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ऋषि से इरफ़ान तक सिनेमा की सिंफनी

त्रिभुवन

इरफ़ान गए तो मानो भारतीय सिनेमा में एक्टिंग की पेंटिंग का वॉन गॉग चला गया. पूरे सोशल मीडिया में इतने छाए कि इस तरह शायद ही किसी कलाकार को याद किया गया हो. उनके अभिनय में साहित्य और जीवन के दस से अधिक रसों को जीवंत भी किया और जिया भी.आज ऋषि कपूर चले गए. 'बॉबी' जैसी सिंफनी के सम्मोहक नायक. राज कपूर और ख़्वाजा अहमद अब्बास जैसे अनुभवी लोगों की एक अनुपम कृति. 'मेरा नाम जोकर' जैसे एक अनूठी फ़िल्म के फ्लॉप हो जाने के बाद राजकपूर को 'बॉबी' बनानी पड़ी, क्योंकि उन्हें भारतीय सिने दर्शकों की कोमल भावनाओं से भीगी मानसिकता की अच्छी पहचान थी. और 'बॉबी' के साथ ही पूरे सिनेमा की धारा बदल गई.

यह न तो तुलना का समय है और न ही किसी को कमतर आंकने का, लेकिन शायद ऋषि कपूर राजकपूर के बेटे न होते तो उनके लिए मुश्किलें रहतीं. और इरफ़ान किसी राजकपूर का बेटा नहीं था, लेकिन फिर भी वह भारतीय फिल्म निर्माण में जुटे लोगों के बीहड़ में सबको चौंधियाता हुआ एक सितारे की तरह दमक उठा और भारतीय सिनेमा प्रेमियों के हृदय में उतर गया. वह लोगों की नस-नस में बस गया. ऋषि कपूर ने अपनी कोमल और तरल आंखों तथा कपूर खानदान के प्रभामंडल के साथ आख़िरी समय में एक परिपक्व कलाकार की छवि गढ़ी. 'मुल्क़', 'दिल्ली छह', 'कपूर एंड संस' या फिर '102 नॉट आउट' जैसे फ़िल्में देखकर सहसा कल्पना नहीं होती कि यह 'बॉबी' का वही राज है.


सिनेमा के कलाकार हों, बेहतरीन कविताएं रचने वाले या फिर पेंटर्स या बेहतरीन पढ़ने-सुनने-देखने-परखने-बेहतरीन सोचने-समझने और शानदार स्वप्न देखने वाले लोग, ये सब इस धरती के महकते फूलों जैसे होते हैं. लेकिन एक क्षणभंगुर गुलाब का अपना शाश्वत सम्मोहन होता है. यह सम्मोहन अपनी-अपनी डिग्री और फ्रीक्वेंसी के साथ दोनों में था. कोमल-तरल आंखों वाले ऋषि ने अपनी तरह का आकर्षण रचा और वे लोगों के दिलों में छाए रहे. आज भी कितने ही लड़के-लड़कियां हैं, जिन्हें 'बॉबी' के प्रेमाकुल राज नाथ और मुहब्बत से भीगी बॉबी ब्रैगैंजा की कहानी असहज कर सकती है. बॉबी 1973 में आई थी और उस दौर में जो लड़के-लड़कियां 15 से 17 साल के थे, वे आज 62 से 65 साल के हैं और उनके दिलो-दिमाग़ में वे दिन तसवीरें बनकर अपनी इरोटिक इमेजेज क्रिएट कर रहे होंगे. कितने तरुण और तरुणियां दसवीं-ग्यारहवीं से लेकर ग्रेजुएशन तक में पढ़ते हुए घरों को बाय-बाय कर प्रेम झरने में नहाए थे.


