जनादेश
सन्नाटे की माया!

शंभूनाथ शुक्ल

पहले तो सुबह साढ़े सात पर मॉर्निंग वाक के लिए निकला, एक घंटे बाद लौटा. इसके बाद नहाया और फिर नाश्ता किया. साढ़े दस बजे पुनः निकला और सोसाइटी के गेट के सामने की सड़क पर कुर्सी डलवा कर बैठ गया. लगभग डेढ़ घंटे बैठा रहा. एकदम सन्नाटा था. न सड़क पर कोई न सोसाइटी की बॉलकनी से कोई झांकता दिखा. ऐसा सन्नाटा पसरा था, मानों हम हज़ारों साल पुरानी किसी सभ्यता के खंडहर के बीच खड़े हैं. मैंने वैसा ही महसूस किया, जैसा पिछले साल मैंने गुजरात के कच्छ इलाके में स्थित धौलावीरा अवशेषों पर महसूस किया था.

मेन रोड के सामने 600 मीटर पर महाबीर चौक है, जहाँ जैन तीर्थंकर महाबीर स्वामी की प्रतिमा साफ़ दिख रही थी. इस दूरी के बीच का हर पेड़ अपनी खासियत के साथ प्रत्यक्ष था. मुख्य द्वार के दोनों तरफ नीम के पेड़ हैं. उनकी पीली पड़ चुकी पत्तियाँ झरे जा रही थीं, और मेरे शरीर को ढक रही थीं. सामने पीपल था, उसकी पत्तियाँ ज़रा-सी भी हवा डुलने पर हिलने लगतीं. अकौड़ा के पौधे सोसाइटी की बाउंड्री वाल के साथ बह रही नाली के किनारे उगे हुए थे. सदाबहार के फूल भी. बीच-बीच में भाँग के पौधे हैं, जिन्हें मैंने पहली बार फले-फूले देखा, जबकि मैं यहाँ पिछले 14 वर्ष से मुसलसल रह रहा हूँ. इस नाली के पानी की सतह पर कोई पनिहल साँप अपना सर निकालता फिर डुप्प की आवाज के साथ लापता हो जाता. कुछ झड़बेरी के पौधे दिखे, उन पर बेरियाँ फली थीं. सडाक के साथ एक नेवला सड़क को पार कर गया.


सामने गाय-भैंस का चट्टा है, पर उसमें भैंस एक नहीं दिखी. अलबत्ता जर्सी गायें बैठी पगुरा रही थीं. एक भी देसी गाय नहीं थी. लेकिन चट्टे वाला इन जर्सी गायों को गीर गाय बताता है. गीर गाय का दूध डेढ़ सौ रूपये किलो की दर से बिकता है. गायें बैठी हुई पागुर कर रही थीं. दर्जनों गौरय्याँ उन के सिर व कंधों पर बैठी थीं. वे उनके दांतों को भी साफ़ कर रही थीं. गोबर के ढेर से एक अजीब-सी खुशबू आ रही थी. जैसे बचपन में अपने गाँव के लिपे-पुते घर में आया करती थी. गोबर के ढेर के ऊपर कई जलमुर्गी बैठी थीं. कोई एक मुर्गा दूर कहीं बांग दे रहा था.


मैं जिस सड़क पर कुर्सी डाले बैठा था, वहाँ आम दिनों में गाड़ियों की ऐसी रेलम-पेल होती है, कि यहाँ से गुजरने के पहले बार-बार सोचना पड़ता है. आज इस सड़क पर सुई भी गिरे, तो आवाज़ सुने पड़ेगी. झींगुरों की एकसुर वाली आवाजों का शोर थोडा बेचैन करता था. साथ ही कोयल की कू-कू और टिटीहरी की टी-टी और जलमुर्गी का फड़फड़ाना तथा कठफोड़वा की तीखी आवाज इस सन्नाटे को भंग कर रही थी. लेकिन गौरय्या की चीं-चीं इतनी प्यारी थी, कि मुझे नींद आ गयी. एक तीखी आवाज़ से नींद खुली तो देखा, पुलिस की एक गाड़ी चिग्घाड़ती हुई गुजरी. इसके बाद एक कर्णकटु आवाज़ में मोर आकर सामने के बरगद पर बैठ गया. मोर को देख कर मुझे तुलसी बाबा की रामचरित मानस का एक दोहा याद आ गया-

“तन विचित्र, कायर वचन, अहि अहार, मन घोर!

तुलसी हरि भये पक्षधर, सबै कहत हैं मोर!!”

(अर्थात इस पक्षी का तन टेढ़ा-मेढ़ा है. आवाज़ भी कर्णकटु और एकदम डरपोकों जैसी. ऊपर से साँप को खाता है, मन का दुष्ट है. लेकिन जब से हरि (श्री कृष्ण) ने इसके पंख को सिर पर धरा सभी इसको मोर यानी अपना बोलने लगे)

चूँकि जिला गाज़ियाबाद की इस कॉलोनी वसुंधरा के सेक्टर सात और सेक्टर आठ शुरू में पार्क और बच्चों के खेल के मैदान के लिए छोड़े गए थे, किन्तु 1995 से आज तक किसी भी सरकार और अधिकारी तथा आवास-बंधु ने कोई इच्छा-शक्ति नहीं दिखाई, इसलिए इन पर कहीं चट्टे वाले तो कहीं घुड़साल वाले काबिज़ हैं, और पूरा एक थाना भी इस ज़मीन पर बन गया है. उन सबसे थोड़ी-थोड़ी देर में विचित्र आवाजें इस सन्नाटे को चीर रही थीं. थाने वाली फोर लेन रोड खाली पड़ी थी. सारे काम्प्लेक्स बंद थे. दावा की दूकानें भी और मिठाई व चाट वाले भी लापता थे. बस कहीं-कहीं एकाध सिपाही जरूर दिख जाते, जो मोंस्क लगे अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद थे. मैं लगभग चार किमी तक टहला, पर कहीं कोई नहीं दिखा. लगा मानों मैं किसी बियाबान में घूम रहा हूँ, जहाँ प्रकृति अपनी सम्पूर्ण माया के साथ मौजूद है. 


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