भूखे प्यासे सड़क पर पैदल चलते मजदूर

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भूखे प्यासे सड़क पर पैदल चलते मजदूर

अंबरीश कुमार 

हम मई के ठीक मध्य में खड़े है .मौसम बेहद गर्म है और कुछ जगहों पर गर्म हवा चलने लगी है .सड़क का डामर पिघलने लगा है .और इसी गर्म तपती हुई सड़क पर बच्चे ,बूढ़े और जवान सभी चल रहे हैं .कई राज्यों से कई राज्यों तक ये लोग चलते जा रहे हैं .कुछ ने सब कुछ बेचकर साइकिल खरीद ली तो उसीसे चल रहे हैं .कुछ रिक्शे से ही चल रहे हैं हजार डेढ़ हजार किलोमीटर तक ये जाएंगे .कई ट्रक टेम्पो और आटो से भी चल रहे हैं .पर जिनके पास कुछ भी नहीं बचा वे तो पैदल ही चल रहे है .कुछ चल नहीं पा रहे तो वे घसीट कर ले जाए जा रहे है .इनकी संख्या का कोई मोटा अनुमान तो नहीं है पर सरकार के हिसाब से ये आठ करोड़ से भी ज्यादा हैं .यह देश का अब तक का सबसे बड़ा पलायन है .देश के विभाजन के बाद ऐसी दर्दनाक तस्वीर पहली बार दिख रही हैं .ये मजदूर हैं .उनका परिवार भी है  .इनकी बेबसी ,तकलीफ और मजबूरी सुनकर आप रो भी सकते हैं और चाहे तो दरकिनार भी कर सकते हैं .देश बंद है और एक पूरी कौम सड़क नाप रही है .कोई मदद को सामने आए तो आए भी कैसे .और जो पुलिस नामकी संस्था हमने बनाई है वह तो सिर्फ लाठी से ही बात करती है .अपवाद छोड़ दे .फिलहाल वह हर जगह राज्य की सीमा पर मजदूरों को घुसने से रोक रही है .पता नहीं वे इन्हें किस देश का समझ रही है .जगह जगह मजदूरों से पैसा वसूल रही है तो पीट भी रही है .राजस्थान और यूपी सीमा पर तो आपस में ही दोनों राज्यों की पुलिस टकरा गई . देश के इस सबसे बड़े पलायन की कई दर्दनाक कहानियां सामने आ चुकी हैं .हजारों की संख्या में फोटो भी आ चुकी है पर संवेदना ही खत्म होती जा रही है .ऐसी ही कुछ बानगी देखनी चाहिए ताकि हम इनके बारे में ठीक से जान तो लें .   

बेटा नहीं रहा तो झूला लेकर लौटता नन्हे 

 परसों रात धार रोड़ पर कलारिया गांव नाले किनारे ईंट भट्टे में काम करने वाले आदिवासी युवक नन्हें जू का इकलौता बेटा शुभम चल बसा.ुउसे परसों से तेज बुखार था, लेकिन कोई क्लिनिक चालू नहीं था. जिला अस्पताल भी सुबह खुलता है, तो नन्हें जू की पत्नी सरोज बाई मेडिकल स्टोर से क्रोसिन सीरप ले आई और बच्चे को पिला दिया. सुबह चार बजे बच्चे को तीन चार हिचकी आई और उसकी सांसे थम गईं. पड़ोसी की बुजुर्ग महिला को झोपड़ी में बुलाया गया, तो उसने कह दिया कि रोने धोने से कोई फायदा नहीं. यह चला गया. दोनों सुबह तक रोते रहे. फिर तय किया अपने घर लौट चलें. इनका गांव ग्वालियर से 80 किलोमीटर दूर है. गांव का नाम घाटा है. कल दोपहर बारह बजे दोनों खाली झौला ढरकाते हुए एबी रोड चौधरी का ढाबा से गुजर रहे थे. तभी एक स्कॉर्पियों आई और उसमें बैठी महिला ने चाय नाश्ता पानी कराया. दोनों को ताकत मिल गई. सरोज बाई की आंखों से आंसू बह रहे थे. नन्हें जू ने बताया कि अब कभी इंदौर नहीं आएंगे. पैदल गांव जाने का साहस कैसे जुटाया, तो उन्होेंने कहा -और कोई रास्ता नहीं है. जब बच्चा नहीं रहा, तो खाली झूला क्यों डगराते ले जा रहे हो? जवाब था -सरोज का कहना है शुभम का शरीर हमारे साथ नहीं है. महसूस करो कि वो झूले में सो रहा है. बस इसी के सहारे गांव पहुंच जाएंगे.गौरी दुबे ने जैसा लिखा .

तीन पीढ़ी और एक साइकिल 

 ओड़ीसा के रेमुना स्थित एक फैक्ट्री में काम करने वाला दीपक कुंवर  मध्यप्रदेश के सीधी जिले के ग्राम बलियार का रहने वाला है.मुल्कबंदी ने रोज़गार छीन लिया, जब तक रोटी खरीदने के पैसे थे तब तक उम्मीद ज़िंदा थी. अब जेब खाली है, रास्ते में मिलने वाली मदद पेट और परिवार का सहारा है। दीपक अपने 80 साल के अधेड़ पिता, पत्नी और बच्चों को लेकर अर्से बाद साइकिल से गांव लौट रहा है. दीपक अपने बुजुर्ग 80 वर्षीय पिता रामलाल कुंवर  के अलावा तीन साल की बिटिया मानसी के साथ सफ़र पर है. ओड़ीसा के रेमुना से सीधी (एमपी )की दूरी करीब 841 किलोमीटर है.

