिए. पहले पड़ाव पर पहुंचकर श्रद्धालुओं ने अपना भोजन बनाने के साथ ही विश्राम भी किया. परिक्रमा के मद्देनजर प्रशासन ने भी तैयारियां कर रखी है. हालाँकि परिक्रमार्थी प्रशासन के काम से खुश नहीं नजर आये. वहीँ ग्रामीणों द्वारा श्रद्धालुओं के लिए जगह जगह पानी व् खाने के साथ ही आराम करने की भी व्यवस्थाएं की गयी है.

परिक्रमा के दौरान इन तीर्थो के होंगे दर्शन

परिक्रमा के दौरान श्रद्धालुओं को जानकी कुंड, कुमनेश्वर, कुर्कुरी, मानसरोवर, कोटीश्वर, महादेव, कैलाशन, हत्या हरण, नर्मदेश्वर, दस कन्या, जगन्नाथ, गंगासागर, कपिल मुनी, नागालय, नीलगंगा, श्रृंगीऋषि, द्रोणाचार्य पर्वत, चंदन तालाब, मधुवसनक, व्यास गद्दी, मनु सतरूपा तपस्थली, ब्रम्हावर्त, दशाश्वमेघ, हनुमान गढ़ी, यज्ञवाराह कूप, हंस-हंसिनी, देव-देवेश्वर, रुद्रावर्त आदि तीर्थ स्थलों का दर्शन करने का सौभाग्य मिलता है. 

कब और कहां रामादल करेगा विश्राम

24 फरवरी- पहला पड़ाव - कोरौना

25 फरवरी - दूसरा पड़ाव - हर्रैया 

26 फरवरी- तीसरा पड़ाव - नगवा कोथावां 

27 फरवरी- चौथा पड़ाव - गिरधरपुर उमरारी 

28 फरवरी- पांचवां पड़ाव - साकिन गोपालपुर 

29 फरवरी- छठा पड़ाव - देवगवां 

01 मार्च- सातवां पड़ाव - मंडरुआ 

02 मार्च - आठवां पड़ाव - जरिगवां 

03 मार्च - नवां पड़ाव - नैमिषारण्य 

04 मार्च - दसवां पड़ाव - कोल्हुआ बरेठी 

05 मार्च - 11वां पड़ाव - मिश्रिख (यहां पंचकोसी परिक्रमा होगी)

 परिक्रमा के पड़ने वाले पड़ाव का महत्व

कोरौना (कोरावल)

परिक्रमा करने वाले श्रद्धालु सर्वप्रथम प्रतिपदा को प्रातः चक्रतीर्थ में स्नान करते हैं. फिर वहाँ स्थित श्री गणेश जी के मंदिर में दर्शन कर लड्डू का भोग लगाकर परिक्रमा के प्रथम पड़ाव स्थल कोरौना के लिए प्रस्थान करते है. इसे द्वारिका क्षेत्र भी कहा जाता है. यहाँ पर ‘‘द्वारिकाधीश’’ भगवान का एक विशाल मंदिर है. कहते हैं कि इनके दर्शन करने से भगवान द्वारिकाधीश की कृपा प्राप्त होती हैं. परिक्रमार्थी प्रतिपदा की रात्रि यहीं विश्राम करते है.

हर्रैय्या (जगन्नाथ क्षेत्र)

यह दूसरा पड़ाव क्षेत्र है. फाल्गुन मास की द्वितीय को कोरौना पड़ाव से चलकर मार्ग में पड़ने वाले पवित्र स्थल जिनमें कुमनेश्वर, मानसरोवर तीर्थ, कोटीश्वर महादेव आदि का दर्शन कर श्री कैलाश आश्रम पहुँचते है. यहाँ आकर श्री कैलाशनाथ भगवान शंकर के दर्शन कर बाबा खबीश जी के दर्शन करते हैं. इस स्थान पर ब्रह्मलीन श्री स्वामी पूर्णानन्द जी की समाधि है. यह एक योगी महात्मा थे. यहाँ आज भी कई साधक महात्मा निवास करते है. इनके दर्शन के उपरान्त यात्रीगण गोमती घाट जाकर अमर कण्टक में स्नान कर हरैया ग्राम में जाकर रात्रि विश्राम करते हैं. यह स्थान हरदोई जनपद में पड़ता है.