मेरे लिए ऋषि से कहीं अधिक आकर्षण इरफ़ान का था. उनका अभिनय अभिनय नहीं था. वह ध्वनित होता था. और लगता था कि जैसे मेरे सामने मोजार्ट का संगीत गूंज रहा है. तो कभी-कभी इरफ़ान का अभिनय वॉन गॉग की पेंटिंग जैसा लगता. लेकिन ऋषि की सच्ची कोमलता को कैसे भूल जाऊं! जैसे इरफान का अभियन मुखर रहता था, वह ऋषि के अभिनय में एक चुप्पी रहती थी. एक मुखर चुप्पी. ऋषि और इरफ़ान मुझे प्रतिभा के दो अलग-अलग कोण लगते हैं. दोनों की अपनी-अपनी छवियां और अपनी-अपनी क्षमताएं. ऋषि की आंखों में मौजूद कोमलता और तरलता उसे प्रेम का अभिनेता स्थापित करती है, जो 'बॉबी' में एक उद्दाम दैहिक प्रेम रचकर अपनी प्रेयसी को झरने में कूदकर कर भी प्राप्त करता है और 'मुल्क़' तक आते-आते यह प्रेम दो समुदायों के विराट मानवीय प्रेम का सृजन करता है. युवतर अवस्था के बेकाबू इरोटिसिज्म को भी अगर हम सही-सही फ्लेम के रूप में जीवित रख पाएं या बचा पाएं तो शायद प्रेम के इसी गाढ़े रसायन से ही टूटते-बिखरते और विषाक्त होते समाज को थोड़ा अमिय दे पाएं.

आंखों की बात थी तो इरफान की आंखों को आप कैसे इग्नोर कर सकते हैं. आप 'पानसिंह तोमर' देखें या या मक़़बूल, ये आंखें जीवन के जलते अनुभवों को पेंटिंग की तरह सामने रखती हैं. कभी विद्रोही कवि धूमिल ने कहा था : न कोई प्रजा है, न कोई तंत्र है. यह आदमी के खिलाफ़द आदमी का खुला सा षड़यन्त्र है . इन विद्रोहियों ने संसद को सूअरबाड़े तक की संज्ञा दी. लेकिन 'पानसिंह तोमर' में तिग्मांशु धूलिया ने जो संवाद रचा, वह भारतीय लोकतंत्र के प्रहसन में राजनीतिज्ञों के रूप में विन्यस्त विदूषकों को भीतर तक बेध गया. भारतीय लोकतंत्र के प्रहसन को निरावरण करता यह संवाद था : “आप डकैत कैसे बने?” “अरे तू पूरो पत्रकार बन गओ है कि ट्रेनिंग पे है? जे इलाके का होक भी पतो नहीं है? बीहड़ में बाग़ी होते हैं. डकैत होते हैं पाल्लयामेंट में!” इसे जिस तरह इरफ़ान ने बोला और इस फिल्म के पात्र पानसिंह तोमर को जैसा जिया, वह हमारे लोकतंत्र के दिखावे को चौंधियाते हुए यथार्थ के साथ आपके सामने रख देता है. यही सिनेमा और उसके प्रस्तुतिकरण की ताक़त की अनुपम रेंज है.

इरफ़ान यूनीक स्टार क्वालिटी के अभिनेता थे. उनकी विभिन्न फिल्मों में वर्सटाइल पर्फाेंमेंस उनकी प्रतिभा को स्मरणीय और मेमोरेबल बना देती है. अभिनय में उनकी बेचैनी, अधीरता और यथार्थपरकता देखते ही बनती है. उनकी प्रेम संबंधी भूमिकाएं हों या निम्नमध्यवर्गीय किसी पात्र को जीने का प्रश्न, वे एक अजीब सा आकर्षण पैदा करते हैं और दिलोदिमाग़ में छा जाते हैं. ऋषि जहां तीव्र उल्लास को जीवंत करते हैं, वहीं इरफ़ान जीवन की विषमताओं और पीड़ाओं को पूरी आस्था और ईमानदारी से प्रस्तुत करते हैं. उनके अभिनय की एक प्रेरक विराट्ता जीवन जीने की ललक बनाती है. उनकी आंखों की तरह उनकी आवाज़ का भी अपना वैभव था. 'जंगल बुक' के हिन्दी वर्शन में खानेपीने के लालची और शहद के शौक़ीन किरदार 'बालू' के लिए उन्होंने जिस अंदाज़ में संवाद बोले, वह रह-रहकर कानों में गूंजता है. यह उनकी प्रतिभा की विविधता का भी सबूत भी है और सौष्ठव भी.'बॉबी' के राज और 'पानसिंह तोमर' के पानसिंह को मेरा नमन. ये दोनों दो अलग-अलग चट्टानों से तराशे गए अभिनेता थे. एक प्रेमाग्नि से अंकुरित और दूसरा शासन के लिजलिजे हाथों में सड़ती व्यवस्था की जलविहीन ज़मीन में अपने पसीने से उगता लोकतंत्र का कल्पतरु!साभार 

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