जनादेश

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जेपी ,काफी और छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का वह दौर !

रामदत्त त्रिपाठी 

मेरे जीवन में चौदह जून का विशेष स्थान है . सन 1974 में आज ही के दिन मैंने पहली बार कॉफी बनाना सीखा था , जेपी से . जेपी मायने लोक नायक जयप्रकाश नारायण, जिन्हें हम लोग जेपी कहकर संबोधित करते थे. कहॉं मैं इक्कीस साल का अनुभवहीन युवक और कहॉं लोक नायक . सन 1942 की अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के हीरो . राम धारी सिंह दिनकर की कविता के नायक . महात्मा गॉंधी के करीबी , मार्क्स और लेनिन के अध्येता . बुढापे और बीमारी के बावजूद सम्पूर्ण क्रांति यानि व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की लड़ाई के महानायक. 

बिहार के आरा से जबलपुर मध्य प्रदेश सर्वोदय समाज की शीर्ष बैठक में  जा रहे थे . सर्वोदय  समाज के अगुआ संत आचार्य विनोबा भावे दूरदर्शी थे , उनका अपना सोच था . वह सर्वोदय समाज के लोगों को राजनीतिक बवंडर से दूर रखना चाहते थे . सत्ता से टकराव नहीं चाहते थे. उनकी करीबी निर्मला देश पांडेय भी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा जी के प्रति नरम थीं,  टकराव नहीं चाहती थीं . जेपी मुख्यतः: सर्वोदय वालों पर भरोसा करते थे. वह मानते थे कि अपना मतलब निकालने पर  एक दिन विपक्षी दल,  जो आज साथ हैं , वह किनारे हो जाएँगे. पर सर्वोदय में बहुत से लोग आंदोलन साथ देने में दुविधा में थे .

जेपी कॉफी दिनों से मान रहे थे कि देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार, महंगाई, कुशिक्षा और बेरोज़गारी के चलते परिस्थितियॉं (शॉंतिपूर्ण अहिंसक)  क्रॉंति के अनुकूल हैं और सर्वोदय समाज के लोगों को ऐसे में युवकों के स्वत: स्फूर्त आंदोलन में सक्रिय भागीदारी कर दिशा देनी चाहिए. इसी भावना से वह गुजरात के नव निर्माण ऑंदोलन में गये थे और बिहार के छात्र युवा आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया था. उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों का दौरा करके आंदोलन को राष्ट्रीय बनाने का प्रयास किया था, जिसमें उनके पुराने समाजवादी साथी  और कुछ कांग्रेस के लोग भी जुड़ गए थे.  आरा से जबलपुर जाते हुए जेपी को इलाहाबाद में दूसरी ट्रेन पकड़ने के लिए कुछ घंटे रुकना था. जेपी एक जमाने में रेलवे यूनियन के बड़े नेता रह चुके थे . रेलवे के रिटायरिंग रूम उनकी पहली पसंद थी .जेपी रिटायरिंग रूम में आये . फ़्रेश होने के बाद हम लोगों ने पूछा क्या लेंगे चाय या कॉफी.दरअसल जेपी बहुत सिस्टेमैटिक थे.बीमारी के कारण तमाम परहेज़ भी था. जैसे  केवल उबला गरम पानी पीना.  कार्यक्रम के साथ खाने पीने की साइक्लोस्टाइल लिस्ट आती थी . इसके हिसाब से हम लोग दार्जिलिंग चाय , कॉफी पाउडर, बिस्किट , टी पॉट वग़ैरह ले आये थे .इस संक्षिप्त कार्यक्रम को गोपनीय रखा गया था ताकि वह आराम कर लें . 

जेपी के साथ हम लोगों के टीम लीडर संतोष भारतीय थे . इलाहाबाद से हम लोगों के गुरू जी डा बनवारी लाल शर्मा सब व्यवस्था देख रहे थे . जेपी उन्हें प्रोफ़ेसर साहब कहते थे . जेपी ने कहा कॉफी पीने का मन है . पूछा कॉफी बना लेते हो . मैंने कहा जेपी पाउडर तो है पर कभी बनायी नहीं . उन्होंने कहा कोई बात नहीं मैं सिखा दूंगा  , गर्म दूध है ? मैं जल्दी- जल्दी सीढ़ी से उतरकर कैंटीन गया . कैंटीन वाले से अनुनय विनय कर थर्मस  में गर्म दूध लिया .जेपी ने कहा चलो तुम्हें सिखाते हैं . कप में कॉफी डाली , ऊपर से दूध डालकर , चम्मच से हिलाया और मुस्कुराते हुए कहा देखो कॉफी तैयार . 