नगवाँ कोथावाँ पड़ाव

फाल्गुन मास की तृतीया की परिक्रमया हरैय्या से चलकर हत्याहरण नाम तीर्थ पहुँचता है. कहते हैं इस तीर्थ में स्नान करने से जाने-अनजाने में मनुष्य से जो पाप हो जाते है वह सभी नष्ट हो जाते हैं. कुछ लोग इसे नागवंशीय राजाओं का स्थान भी मानते हैं. नगवा पद्यनाभ नामक नागराज का स्थान माना जाता है. इसी मार्ग पर विरजा तीर्थ नार्मदेश्वर तीर्थ आदि के भी दर्शन होते हैं. यहाँ पर भादों महीने में प्रतिवर्ष हर रविवार को बड़ा मेला लगता है. यह स्थान भी हरदोई जनपद में पड़ता है.

गिरधरपुर उमरारी

परिक्रमा का चौथा पड़ाव गिरधरपुर उमरारी है. चूँकि उमरारी गाँव गिरधरपुर से सटा हुआ है. इसलिए यह पड़ाव दोनों से संयुक्त नाम से जाना जाता है. तीसरे एवं चौथे पड़ाव के बीच ऋण मोचन तीर्थ एवं सूर्यनारायण मंदिर आदि पवित्र स्थल पड़ते है. श्रद्धालु इनके दर्शन एवं पूजन करते हैं. यह पड़ाव स्थल भी हरदोई जनपद में पड़ता है. 

साक्षी गोपालपुर

फाल्गुन शुक्ल पक्ष को परिक्रमा मण्डल मार्ग में पड़ने वाले सभी देव स्थानों के दर्शन करते हुए गंगा सागर, ब्रदीनाथ, शेषधारा आदि का दर्शन कर साक्षी गोपालपुर में विश्राम करता है. यह स्थान भी हरदोई जनपद में पड़ता है.

देवगवाँ

फाल्गुन शुक्ल पक्ष षष्ठी को परिक्रमार्थी साक्षी गोपालपुर से चलकर देवगवाँ (द्रोणाचार्य) नामक स्थान पर पहुँचते है. इस मार्ग में गंगालय, नीलगंगा श्रंगी ऋषि, द्रोणाचार्य पर्वत आदि दर्शनीय स्थल पड़ते है. यहाँ श्रद्धालु गुड़ कटोरा का दान करते है. परिक्रमा अब पुनः सीतापुर जनपद में आ जाता है.

मड़रूवा पड़ाव

देवगवाँ से मड़रूवा पड़ाव के बीच अनेक दर्शनीय स्थल पड़ते है. जैसे शिवगंगा तीर्थ, प्रमोदव आदि स्थानों को होते हुए वाल्मीकि जी के कूप पर आ जाते है. यहाँ लोटा डोर का दान दिया जाता है. इसे माण्डम मुनि का स्थान भी माना जाता है. यहीं पर चन्द्रचंदनी और चन्द्रावलदेवी का भव्य मंदिर है. यहीं पास में मड़रूवा ग्राम में परिक्रमा रात्रि विश्राम करता है.

जरिगवाँ

फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मड़रूवा से चलकर मार्ग में विश्केवर, गड़ मुक्तेश्वर, हरिहर, हरिद्वार रूप कुण्ड, कुर्यावर्त कल्लेश्वर आदि स्थानों के दर्शन करते हुए महुवा वन में स्थित मधूम (महुवा) के वृक्ष के नीचे रूकता है. यहाँ पर सुहागिन महिलाएँ इसका विधिवत पूजन करती हैं एवं सुहाग पिटारी एवं सुन्दर वस्त्रों का दान करती हैं.

