जनादेश
बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में स्प्रिंग कम्स टू कश्मीर को पुरस्कार

अंजना सिंह
बर्लिन. 
70वां बर्लिनाले दो नए कलात्मक निर्देशक की अध्यक्षता में प्रस्तुत किया गया. इस वर्ष लगभग 400 फिल्मों को दिखाया गया, जिसमें भारत ने  चार प्रस्तुतियों का प्रतिनिधित्व किया.  सन 1956 में फिल्म महोत्सव के शुरुआत में,  भारतीय फिल्म स्प्रिंग कम्स टू कश्मीर  को सिल्वर बियर पुरस्कार से नवाज़ा गया था  और तब से लगातार दो या उससे अधिक भारतीय फिल्मों को बर्लिन फ़िल्मफेस्टिवल में स्थान मिला. 1988 में तो चौदह भारतीय फिल्मों को सम्मिलित किया गया था. निर्णायक मंडल सदस्यों में  भी भारतीयों  को बार-बार बर्लिन में विभिन्न सेक्शन में आमंत्रित किया गया, जैसे कि 1961 में सत्यजीत रे और 2020 में  रीमा दास को. इस वर्ष किसी भारतीय फिल्म को पुरस्कार तो नहीं मिला परन्तु दर्शकों ने चारों फिल्मों को काफी सराहा और काफी उत्साह के साथ निर्माताओं और निर्देशकों के साथ वार्तालाप की.  
 
शाहरुख खान बर्लिनाले पहली बार 2008 में ओम शांति ओम के साथ गए थे, लेकिन 2010 में  माई नेम इज खान के साथ और 2012 में डॉन 2 और उसी के साथ उन्होंने दर्शकों का  दिल जीत लिया है. तब से, भारतीय फ़िल्में  जर्मन मीडिया में भी मौजूद है और भारतीय  फ़िल्में एक व्यापक दर्शक वर्ग के लिए जानी जाती हैं. एक समय था  जब बर्लिन में फिल्म वीर-ज़ारा के प्रीमियर के बाद निर्देशक यश चोपड़ा के साथ आराम से बात करना संभव था और आज जब आलिया भट्ट और रणवीर सिंह जैसे सितारे रेड कार्पेट (गली बॉय, 2019) पर नज़र आए तो एक तरह से उनसे मुलाकात नामुमकिन थी.
भारत की फिल्मों का विषय पिछले कुछ वर्षों में बदल गया हैं . 2020 में, विशेष रूप से राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया गया. प्रतीक वत्स द्वारा निर्देशित व्यंगात्मक भारतीय फिल्म Eeb Allay Ooo  की कहानी एक नए शहर में रहने के लिए संघर्ष करने वालों पर आधारित है जो लाखों प्रवासी श्रमिकों के लिए एक कड़वी सच्चाई है. इसके अलावा वत्स कई सामाजिक समस्याओं पर  दर्शकों  का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं
वहीँ दूसरी तरफ पुष्पेंद्र सिंह, फिल्म लैला और सात गीत के निर्देशक जो खुद अपने परिवार की शक्तिशाली महिलाओं से प्रेरित थे उनकी फिल्म  एक खानाबदोश समाज में महिलाओं की एक आधुनिक और मजबूत छवि के बारे में है. फिल्म की मुख्य किरदार लैला प्रतिरोध के खिलाफ अपनी जिंदगी  को अपने हाथों में लेने की कोशिश करती है. अंत में यहाँ तक कि  वह अपने पुराने जीवन को पीछे छोड़ देती है.
एकता मित्तल की लघु फिल्म गुमनाम दिन में प्रतीक्षा और अनिश्चितता की स्थिति को बखूबी पर्दे  पर उतारा गया है. अक्षय इंडिकर की मराठी फिल्म स्थलपुराण में एक आठ वर्ष के बालक की मनोदशा का चित्रांकन किया गया जिसके पिता लापता हो गए थे. उसका परिवार पिता के लापता होने के बाद पुणे से अपने गाँव वापस चला जाता है. चारो भारतीय फिल्मों में कहीं न कहीं स्थानांतरण की समस्याओं को दिखाया गया है. स्थानांतरण मुद्दा वैसे भी एक वैश्विक समस्या का रूप ले चुका है जो अन्य देशों की फिल्मों में भी देखने को मिला.

बर्लिन में वार्षिक इंडो-जर्मन फिल्म फेस्टिवल के आयोजक स्टीफन ओटनब्रुक, भारत और जर्मनी के बीच सांस्कृतिक सहयोग को आलोचनात्मकपूर्ण देखते हैं भारतीय फिल्मों की भागीदारी पर  उनका कहना है कि “राजनीतिक स्तर पर, भारत और जर्मनी में लोग सहयोग और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में बहुत रुचि रखते हैं परन्तु विभिन्न संस्कृतियों और वित्तीय परिस्थितियों के पारस्परिक ज्ञान की कमी है.एक रणनीति की कमी का मतलब है कि सैद्धांतिक हित व्यावहारिक रूप से अप्रभावी हो जाती  है. " भारतीय फिल्म उद्योग के जानकर यहाँ तक कहते हैं कि भारत के कई युवा फिल्म निर्माता टैलेंट कैंपस में मौजूद होते हैं, लेकिन बर्लिन फेस्टिवल के अन्य सेक्शन में भारत का प्रदर्शन काफी कमजोर है.

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