जब तक जिए शान से जिये चन्द्रशेखर

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जब तक जिए शान से जिये चन्द्रशेखर

कैप्टन अब्बास अली 

चन्द्रशेखर  से मेरी  पहली मुलाक़ात 1959-60 में लखनऊ में  हुई थी. उस समय वह प्रजा सोशलिस्ट  पार्टी उत्तर प्रदेश  के राज्य मंत्री थे और मैं  डाक्टर  लोहिया के नेतृत्व वाली  सोशलिस्ट  पार्टी की राज्य कार्यकारिणी  का सदस्य था.हम दोनों के साझा मित्र थे उग्रसेन  जो उस समय देवरिया  से सोशलिस्ट  पार्टी  के  विधायक थे और मेरे अभिन्न  मित्र थे.बाद मैं वह १९७७ मैं देवरिया  से लोक सभा के सदस्य भी बने.  उग्रसेन को  काफी हॉउस  में  बैठने  और दोस्तों के साथ गप करने में  बहुत मज़ा आता था इस लिए  चन्द्रशेखर जी  से हज़रतगंज  स्थित  काफी हॉउस  में अक्सर  मुलाक़ात हुआ करती थी हालांकि हम लोग 1948 से लेकर 1955 तक ( सोशलिस्ट पार्टी - प्रजा सोशलिस्ट  पार्टी) एक  ही दल के सदस्य थे  और बाद में  अलग अलग राजनीतिक  दलों के सदस्य  बने  लेकिन  निजी बातचीत में   राजनीतिक मतभेद कभी आड़े नहीं आते थे और हम दोस्ताना बातचीत किया करते थे. 1960 में, मैंने सोशलिस्ट  पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर विधान परिषद का चुनाव लड़ा  और  सिर्फ  चौथाई वोट  (0.29)  से चुनाव हार गया तो  उग्रसेन  के साथ साथ चन्द्रशेखर जी को भी मेरी हार हार का काफी मलाल हुआ. 1964 के आते-आते प्रजा सोशलिस्ट  पार्टी का एक गुट  अशोक मेहता के नेतृत्व   में कांगेस  पार्टी में शामिल होने कि तैयारी करने लगा.  चन्द्रशेखर जी  1962  में उत्तरप्रदेश से राज्यसभा के सदस्य  चुने जा चुके थे  और संसद में पंडित  जवाहर लाल  नेहरु  और उनकी कांग्रेस  पार्टी का काफी मुखर रूप से  विरोध करते थे लेकिन जब अशोक मेहता, गेंदा सिंह  और नारायण दत्त तिवारी  वगैरह ने कांगेस में शामिल होने का फैसला किया तो चन्द्रशेखर जी भी उससे अलग नहीं रह सके  और 1964 में  नेहरु जी की म्रत्यु  के बाद  कांग्रेस पार्टी में शामिल  होगये. हालाँकि  उत्तरप्रदेश   में उनके कई ख़ास  दोस्त जैसे  बेनी प्रसाद माधव, राजवंत सिंह  और रियासत हुसैन वगैरा प्रजा सोशलिस्ट  पार्टी में ही बने रहे. 1964  के बाद से  चन्द्रशेखर  जी  से मुलाक़ात का सिलसिला  टूट गया  और उनसे दोबारा मुलाक़ात  1977  में जनता पार्टी का गठन हो जाने के बाद करीब 13 साल बाद हुई. 1977  में जनता पार्टी की सरकार बनने  के बाद जब 1 मई 1977 को बाकायदा जनता पार्टी का गठन किया गया तो चन्द्रशेखर जी  पार्टी के पहले अध्यक्ष  चुने गए और छह  माह बाद मुझे उत्तरप्रदेश  जनता पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया. यहीं से चन्द्रशेखर जी  का नाम "अध्यक्ष जी" पड़ा और अंतिम समय तक वह इसी नाम से जाने जाते रहे.प्रधानमंत्री बनने के बाद तक. 1977 में जनता पार्टी में रहते हुए उनसे जो सम्बन्ध बना वह उनके निधन तक कायम रहा. उनके साथ जनता पार्टी में काम करते हुए ऐसी अनेकों सुखद स्म्रतियां   हैं जो अक्सर उनकी याद दिलाती हैं. वह न केवल राजनीतिक  रूप से ईमानदार और शानदार व्यक्ति थे बल्कि  निजी रिश्तों को बहुत महत्व देते थे  और अपने साथियों के हर सुख दुःख में शरीक होते थे. मुझे याद पड़ता है कि मार्च-अप्रैल 1978 में उत्तर प्रदेश  से राज्यसभा और विधान परिषद के द्विवार्षिक चुनाव होने वाले थे. जनता पार्टी के 9 सदस्य राज्य सभा में  और उतने ही सदस्य विधान परिषद के लिए निर्वाचित  होने वाले थे और जनता पार्टी के केन्द्रीय संसदीय बोर्ड को उम्मीदवारों के नामों का चयन करना था. उस समय जनता  पार्टी में   घटकवाद ज़ोरों पर था और पार्टी उम्मीदवारों का चयन  उसी आधार पर होता था.संसदीय बोर्ड  की बैठक में राज्यसभा के लिए मेरी उम्मीदवारी पर भी  चर्चा हुई  और उत्तर प्रदेश के  पुर्व मुख्यमंत्री एंव  जनता पार्टी के कोषाध्यक्ष चन्द्र भानु गुप्त ने मेरी उम्मीदवारी का प्रस्ताव किया लेकिन सोशलिस्ट पार्टी से  सुरेन्द्र मोहन जी का नाम पहले ही आ चुका था इसलिए  स्व. चरण  सिंह   अपने  कोटे की  कोई सीट मुझे देने के लिए तैयार नहीं हुए  तो स्व. मधुलिमए ने मेरा नाम विधान परिषद के लिए  प्रस्तावित किया  लेकिन यहाँ  भी घटकवाद  के चलते मेरा नाम प्रस्तावित उम्मीदवारों की सूची में नही आ पा रहा था.  उस समय चन्द्रशेखर जी ने अपने 'वीटो' का इस्तेमाल  करते हुए मुझे  विधान परिषद का उम्मीदवार  बनवाया  और अपने  उम्मीदवार  का नाम कटवाकर मेरा नाम सूची में शामिल कराया और संसदीय बोर्ड की बैठक में यह तर्क  दिया कि "कप्तान साहब उत्तर प्रदेश  पार्टी के अध्यक्ष  हैं और हम जानते हैं कि कैसे पार्टी चलाई जाती है. अगर उन्हें विधान परिषद में नहीं भेजा गया तो लखनऊ में उनके रहने  और पार्टी के काम से आने जाने का क्या इंतेज़ाम होगा?"

