हरफनमौला पत्रकार की तलाश

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हरफनमौला पत्रकार की तलाश

त्रिलोक दीप 

इस साल संडे मेल ' के दो साथी बिछुड़ गये. पहले उदय सिन्हा और अब सुदीप. उदय सिन्हा 'संडे मेल' के कलकत्ता (अब कोलकाता) संस्करण के प्रभारी थे और सुदीप मुंबई में विशेष संवाददाता. सुदीप मुंबई में रहकर पूरे महाराष्ट्र की राजनीतिक, सांस्कृतिक, समाजिक, आर्थिक गतिविधियों पर नज़र रखते थे. 'संडे मेल' 'के मुख्य ब्रॉडशीट साप्ताहिक पत्र के साथ एक रंगीन पत्रिका भी दी जाती थी जिस में कला, संस्कृति पर विशेष सामग्री हुआ करती थी. इस पत्रिका के1लिए भी सुदीप जी लिखा करते थे. उनकी लेखनी को पाठक बहुत पसंद करते थे. कुछ पाठक तो धर्मयुग, सारिका, रविवार वाले सुदीप को तलाशा करते थे.  सुदीप जी का'संडे मेल' से जुड़ने को मैं पत्र की उपलब्धि मानता हूं.

जब दिसंबर, 1989 को 'संडे मेल' साप्ताहिक शुरू हुआ था तो उस समय पत्रकारिता की दुनिया में यह 'क्रांतिकारी' कदम बताया गया. एक ब्रॉडशीट साप्ताहिक पत्रिका में 48 पृष्ठों की एक रंगीन पत्रिका का समाहित होना. बड़ी बड़ी अखबारों से लोग संडे मेल से जुड़ने के चाहवान थे. दिल्ली के अलावा प्रमुख राज्यों की राजधानियों में संवाददाताओं की नियुक्तियां हुईं. तब मुंबई में अशोक ओझा को नियुक्त किया गया था. उनके जाने के बाद किसी हरफनमौला पत्रकार की तलाश शुरू हुई. एक दिन प्रधान संपादक कन्हैयालाल नंदन ने मुझे कहा कि मुंबई के लिए सुदीप से उपयुक्त और कोई नहीं हो सकता. मैंने उनसे कई बार कहा, मेरी बात तो मानी नहीं,  तुम ही उन्हें पत्र लिखो शायद तुम्हारी बात मान जाये. सुदीप को मैं धर्मयुग और सारिका की बदौलत जानता था औऱ वह भी शायद मुझे दिनमान की वजह से.तब तक रूबरू मुलाकात नहीं हुई थी.मैंने बड़े अधिकार से उन्हें पत्र लिखा कि 'संडे मेल ' आप  जैसे हरफनमौला पत्रकार की तलाश में था. सुना है आपने नंदन जी का आग्रह स्वीकार नहीं किया है, आशा है मुझे निराश नहीं करेंगे. मेरा पत्र मिलते ही उनका फोन आया और पंजाबी में बोले, 'भा जी मैं कल दिल्ली पहुंच रहा हूं '. वह मुझे ' भा जी ' ही कह कर संबोधित करते थे. हमारे एक और सहयोगी रमेश बतरा भी मुझे'भा जी'  कहा करते थे. सुदीप जब ऑफिस पहुंचे, आंखों ही आंखों में नंदन जी से न जाने क्या बात हुई होगी उस तरफ ध्यान न दे हम लोग पंजाबी शैली में गले मिले. मेरी केबिन में बैठे कर ही उनकी नियुक्ति और उनके रुतबे और योग्यता के अनुसार वेतन निश्चित करने की प्रक्रिया कर अपने महाप्रबंधक से रस्मी मुलाकात करा उसी समय उन्हें नियुक्ति पत्र सौंपते हुए  कहा कि 'संडे मेल ' परिवार में आपका स्वागत है. सभी साथियों से उनका परिचय कराया गया.काफी लोग उनसे व्यक्तिगत तौर पर तो कुछ उनके काम से परिचित थे. सुदीप की नियुक्ति से सभी लोग खुश हुए थे. उन दिनो' 'संडे मेल' का ऑफिस कस्तूरबा गांधी रोड स्थित मर्केंटाइल हाउस में था जहां हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं के संस्करण निकला करते थे.