बैल के साथ आदमी 

एक तरफ बैल तो दूसरी तरफ आदमी .यह भी होना था. इंसान को बैल के साथ नधना था, अपने घर गांव  वापसी के लिए.यह इंदौर से लौटते हुए हुआ .बैल की जगह खुद को जोत दिया 

मध्य प्रदेश में महू के मनोज को यह करना पड़ा .वह इंदौर में बैलगाड़ी से सामान ढोता था .पर अचानक हुए लॉकडाउन के चलते उसे भी घर लौटना ही था .दिक्कत यह आ गई कि जब कुछ नहीं बचा तो उसने पंद्रह हजार का बैल पांच हजार में बेच दिया .अब समस्या हुई कि एक बैल से कैसे वह गांव लौटे . इस वजह से उसने दूसरे बैल की जगह खुद को ही जोत लिया. उसने गाड़ी पर सामान और परिवार को बैठाया और भारी कदमों से घर लौट पड़ा. इस दौरान उसकी भाभी ने भी गाड़ी को खींचा.उसकी यह तस्वीर सोशल मीडिया पर काफी चर्चित हुई .पर इस तरह की तस्वीर हमारे लोकतंत्र पर धब्बा भी है .आदमी जानवर की जगह ले रहा हैं .

रिक्शे से कलकत्ता तक 

तो दूसरी कहानी गोविंद मंडल की हैं. बंगाल के रहने वाले. दिल्ली में मैकेनिक का काम करते थे. लॉकडाउन के पहले इनके मालिक ने इन्हें 16 हज़ार रुपए दिए और काम पर आने से मना कर दिया. डेढ़ महीने तक किसी तरह इसी पैसे से परिवार के भरण-पोषण में लगे रहे. अंत में उनके पास मात्र पांच हजार बचे.फिर उनके सामने भूख से मरने की नौबत आ गई. तब उन्होंने अपने घर वापसी के लिए सोचा. लेकिन लौटने का कोई साधन नहीं मिला. दिल्ली से बंगाल की दूरी लगभग 1500 किलोमीटर होने के कारण एक बार वे सोचने पर मजबूर हो गए.लेकिन अपने बच्चे एवं पत्नी के लिए उन्होंने दिल्ली में ही एक व्यक्ति से 5000 में एक सेकंड हैंड रिक्शा खरीदा. रिक्शा बेचने वाले से काफी मिन्नत की तो उसने 200 कम किया और उसी 200 के साथ घर का सारा सामान लेकर रिक्शा में अपने पत्नी एवं बच्चे को लेकर गोविंद दिल्ली से बंगाल के लिए चल पड़े.

उन्होंने बताया कि घर से निकलते ही दिक्कतें शुरू हो गई. सामान लेकर थोड़ी दूर पहुंचा तो रिक्शा पंक्चर हो गया. दुकानदार ने इसके लिए उनसे 140 रुपए वसूले. अब गोविंद के पास सिर्फ 60 रुपए बचे. लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी और आगे निकलता रहा. यूपी पुलिस ने इस पर दया करते हुए एक छोटा गैस सिलेंडर इन्हें भर कर दिया. रास्ते में जहां भी गरीबों के लिये खाना मिलता है ये लोग खाते हैं और रास्ते के लिए भी पैक कर लेते हैं.गोविंद मंडल 1350 किलोमीटर तक रिक्शा चला चुके हैं. अभी लगभग 300 किलोमीटर और है. गोविंद कसम खाते हैं गांव में घर पर रहकर जैसे तैसे गुज़ारा कर लूंगा, पर शहर कभी नहीं आऊंगा.

दहलीज पर पहुंचना भी नसीब में नहीं था 

मुंबई से चार दिन पहले अपने गांव हैंसर के लिए चले 68 साल के राम कृपाल के दुर्भाग्य को क्या कहेंगे .जो घर की दहलीज के पास आने से पहले ही चल बसे .घर पहुंचने के महज़ तीस किलोमीटर पहले ही मौत हो गई. वह मुंबई से ट्रक से चले थे. उनकी हालत लखनऊ-गोरखपुर हाईवे के पास आकर खराब हुई. वह जैसे ही ट्रक से खलीलाबाद बाईपास पर उतरे लेकिन चंद कदम ही चले होंगे कि वह लड़खड़ा के गिर उन्हें जिला अस्पताल संत कबीर नगर ले गए जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. रामकृपाल की तबियत लखनऊ-गोरखपुर हाईवे के पास आकर खराब हुई. वो ट्रक से खलीलाबाद बाई पास पर उतारे जाने के बाद संत कबीर नगर की जेल में कोविड-19 की हो रही स्क्रीनिंग के लिए जा रहे थे.

ये कुछ कहानियां है .ऐसी सैकड़ों कहानियां है इस पलायन की .सड़क के किनारे ही तीन ईंट जोड़ कर कुछ चूल्हा जला लेते हैं तो ज्यादातर के पास तो न आता है न चावल .उन्हें भात नमक भी मयस्सर नहीं .छोटे बच्चे को एक दो बिस्कुट देकर बहलाते हैं .पर यह सब दिखता किसे है .मीडिया तो सोहर गाने में लगा हुआ है इस त्रासदी के समय भी .

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