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पूर्वोत्तर में आदिवासियों के सामने भुखमरी का संकट !

गुवाहाटी. संथाली आदिवासी 20-30 किलोमीटर चलकर बोंगाईगांव पहुंचते हैं और स्थानीय निवासियों के लिए जंगलों की सफाई करते हैं और इसी काम के माध्यम से वह पैसा कमाते हैं. लेकिन अचानक देशव्यापी लॉकडाउन होने के बाद उनके पास अब कोई कमाई नहीं बची है. कुछ दिनों पहले असम के गोलपारा जिले में भोजन की कमी के कारण एक गरीब हाशिए पर खड़े मजदूर गोपाल बर्मन ने आत्महत्या कर ली थी. संथालियों (असम के स्थानीय लोग) के भोजन के लिए समृद्ध जंगल थे लेकिन आज कोरोना संकट की वजह से उनके भोजन पर भी संकट आ गया है. 

सिटिजन फॉर जस्टिस एंड पीस के स्वयंसेवकों ने सामुदायिक संसाधनों के जरिए राहत वितरण कार्य करते हुए इन विकट परिस्थितियों के बारे में अधिकारियों को सचेत किया है.लॉकडाउन के कारण किसानों को उपज की देखभाल करने की अनुमति नहीं होने के कारण टमाटर की फसलें सूख रही हैं. चिरांग जिले के बिजनी सब डिविजन के एक किसान रतन मजूमदार कहते हैं कि लॉकडाउन के कारण व्यवस्थित तरीके से वे फसलें (जो वह अपनी जमीन पर खेती कर रहे हैं) नष्ट हो रही हैं. इसके कारण खासतौर पर मानवीय और वित्तीय नुकसान होगा. सब्जी-फलों का नुकसान ऐसे समय में आपराध है जब लोग भोजन के लिए भूखे हैं.


मजूमदार ने यह भी कहा कि छत्तींगुरी, मनेश्वरी समेत इस जिले के कई गांवों में बड़ी मात्रा में टमाटर पैदा किए जाते हैं. हालाँकि इन सभी गाँवों में पानी की आपूर्ति अचानक बंद हो जाने के कारण टमाटर सड़ गए हैं. मटियापारा, बागोरगाँव, कोट्टुपुली, कौवाटिका, दतुरी, बाघमारा आदि गाँवों के किसान भी असहाय हैं, अपनी आँखों के सामने अपनी फसल सूखने और खेतों में पानी न जाने के कारण  वे उदास हो जाते हैं.ऐसे समय में जब उन्हें मुड़कर देखने वाला कोई नहीं है, सीजेपी स्वयंसेवक लोअर असम के विभिन्न गांवों में विशेष रूप से चिरांग, बोंगईगांव, कोकराझार, बारपेटा और अन्य जिलों में सक्रिय हैं.


चिरांग से सीजेपी के स्वयंसेवक प्रणय तारफदेर खारम्पारा नाम के एक गांव में गए. किसी भी किसान को  उनसके बात करने या घरों से बाहर आने की अनुमति नहीं थी. जबकि खेतों में उनकी फसल सूख रही थीं.इसी तरह, कोकराझार जिले के कई गाँवों में खेतों में उगने वाली सब्जियों को उगते हुए देखा जा सकता है. कोकराझार जिले के गोसाईगाँव पुलिस थाने के अंतर्गत आने वाले हावरीपेट गाँव के एक छोटे से किसान,अब्दुल हमीद ने सीजेपी को बताया, 'मैंने इस साल 1 बीघा जमीन पर ककड़ी की खेती की लेकिन जैसे ही इसे बेचने का सही समय आया तब तक लॉकडाउन की अचानक से घोषणा क दी गई. अगर हम सब्जियां नहीं बेच सकते तो हम क्या खाएंगे? क्या सरकार हमारी मदद करेगी?

बारपेटा जिले के कई अन्य गांवों के बाजारों में खुली आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chains) नहीं होने के कारण उनके सभी पके और उगाए गए कृषि उत्पादों की इसी तरह बर्बादी देखी जा सकती है. पिछले बीस दिनों से  बड़ी मात्रा में सब्जियों की बिक्री एकतरफा बंद है. कटझर गांव बड़े आकार की ककड़ी का उत्पादन करता है. गांव के गोकुल गोष कहते हैं कि अगरर राज्य का कृषि विभाग खरीद और बिक्री की व्यवस्था नहीं करता है तो मुझे भी नुकसान होगा. इसी तरह की स्थिति का सामना जिले के लगभग सभी किसानों को करना पड़ रहा है. असम के धुबरी इलाके में (विशेषकर चार इलाके में) बड़ी संख्या में मकई की फसलें काटी जाती हैं. देशव्यापी लॉकडाउन के कारण उत्पन्न हुई स्थिति के कारण ये किसान मकई की कीमतों में अचानक भारी गिरावट का सामना क रहे हैं. उनके भरण पोषण के लिए इसका क्या अर्थ होगा. ?