शाम को हम लोग दोनों प्रेस क्लब में बैठे. एक दूसरे के मिज़ाज़ को जाना. उन्होंने बताय कि नंदन जी की तरफ से कोई आफर नहीं आया था. मैंने अनजान बनते हुए कहा कि आप लोग मुंबई वाले क्या करते हैं, क्या सोचते हैं, क्या कहते हैं, यह आप जाने लेकिन यह हकीकत है कि ' संडे मेल' में आपको लाने का सुझाव उन्हीं का था. आप दोनों एक दूसरे को बेहतर जानते थे, शायद धर्मयुग में साथ साथ काम भी किया था. हम लोग पहली बार विधिवत मिल रहे थे, संकोच भाव तो था ही. उन्हें ' संडे मेल' की नीतियों के बारे में बताते हुए कहा, आप निश्चिंत होकर मर्यादा में रहकर सब कुछ लिख सकते हैं. राजनीतिक संवाद लिखते हुए इस बात का ज़रूर ध्यान रखना होगा कि वह एकपक्षीय न लगे, उस संवाद से जुड़े सभी व्यक्तियों का पक्ष समाहित करना होगा. मैंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि 'संडे मेल ' में हिंदी और अंग्रेज़ी में कोई भेदभाव नहीं है, न वेतनमान में और न ही किसी से मेलजोल में. आप के बैठने की व्यवस्था मुंबई में अंग्रेज़ी 'संडे मेल' की टीम के साथ की गयी है जहां आपका अलग स्थान है. इस बात की व्यवस्था भी की जायेगी कि मुंबई से आने वाली सामग्री आपके माध्यम से हमारे पास आये. सुदीप को यह भी साफ कर दिया कि मेहरबानी करके सुनी सुनाई बातों पर भरोसा न करें किसी बात, मुद्दे, विषय पर कोई शंका हो तो सीधे मुझसे या नंदन जी से संपर्क करें. मुझे लगा कि हमारी बातचीत में खासी साफ़गोई थी और उन्हें भी मैंने संतुष्ट पाया.

मुंबई पहुंच कर उन्होंने अपना काम संभाल लिया. उनके संवाद समय पर मिलने लगे. साथियों में उन्हें खूब सराहा गया. करीब करीब हर माह मेरा मुंबई और इसी प्रकार कोलकाता में आना जाना लगा रहता था मुंबई में जुहू के सन्तूर होटल में रुकता था. सुदीप जी या वहीं आ जाते या मैं ऑफिस में उनसे मिलने चला जाया करता था. अंग्रेज़ी' संडे मेल' वालों से भी मेरा अच्छा राब्ता था और सुदीप जी का भी. कभी कभी दोनों संस्करणों के साथी मेरे साथ होटल में बैठ जाया करते था. मेरा मुंबई और कोलकाता में भी यही प्रयास रहता था कि हिंदी और अंग्रेज़ी के साथियों में परस्पर सद्भावना बनी रहे. इस तरह के मेलजोल को सुदीप और उदय सिन्हा दोनों ने सराहा था. सुदीप का परिचय मैंने सन्तूर होटल के तत्कालीन महाप्रबंधक अनिल भंडारी भी कराया. वह बहुत पढ़े लिखे और अनुभवी व्यक्त हैं. सुदीप को उनसे होटल उद्योग के अलावा आर्थिक क्षेत्र की भी खबरें मिला करती थीं. अनिल भंडारी बाद में ITDC के सीएमडी बने. उनसे तब भी मेरा संपर्क रहा , रिटायर हो जाने के बाद आज तक बना हुआ है. रिश्ते को जीना और निभाना जिस तरह अनिल भंडारी जानते हैं सुदीप में भी ऐसे गुण मैंने पाये थे.  