नैमिषारण्य

फाल्गुन शुक्ल पक्ष नवमी को परिक्रमा जरिगवाँ पड़ाव से चलकर पुनः नैमिषारण्य आ जाता है. यहाँ पर आकर श्री ललिता देवी, पंच प्रयाग, श्री क्षेमकाया देवी, गोवर्धन नाथ, जानकी कुण्ड पंचमुखी हनुमान जी, श्री शेषनाथ सूत जी कथा स्थान, राधाकृष्ण, बलदाऊ, अन्नपूर्णा जी, विश्वनाथ्, लीलारकूप, तुलसीदास जी, धर्मराज जी, चित्रगुप्त, यमराज पाराशर जी, वेद व्यास जी, शुकदेव जी, स्वायंभू मनु शतरूपा तपस्थली, चैतन्य महाप्रभू, कश्यप ऋषि, काशी राज ब्रह्मवर्त, अयोध्या, गंगोत्री, सप्तऋषि टीला, दशाश्वमेघ घाट, रामजानकी मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर, पाँचक पाण्डव, हनुमान जी, वाराह कूप द्रोपदी तथा प्राचीन गुफाओं एवं कन्दराओं के दर्शन कर सायं चक्र तीर्थ की भव्य आरती देख यहीं रात्रि विश्राम करते हैं.

कोल्हुवा बरेठी

कोलहवा बरेठी को प्रातः नैमिषारण्य से कोलहवां बरेठी के लिए यात्रीगण प्रस्थान करते है. यहाँ रास्ते में अनेक महत्वपूर्ण तीर्थ पड़ते है. जैसे कुरूक्षेत्र हंसहसिनी, वैद्यनाथ धाम, गोवर्धन, गोकुल, मथुरा, वृन्दावन, देव देवेश्वर, रूद्रावर्त, मकरावर्त, गोपेश्वर केदारनाथ जिसके दर्शन एवं पूजन का लाभ प्राप्त होता है. परिक्रमार्थी चित्रकूट धाम नामक स्थान पर पहुँचकर रात्रि विश्राम करते हैं.

मिश्रित तीर्थ

फाल्गुन शुक्ल पक्ष एकादशी को परिक्रमा चित्रकूट से चलकर मिश्रित तीर्थ में आ जाता है. यहीं पर पूर्णमासी तक निवास करता है. प्रतिदिन परिक्रमार्थी दधीचि कुण्ड में स्नान करके पंचकोसीय परिक्रम करते हैं. इस पंचकोसीय परिक्रमा में आसपास एवं नगर के भी हजारों श्रद्धालु भक्तगण शामिल हो जाते हैं. जिससे इसकी विशालता में और वृद्धि हो जाती है. चतुर्दशी के दिन यहाँ सीता कुण्ड में स्नान का विधान है. चतुर्दशी के दिन यहाँ दधीचि कुण्ड का (मिश्रित तीर्थ का) भव्य पूजन होता है. परिक्रमार्थियों का विशाल जनसमूह इस पूजन के अवसर पर उपस्थित रहता है. यहीं पर आतिशबाजी का प्रदर्शन होता है. श्रद्धालु भक्तगण यहीं पर होली तापते हैं तथा पूर्णिमा का स्नान कर अपने-अपने घरों को प्रस्थान करते है. इसके बाद 15 दिनों तक स्थानीय मेला लगता है. जिसमें विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा देवी जागरण, अखिल भारतीय कवि सम्मेलन आदि का आयोजन होता है. 