चिरांग जिले में बिष्णुपुर को प्रसिद्ध नींबू की खेती के लिए जाना जाता है. यह वह क्षेत्र है जहां से खास असमिया नींबू पूरे राज्य, अन्य उत्तर पूर्वी राज्यों और यहां तक कि बंगाल के पूर्वी हिस्से में सप्लाई किया जाता है. इस क्षेत्र के कई किसान सैकड़ों बीघे नींबू की खेती करते हैं. असम का मुख्य शहर गुवाहाटी भी बिष्णुपुर पर निर्भर है क्योंकि यह 90% नींबू की माँग को पूरा करता है.नींबू की कटा शुरु हुई ही थी कि कम्युनिकेशन बंद होने से आपूर्ति श्रृंखला टूट गई. अब इनको कम कीमत पर बेचा जा रहा है. लॉकडाउन होने से पहले प्रति बैग की कीमत1200 रुपये थी यह घटक 800 रुपये प्रति बैग हो गई है जिसका मतलब है कि प्रति बैग 400 रुपये का नुकसान हो रहा है.


ऐसा ही स्थिति गारगाँव, ऑक्सिगुड़ी, भोगरगुरी, बटाबरी, बल्लामगुरी, कावाटिका, भेटगाँव आदि गाँवों में भी  है, जो टमाटर और मिर्च की खेती के लिए प्रसिद्ध हैं. किसान अब्दुल अजीज ने सीजेपी टीम को बताया कि उन्होंने तीन बीघा जमीन पर हरी मिर्च की खेती की है, लॉकडाउन से पहले इस उपज को चालीस रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बेचा. लेकिन अब जब मिर्च खाने के लिए तैयार है तो इसे बेचने का कोई रास्ता नहीं बचा है. आपूर्ति श्रृंखला टूट गई है.


बोंगईगांव जिले में एई नदी के चरागाहों में बड़ी मात्रा में तरबूज उगाया जाता है. स्थानीय लोगों के पास बिक्री के नए तरीके हैं. तरबूज विक्रेताओं के लिए  नेशनल हाइवे नंब 31 पर लॉन रोड पर दोनों तरफ एक किलोमीटर तक की जगह एक अस्थायी बाजार बन गई है. लॉकडाउन के कारण बिक्री और आपू्र्ति को नुकसान हुआ है जिससे किसान तैयार फसल के साथ अधर में फंस गए हैं. बलुगोपा क्षेत्र में तरबूज उत्पादकों के लिए एक ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हुई है.


बोंगईगांव जिले के एक अन्य कीर्तनपारा इलाके में लोग दो प्रकार के व्यवसाय कर अपनी आजीविका कमाते हैं. पहला कृषि है और दूसरा ताजा गाय के दूध से पनीर और दही का उत्पादन है, जिसे बाद में विभिन्न शहरों में बेचा जाता है. लॉकडाउन के बाद किसानों की फसल नष्ट हो रही है और दही और पनीर का संचय इन उत्पादकों के लिए एक बेकार और हताश करने वाली स्थिति पैदा कर रहा है.चिरांग जिले के कई दूध व्यापारी आज भी काफी तनाव में हैं. विशेष रूप से मिठाई की दुकानों में दूध बेचने वालों के लिए स्थिति और कठिन है क्योंकि लॉकडाउन के कारण दुकानें बंद हैं. संकट के इस समय में दूध बेचने के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई है. इससे उनमें मायूसी और बढ़ गई है.

सीजेपी की टीम नागरिकता से जुड़े पैरा कानूनी और सामुदायिक हस्तक्षेप के लिए 2017 से प्रतिबद्ध है. सीजेपी की टीम कई जिलों में फैली हुई हैं. सीजेपी की टीम अब सबसे अधिक वंचित औ जरूरतमंदों को भोजन और राशन राहत प्रदान करने में पूरी तरह से शामिल हो गई है. टीम के काम में कोविड-19 वायरस और पब्लिक डिस्टेंसिग के प्रति लोगों में  जागरुकता पैदा करना,  लॉकडाउन औ प्रशासनिक नियमों का पालन करना शामिल है. विभिन्न इलाकों में हमारे स्वयंसेवक राहत सामग्री एकत्रित और वितरित कर रहे हैं.परिणाम दर्दनाक और चिंताजनक रहे हैं. असम में सबसे गरीब लोग भूख से जूझ रहे हैं, कोरोना से जूझने के बजाय भोजन की तलाश कर रहे हैं. भोजन का सेवन कम करके दिनभर में केवल एक बार कर दिया गया है. असम राज्य अराजकता की स्थिति में है और आने वाले दिनों में स्थिति और भी बदतर हो सकती है.सबरंग इंडिया फोटो साभार 


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