उनके पास कुछ उलाहना था , जिसकी सफ़ाई भी लेनी थी .कुछ ही दिनों पहले मेरठ में सर्वोदय समाज का सम्मेलन हुआ था . वहाँ भी यही बहस हो रही थी कि सर्वोदय के लोगों को सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन में हिस्सा लेना चाहिए या नहीं . सबसे बड़ी वजह थी कि जो संयुक्त संघर्ष समिति बनी थी उसमें सब विपक्षी दल शामिल थे . सर्वोदय समाज के भी प्रतिनिधि थे और संयोजक महावीर भाई थे, जिनकी मध्य प्रदेश में डकैतों के समर्पण में बड़ी भूमिका थी . 

सम्मेलन में मैंने बुजुर्ग सर्वोदय नेताओं को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि आप लोग महाभारत युद्ध भूमि में अर्जुन की तरह मोह ग्रस्त हो गये हो . संतोष भारतीय ने भी खरी- खरी सुनाई थी . संयोग से एक अच्छी बात यह हुई थे कि हम लोग एक दूसरे के भाषण नहीं सुन पाये थे . हॉल से बाहर चले गये थे किसी वजह से . सीनियर लोगों ने जेपी को इसी का उलाहना दिया था कि आपकी छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के लड़के इस तरह अनाप- शनाप बोलते हैं . जेपी एक अनुशासित छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के नायक थे. वह सर्वोदय के बुजुर्ग नेताओं की मर्यादा का भी ख़्याल रखते थे. 

जेपी ने मुझसे अकेले में पूछा मेरठ में संतोष ने क्या कह दिया था कि लोगों को बुरा लगा . मुझे मालूम तो था कि संतोष ने क्या कहा था , क्योंकि उस पर चख चख हुई थी . लेकिन मैंने संतोष के पीठ पीछे कुछ कहना उचित नहीं समझा . बात को ज़्यादा महत्व न देते हुए , मैंने बस इतना कहा कि जेपी बाई चॉंस जब संतोष बोल रहे थे मैं बाहर था.जेपी ने मुस्कुराकर बात वहीं समाप्त कर दी . पर मर्यादा पालन का परोक्ष संदेश तो मुझे मिल ही गया . संतोष ने बताया था कि जेपी ने उनसे यह पूछा था कि राम दत्त ने क्या कहा ? और संतोष का भी जवाब यही था कि मैंने सुना नहीं .

जेपी ने उत्तर प्रदेश के लिए छात्र युवा संघर्ष वाहिनी की जो संयोजन समिति बनायी थी , उसके संयोजक संतोष थे और मैं सदस्य . इस प्रसंग को लिखने का मतलब सिर्फ़ यह कि इतने बड़े नेता होने के बावजूद जेपी कितने सरल और सहज थे . उनके साथ बात करने या व्यवहार में उम्र का फ़ासला आड़े नहीं आता था.  उनकी बात अंतर्मन को छूती थी , चूँकि उसके पीछे कोई निजी स्वार्थ न होकर लोक मंगल और लोक कल्याण की भावना रहती थी . जेपी में संगठन और समन्वय की अद्भुत क्षमता थी . 

यही कारण था कि उनकी अपील पर मेरे जैसे हज़ारों लोग यूनिवर्सिटी की पढ़ाई छोड़कर पूरी तरह आंदोलन में कूद गये थे और बड़े सहज भाव से इमरजेंसी में जेल भी काटी . याद दिला दें कि दो दिन पहले इलाहाबाद  हाईकोर्ट ने रायबरेली से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की लोक सभा सदस्यता रद्द कर दी थी और गुजरात विधान सभा चुनाव में जनता मोर्चा ने  कांग्रेस को हरा दिया था. ऐसे में विपक्ष का मनोबल ऊँचा था, वह इंदिरा गांधी को सत्ता से हटाने के लिए जेपी के नेतृत्व में निर्णायक लड़ाई छेड़ना चाहता था, लेकिन जेपी की दिलचस्पी बिहार के सम्पूर्ण आंदोलन को गाँव - गाँव ले जाकर व्यवस्था परिवर्तन में थी.

 चुनावी राजनीति और सत्ता में उनकी दिलचस्पी नहीं थी, वरना नेहरू जी ने उन्हें उप प्रधान मंत्री पद का न्योता दिया था और बाद में वही नेहरू के उत्तराधिकारी बनते. इमर्जेंसी के बाद जनता पार्टी को सत्ता में पदारूढ करने के बाद उन्होंने मुंबई में फिर से सम्पूर्ण क्रांति के लिए संघर्ष वाहिनी को जीवित करने की कोशिश की थी. मगर शरीर ने साथ नहीं  दिया. जनता पार्टी की अंतर्कलह से भी उनका मन दुखी रहता था. जो जेपी परिवर्तन के नायक थे, जनता पार्टी नेताओं को गांधी समाधि पर ले जाकर शपथ दिलायी, कुर्सी की बागडोर सौंपी. वही बाद में कहने लगे थे, जेपी कौन? सही बात है सत्ता का यही चरित्र होता है. उसमें किसी का दोष नहीं. 

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Replied by devendrayadav270@gmail.com at 2020-06-14 09:29:50

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