आस्था व आनंद का अद्भुत संगम है यह परिक्रमा

चौरासी कोसी परिक्रमा समिति के अध्यक्ष एवं पहला आश्रम के महंत भरत दास (डंका वाले बाबा) का कहना है कि हिंदू धर्म में इस प्रकार की 15 दिनी परिक्रमा का स्कंद पुराण के अलावा अन्य कहीं उल्लेख नहीं है. यह परिक्रमा मानव के समस्त पापों को नष्ट कर चौरासी लाख योनियों से मुक्ति देती है. स्कंद पुराण के अनुसार यह परिक्रमा सबसे पहले भगवान ब्रह्म, विष्णु और महेश ने की थी. स्कंदपुराण के धर्मारण्य खंड में इस बात का वर्णन है कि भगवान श्रीराम ने भी अयोध्यावासियों के साथ यह परिक्रमा की थी. इसी कारण इस परिक्रमा में शामिल श्रद्धालुओं को 'रामादल' कहा जाता है. पौराणिक आख्यानों के अनुसार जो व्यक्ति संपूर्ण परिक्रमा न कर सके वह यदि मिश्रित तीर्थ में पांच दिनों तक पंचकोसी परिक्रमा करेगा तो उसे पुण्य का लाभ मिलेगा. ललिता देवी मंदिर के प्रधान पुजारी एवं कालीपीठ के संस्थापक ने बताया कि एक पौराणिक आख्यान के अनुसार महर्षि दधीचि के अस्थिदान में आए सभी देवों एवं तीर्थगणों ने चक्र गिरे स्थान से चौरासी कोस की परिधि में अपना विश्राम स्थल बनाया था. भगवान श्रीराम के अश्वमेघ यज्ञ के समय यही चौरासी कोसी परिक्रमा अश्वमेघ यज्ञ की सफलता हेतु की गई थी. 

विश्व विख्यात 84 कोसीय परिक्रमा का इतिहास

एक समय यज्ञ कुण्ड से वृत्तासुर नामक दैत्य उत्पन्न हुआ और देवताओं को अनेक प्रकार से पीड़ित करने लगा. तब देवता लोग भगवान श्री विष्णु के पास गए एवं अपना दुःख कह सुनाया. बाद में वे भगवान विष्णु के साथ भगवान शंकर के पास गए तो उन्होनें कहा कि यह नारायण कवचन एवं बाण श्री दधीचि ऋषि के पास हैं जिससे वृत्तासुद दैय का विनाश होगा. तब सभी देवतागण महर्षि दधीचि के पास गए उस समय ऋषिवर तपस्या में लीन थे. सब देवताओं ने मिलकर प्रार्थना की तब ऋषिवर का ध्यान टूटा, उन्होनें देवताओं को देखा तथा आने का कारण पूछा. देवताओं ने अपने आने का प्रयोजन उन्हें कह सुनाया. श्री दधीचि ने कहा कि हमें परोपकार में अपना शरीर देने में कोई आपत्ति नहीं है परन्तु मेरी इच्छा है कि मैं सभी देवताओं के दर्शन एवं सभी तीर्थो की परिक्रमा करूँ. इस पर देवताओं ने महर्षि दधीचि से अनुरोध किया हम लोग सभी तीर्थो का जल यहाँ से आऐंगे तथा सभी देवताओं से यह प्रार्थना करेंगे कि वह यहाँ आकर आपको दर्शन दे दें. समस्त देवाताओं एवं तीर्थो ने देव कार्य के लिए दधीचि ऋषि को दर्शन देना स्वीकार कर लिया और नैमिषारण्य के आस-पास चैरासी कोश मण्डल अवस्थित हो गए. महर्षि दधीचि जी ने जिन-जिन मार्गो से चलकर तीर्थो के दर्शन किए व स्थान किया तथा जहाँ-जहाँ पर वह ठहरे वे ही परिक्रमा मार्ग हो गए तथा महर्षि के ठहरने के स्थल पड़ाव बन गए. 

विशेष आकर्षण का केंद्र रहा सुंदर रथ

विश्व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी नैमिषारण्य से आज सुबह डंका बजते ही 84 कोसीय परिक्रमा की शुरुवात हुई. रामादल को रवाना करने से पहले परिक्रमा में एक रथ को शामिल किया गया. जो कि आकर्षण का केंद्र बन गया. इस रथ को एसडीएम मिश्रिख़ राजीव पांडेय ने पहल करते हुए परिक्रमा में शामिल कराया है. उन्होंने बताया कि अश्वमेघ यज्ञ की तर्ज पर इस रथ को शामिल किया गया है. यह आकर्षक रथ परिक्रमा सम्पन्न होने तक मौजूद रहेगा. इस रथ की सुंदरता देखते ही बनती है. परिक्रमार्थी इस रथ को देखकर काफी उत्साहित हुए. इन रथ पर पहला आश्रम के महंत व परिक्रमा समिति के अध्यक्ष सवार हुए. 

 

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