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शिवराज की पहली चुनौती कोरोना है

पूजा सिंह

भोपाल. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कुर्सी संभालने के तत्काल बाद कोरोनावायरस से लड़ी जा रही जंग में गरीबों के हित में कुछ कदम जरूर उठाये लेकिन सरकार के कुछ कदम उस पर सवाल खड़े करते हैं. सरकार ने गैस पीड़ितों के लिए बने इकलौते अस्पताल भोपाल मेडिकल हॉस्पिटल ऐंड रिसर्च सेंटर (बीएमएचआरसी) का अधिग्रहण करके उसे कोविड-19 के उपचार का प्रमुख केंद्र बना दिया. सरकार के इस कदम से हजारों की संख्या में गैस पीड़ित प्रभावित हुए जो उपचार के लिए उस अस्पताल पर निर्भर हैं. इनमें कई मरीज डायलिसिस पर थे.

गैस पीड़ितों के अधिकारों के लिए काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ता रचना धींगरा कहती हैं कि बीएमएचआरसी एक बंद परिसर है जहां कई परिवार निवास करते हैं ऐसे में उसे कोविड-19 के उपचार का केंद्र बनाना गलत है. इतना ही नहीं गैस पीड़ितों से उनका इकलौता अस्पताल छीनना अमानवीय हरकत है. गैस पीड़ितों का इलाज कमला नेहरू अस्पताल में किया जायेगा.

माकपा नेता बादल सरोज ने कहा कि राजधानी में बड़े-बड़े पांच सितारा होटल और बंगले पड़े हैं, वहां आसानी से आइसोलेशन वार्ड वाला अस्पताल बन सकता था लेकिन सरकार ने गैस पीड़ितों के अधिकार पर डाका डालना बेहतर समझा.


दूसरी ओर प्रदेश में गत 14 मार्च से आंगनबाड़ी और स्कूल बंद करने के बाद वहां मिलने वाले भोजन की जगह सरकार टेक होम राशन देने का ऐलान कर चुकी है लेकिन भोजन के अधिकार अभियान के एक अध्ययन से पता चला है कि सरकार इसमें नाकाम है.


भोजन के अधिकार अभियान से जुड़े कार्यकर्ता राकेश मालवीय ने बताया कि प्रदेश के करीब 43 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं और 9 प्रतिशत बच्चे गंभीर कुपोषण के शिकार हैं. इतना ही नहीं 56 प्रतिशत महिलायें रक्ताल्पता की शिकार हैं. इन सभी के कोविड से संक्रमित होने का खतरा औरों से कई गुना ज्यादा है.


उन्होंने बताया कि प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में अध्ययन से पता चला है कि टेक होम राशन नियमित नहीं है. वह कभी मिलता है तो कभी नहीं मिलता है. परिवहन व्यवस्था सुचारू नहीं होने से भी इसमें दिक्कत आ रही है तो कई जगह इसका स्टॉक खत्म हो चुका है.भोजन के अधिकार अभियान के सचिन कुमार जैन ने कहा है कि संक्रमण से लड़ने के लिए खादय सुरक्षा को मजबूत करना भी सबसे बड़ी जरूरत है, इसमें स्थानीय लोगों, स्वसहायता समूहों को शामिल नहीं किया गया है.  जबकि इस वक्त वह भी अपनी सामाजिक भूमिका निभा सकते हैं.

उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश में 97,135 आंगनबाड़ी और मिनी आंगनबाड़ी हैं. प्रदेश में 6 माह से तीन वर्ष के बच्चों की संख्या 34 लाख से अधिक और 3 से छह वर्ष के बच्चों की संख्या 38 लाख से अधिक है. जबकि प्रदेश में करीब साढ़े सात लाख गर्भवती महिलायें हैं.

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