मैं चन्द्रशेखर जी के इस क़दम से बड़ा मुतअस्सिर हुआ. दूसरी घटना नवम्बर 1978 की है. मेरी दो बेटियों की शादी थी. मैंने   चन्द्रशेखर जी से इस शादी में शिरकत करने और  बुलंद शहर स्थित अपने   गाँव  कलंदर गढ़ी आने का न्योता दिया  जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया और मेरी बेटियों की शादी में शिरकत की. जून  1983 में चन्द्रशेखर जी  कन्याकुमारी से दिल्ली की ऐतिहासिक  पद यात्रा कर रहे थे  उसी समय मेरी पत्नी का  अचानक   देहांत  होगया. चन्द्रशेखर जी को जब यह खबर मिली तो अपनी तमाम  व्यस्ततIओं  के बीच उन्होंने पदयात्रा के दौरान  मुझे अपने हाथ से एक बहुत ही मार्मिक पत्र लिखा और सांत्वना  दी. उनकी पदयात्रा के समर्थन में, मैंने भी अपने कुछ साथियों साथ जून महीने में   बुलंदशहर से  दिल्ली की पदयात्रा की और जब दिल्ली पहुँचने पर उनसे  मुलाक़ात हुई तो मुझे  देखकर द्रवित हो उठे और गले लगे. अक्तूबर  1991 में मेरे बेटे की शादी के मौके पर वह दिल्ली से चलकर  अलीगढ पहुंचे और   शादी में शरीक हुए. हालांकि उस समय  वह प्रधानमंत्री रह चुके थे लेकिन यह उनका मानवीय  और आत्मीय पक्ष था कि वह दोस्तों के दोस्त थे  और हर हाल में रिश्ते निभाना बखूबी जानते थे.


