जनादेश

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कलिया या खलिया

अंबरीश कुमार 

साठ सत्तर के दशक तक अपने ताऊजी जो जेलर थे उनके घर एक व्यंजन मंगलवार छोड़कर नियमित बनता था .वह था कलिया जिसे कई जगह खलिया भी कहा जाता है .यह न्यूनतम मसालों औत तेल में बनता था .चूल्हे के दौर था .सुबह नौ बजे जेल के भीतर से कैदी सब्जियों की डलिया आ जाती थी .यह गोंडा जेल की बात है .जेल जंगल से लगा हुआ था .जंगल से पहले फालसा की बड़ी बड़ी झाडियां थी जिन्हें सुबह टहलने जाते तो तोड़ कर पीछे के दरवाजे से आते .कैदी हो या नंबरदार ये लोग पीछे आंगन से लगे दरवाजे से ही आते .आंगन के ठीक मध्य में रसोई होती थी .कसाई यानी बकरा का गोष्ट लाने वाला सुबह करीब सवा नौ बजे आता .वे ही सब लाता जो बाबूजी को पसंद होता .करीब डेढ़ दो किलो .जिसका बटुली में कालिया बनता .कलिया दरअसल सबसे आसान व्यंजन रहा है .मुग़ल दौर में यह युद्ध के समय ,शिकार के समय भी भी खूब प्रचलित हुआ .उस दौर में जब सब जगह हल्दी नहीं होती थी तो इसमें जाफरान डाला जाता था .लहसुन प्याज और लाल मिर्च से ही इसे बना लिया जाता था .सुगंध के लिए जो भी उपलब्ध हो इलायची ,लौंग ,काली मिर्च आदि .पर मसाला कम ही रहता और देर तक पकता .घर पर चूल्हे पर यह हमारी बड़ी अम्मा लहसुन ,प्याज अदरक और नमक डालकर पानी ज्यादा मात्रा में डालकर चूल्हे पर चढ़ा देती थी .यह दोपहर ढाई बजे तक धीमी आंच पर पकता फिर वे तेल गर्म कर उसमें न्यूनतम मसालों के साथ बनाती .इसमें शोरबा ज्यादा होता .हम लोग रोटी के छिलके के साथ इसका स्वाद लेते .बाबूजी खुद अच्छे शिकारी भी थे और अक्सर जल मुर्गाबी ,लालसर समेत कई तरह की चिड़िया भी लाते .वह शिकार का दौर भी था और जंगल भी थे .हिरन ,जंगली सूअर ,जंगली मुर्गा आदि का शिकार करते देखा भी .शिकार के बाद हिरन का भी कलिया बन जाता था .

खैर याक कालिया अब बहुत कम लोग बनाते हैं .जो पुराने शौकीन है .नए लोगों में ऐसा शौक और धैर्य दोनों कम दिखता है .खासबात यह है कि यह व्यंजन बंगाल तक गया .वहां मछली का भी कलिया बनता है .उसमे सरसों का इस्तेमाल नहीं होता .मछली को फ्राई करने के बाद लहसून प्याज के मसाले की ग्रेवी में यह मछली पकाई जाती है सिर्फ कुछ देर .इसे कुछ लोग खलिया भी कहते हैं .यह पुराने व्यंजन है .इसमें जबरन टमाटर आदि डाल कर खराब करने से बचे .जैसे रोगन जोश .दरअसल बकरे के गोश्त का अपना स्वाद होता है जो मछली मुर्गा में नहीं मिलता इसलिए यह न्यूनतम मसालों में भी बन जाता है .खटाई के लिए दही का इस्तेमाल करें और लगन बर्तन में बनायें तो बेहतर होगा .पिछली बार छतीसगढ़ के जंगल में ठहरना हुआ तो आदिवासी रसोइये ने इसी तरीके से बनाया .उसका चूल्हा देखे और जंगल भी .बार नवापारा का जंगल है यह . 

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