मुंबई में सुदीप जम चुके थे. दिल्ली में विभांशु दिव्याल, सूर्यकांत तिवारी, उदय प्रकाश, संजय चौहान आदि जैसे साथियों के अलग हो जाने से उनकी अनुपस्थिति काफी खली थी. सुदीप से कुछ समय के लिए दिल्ली आने का आग्रह किया गया. वह आकर अपने काम में रम गये. पहले उनके रहने का प्रबंध अशोक यात्री निवास (वर्तमान रमाडा होटल) में किया जो 'संडे मेल' के ऑफिस से ज़्यादा दूर नहीं था. कोशिश तो मेरी यही रहती थी कि घर से आते वक़्त उन्हें अपने साथ ही लेता आऊं, कभी कभी ऐसा न हो पाने पर वह अपनी व्यवस्था स्वयं कर लिया करते थे. बाद में लाजपत नगर शिफ्ट हो गये. एक दिन हम दोनों अमेरिकन सेन्टर चले गये. अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव के वक़्त पर वे लोग मुझे अलग से इसलिए याद करते हैं कि मैं उनके निमंत्रण पर अमेरिका हो आया हूं. सुदीप को भी मैंने साथ ले लिया. चुनाव के कवरेज तथा पत्रकारों और विशिष्ट लोगों की सुविधा के लिए इंतज़ाम किए गए थे. हमारी राय पूछीगयी तो  मैंने सुदीप को आगे कर दिया उसके परिचय के साथ. वह लोग खुश हो गये. दोनों उम्मीदवारों के 'कट आउट' भी वहां मौजूद थे. हम दोनों ने बिल क्लिंटन के साथ फोटो खिंचवाई. न जाने हम दोनों के मन क्यों क्लिंटन की जीत यकीनी लग रही थी. यह बात अक्टूबर-नवंबर, 1992 की है. मेरा संपर्क तो अमेरिकी सूचना केंद्र से तब से है जब वह बहावलपुर हाउस में हुआ करता था औऱ यहां से 'अमेरिकन रिपोर्टर' और 'स्पैन' नियमित तौर पर निकला करते थे. सुदीप तब तक ऑफिस में बैठे रहते थे जब तक उनका काम खत्म नहीं हो जाता था. जब मैं उनसे प्रेस क्लब चलने का इसरार करता तो कहते, 'आज नहीं भा जी.' 


अपने काम के प्रति समर्पित ऐसा व्यक्ति मैंने पहले कभी नहीं देखा था. दिल्ली में अपने सभी सहयोगियों के साथ उनके मैत्रीपूर्ण संबंध थे. कई लोग उनसे सलाहमश्विरा भी लिया करते. मेरे साथ तो अब बहुत करीबी हो गयी थी. मुंबई में मैं उनके घर भी गया था. जब 'संडे मेल' का प्रकाशन स्थगित हो गया तब भी हमारे संबंधों में किसी प्रकार की दूरी नहीं आयी थी. अब मैं समाजसेवी उद्यमी संजय डालमिया के दफ्तर और उनके एनजीओ 'डालमिया सेवा ट्रस्ट' से जुड़ गया था.  5 नवंबर, 1998 को भारत सरकार की ओर से गुरू नानक देव के 530वें जन्मदिन पर मेरे अतिरिक्त ' संडे मेल ' के मेरे दो सहयोगियों मुंबई से सुदीप और  अमृतसर से शम्मी को भी आमंत्रित किया गया था. उद्घाटन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था. उनके ओजस्वी भाषण ने सभी को अभिभूत किया. इस भाषण के बाद चाय-काफी का इंतज़ाम था औऱ उसके बाद परिचर्चा होनी थी जिसमें सुदीप और शम्मी सरीन को भी भाग लेना था  इतने में मेरे घर से फोन आया कि मेरी माताजी नहीं रहीं. मैं उन दोनों को यह सूचना दे कर निकलने ही लगा था कि दोनों ने मेरी बांह पकड़कर कहा कि हम भी आपके साथ चलेंगे. वह दोनों मेरे साथ तब तक रहे जब तक मेरी माताजी की अंत्येष्टि नहीं हो गयी. इतने प्रगाढ़ हो गये थे हम लोगों के संबंध. शम्मी सरीन के साथ भी वैसे ही घनिष्ठ संबंध हैं. जून में ही उनकी पत्नी सरोज का निधन हो गया लेकिन कोरोना के चलते मैं वहां भी नहीं पहुंच पाया.