अब कुछ  बात चन्द्रशेखर  के राजनीतिक  पक्ष की. चन्द्रशेखर बहुत ही बेबाक  और बहादुर  व्यक्ति थे और  अपने विचार  राजनीतिक  नफे नुकसान  कि प्रवाह  किये बिना व्यक्त करते थे. 1969 में कांग्रेस  पार्टी में विभाजन के समय  वह   इंदिरा गांधी के समर्थक थे और मोरारजी  देसाई, निज्लिंग्गप्पा,कामराज वगैरह के विरोधी थे  लेकिन उन्होंने कभी भी श्रीमती  गाँधी  की मेहरबानी की परवाह  नहीं की  और एक समय तो  ऐसा आया कि वह श्रीमती गांधी को चुनौती देते हुए  कांग्रेस कार्यसमिति  और केंद्रीय  चुनाव समिति  के सदस्य तक निर्वाचित होगए. 1974 के जेपी आन्दोलन के समय उनकी राय थी कि श्रीमती गांधी  को लोकनायक जयप्रकाश  नारायण से बातचीत करनी चाहिए  और खुद इसके लिए प्रयास भी किए लेकिन विफल रहे. नतीजा यह हुआ कि चन्द्रशेखर  जी  को इंदिरा  गांधी के कोप का शिकार होना पड़ा और  26 जून 1975  को  जेपी के साथ चंद्रशेखर जी भी  गिरफ्तार कर लिए गए  और आपातकाल  के  दौरान  पूरे  19 माह  जेल में बंद रहे. मार्च 1977 से लेकर जुलाई  1979  तक केंद्र में अपनी जनता पार्टी  की भी उन्होंने  कई बार  आलोचना की  और कई राज्यों में नीतियों के आधार पर  राज्यों के मुख्यमंत्रियों  को भी हटवाने से  गुरेज़ नहीं किया. उस समय उ.प्र., बिहार  और हरियाणा  में हुआ नेत्रत्व परिवर्तन इसकी मिसाल है. अक्टूबर 1978 में अलीगढ़  में हुए सम्प्रदायिक दंगों के बाद उनहोंने तत्कालीन मुख्यमंत्री रामनरेश यादव की सार्वजनिक रूप से आलोचना की थी  और स्वयं अलीगढ़ जाकर  कानून व्यवस्था का जायजा लिया था. 1980 के दशक में जब पंजाब में आतंकवाद की समस्या  शुरू हुयी थी तो   चन्द्रशेखर जी ने बातचीत और सहमति के ज़रिये  इस समस्या का समाधान तलाशने की बात कही लेकिन उनकी बात अनसुनी कर दी गयी. गई फिर स्वर्ण मंदिर में जब 'आपरेशन  ब्लूस्टार'  हुआ तो  चन्द्रशेखर जी  ही एक मात्र ऐसे विपक्षी राजनेता थे जिन्होंने इस घटना की तीर्व निंदा की और कहा कि  इस घटना  के भयानक परिणाम होंगे. कुछ ही माह बाद इस घटना की परिणिति प्रधानमंत्री  श्रीमती  इंदिरा गाँधी की  हत्या के रूप में हुई. उस दौरान चन्द्रशेखर जी को जिन शब्दों से नवाज़ा गया  उन्हें लिखा नहीं जा सकता.कुछ  लोगों ने तो उन्हें देशद्रोही तक करार दिया,  नतीजा यह हुआ  कि 1984 में  हुए लोकसभा चुनाव के दौरान  चन्द्रशेखर जी पहली और अंतिम बार चुनाव हारे लेकिन उन्होंने  अपने सिद्धांतों से समझौता करना  स्वीकार नहीं किया. 1985-86 में चन्द्रशेखर जी  से राज्यसभा में  जाने का प्रस्ताव किया गया  उस समय कर्नाटक  में जनता पार्टी की सरकार थी  और  उ.प्र.  से  भी वह  चुने जा सकते थे  लेकिन अपनी जगह उन्होंने  स्व. आचार्य नरेन्द्र देव  के बेटे अशोकनाथ वर्मा को अपनी जगह राज्यसभा में भिजवाया.


1991 में जब जनता दल का विभाजन हुआ और चन्द्रशेखर जी प्रधानमंत्री बने तो उनके पास यह विकल्प था कि यदि वह अपने राजनीतिक सिद्धांतों से समझौता कर लेते  तो ज़्यादा समय तक देश के  प्रधानमंत्री बने रह सकते थे  लेकिन उन्होंने अपने स्वाभिमान और आत्म सम्मान  से कभी समझौता नहीं किया.  वह जब तक जिए  शान से जिये  और बेबाकी के साथ देश  के आर्थिक सामाजिक  मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त करते रहे. वह देश के अंतिम  ऐसे राजनेता थे जो संसद में जब बोलने के लिए खड़े होते थे तो कोई संसद सदस्य  उनका विरोध करने की जुर्रत  नहीं कर पाता था और चन्द्रशेखर जी  का भाषण  लोकसभा  में पूरी गंभीरता  और ख़ामोशी के साथ सुना जाता था और इसी नाते उन्हें सर्वश्रेष्ठ  सांसद के सम्मान से भी नवाज़ा गया.

बेहद गरीबी में पले बढ़े चन्द्रशेखर जी  की राजनीतिक  तरबियत  समाजवादी बाने में हुई थी.  वह छात्र जीवन में ही समाजवादी आन्दोलन से जुड़ गए थे और ज़िन्दगी भर उन्हीं  सिद्धांतों पर कायम रहे. उनहोंने कांग्रेस पार्टी  को भी  समाजवादी बनाने का प्रयास किया. श्रीमती इंदिरा गाँधी  कि सरकार  द्वारा बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना.प्रिवी पर्स खत्म करना  और कांग्रेस को  समाजवादी  ढांचे में  ढालना और   संविधान  की  प्रस्तावना में समाजवाद  शब्द जुड़ने का श्रेय काफी हद तक 'युवातुर्क' चन्द्रशेखर  जी और उनके सहयोगियों को जाता है. फोटो साभार आई चौक डाट काम 

(लेखक स्वतंत्रता सेनानी और वरिष्ट समाजवादी  नेता और उत्तर प्रदेश विधान परिषद् के सदस्य रह चुके हैं )


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