मेरी नई ज़िम्मेदारियों के चलते मेरा मुंबई जाना होता रहता था और वहां सुदीप से मिलना निश्चित होता था. उन्होंने मुझे लोकल ट्रेन की भी सवारी करायी, रेगुलर ट्रेन से एक बार हम लोग पुणे गये कांशी राम से मिलने के लिये. एक मर्तबा हम लोग साथ साथ वापी गये, सिलवासा में उनकी महेश शर्मा से मुलाकात करानी थी. वह अपने दैनिक समाचारपत्र को बेहतर बनाना चाहते थे, सुदीप जी से उनकी मुलाकात करा दी, लौटते हुए हम लोग दमन से निकले  और मुंबई पहुंच गये. मुंबई प्रेस क्लब में भी उनके साथ कई बार जाना हुआ था. अब हमारा संबंध शुद्ध मित्रता का था. मैं उन्हें गाहेबगाहे फोन करके कहता, अपना लिखना जारी रखो. जवाब मिलता रोज़ एक पेज लिख रहा हूँ. 29 मार्च को उनका जन्मदिन पड़ता था. मुझे मालूम है वह बड़ी बेसब्री से मेरे फोन का इंतज़ार किया करता था. इस बार भी फ़ोन किया. बात करते करते वह  हांफने लगा.फोन उसकी पत्नी विजय ने उसके हाथ से ले लिया औऱ बताया आजकल तबियत बहुत खराब है, फेफडों में कैंसर है जिसका पता बहुत देर से लगा. हर दो दिन बाद अस्पताल ले जाना पड़ता है. यह तो अच्छा है बेटा कार्तिक अचानक एक दिन अमेरिका से आ गया.मुझे पता है कि अपने बेटे को इस लायक बनाने के लिए सुदीप किस तरह दिल्ली से रात की बस पकड़ सवा दो सौ किलोमीटर का सफर तय कर  बिट्स पिलानी पहुंचा करते थे. काफी दिनों बाद मुझे भी बिट्स पिलानी जाकर रहने का अवसर मिला. वह अपने आप में एक टाउनशिप है. बहुत बड़ा इलाका है, अपने बाजार हैं, खाने पीने की हर सुविधा है. दिल्ली की तर्ज़ पर वहां एक कनॉट प्लेस भी है. सुबह सैर करने के लिए बहुत बेहतरीन पार्क हैं और खुली सड़कें भी हैं. होस्टल में ही मेहमानों के लिए कमरे भी हैं. खाना वही मिलता है जो होस्टल के बच्चों के लिए बनता है. कार्तिक के अपने पिता की तीमारदारी की खबर सुनकर सुदीप का अपने बेटे के लिए किया त्याग मेरी आंखों के सामने तिरेर गया. मेरी  बात करने के कुछ दिनों के बाद हमारे एक अन्य सहयोगी पंकज प्रसून ने सुदीप जी से बात कर पत्रकारिता के बारे में किसी परियोजना पर चर्चा की थी. उसके बाद फिर मेरी सुदीप से जब बात हुई तो उसने कहा था कि' भा जी, अच्छा किया आपने उसे मेरा नंबर देकर. थोड़ा स्वस्थ होने पर मैं भी पंकज प्रसून से बात करूंगा. '

बेशक़ अपनी बीमारी को लेकर कभी कभी वह निराश हो जाया करता था लेकिन मैं सदा उसे ढांढस बंधाता रहता था. हमारे एक और सहयोगी कमल नयन पंकज ' संडे मेल' के बाद प्रकाशक बन गए हैं. उनसे सुदीप जी के  नियमित  लेखन के बारे में जब बात की तो उससे उत्साहित होकर कई माह पहले उन्होंने सुदीप जी वह पुस्तक छापने की अनुमति मांगी थी. उन्हें कमोपेश सुदीप की सहमति मिल गयी थी. अब विजय जी और कार्तिक पर निर्भर करता है कि सुदीप के अप्रकाशित लेखन के प्रकाशन के बारे में वे क्या निर्णय लेते हैं. अभी तो कोरोना के कारण सभी कुछ ठप पड़ा है. बेशक़ सुदीप एक बेहतरीन इंसान थे, बहुत प्यारे दोस्त और छोटे भाई जैसी इज़्ज़त देने वाले मेरे अज़ीज़.  अपने इस छोटे भाईनुमा अज़ीज़ दोस्त को प्यार भरा आशीर्वाद.वह जहां भी हों भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें. उनकी सुनहरी यादों को सादर नमन!”

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