राजनीतिशास्त्र अपराधशास्त्र की ही एक शाखा है

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राजनीतिशास्त्र अपराधशास्त्र की ही एक शाखा है

अरुण कुमार त्रिपाठी

लखनऊ के एक राजनीतिशास्त्री कहते हैं कि राजनीतिशास्त्र दरअसल अपराधशास्त्र की ही एक शाखा है. यह मध्यवर्ग का एक छोटा सा हिस्सा है जो नैतिकता और आदर्श की बात करता है. बाकी सब कुछ उपर्युक्त रिश्ते से ही चलता है. यह बात सुनने में अटपटी लगती है लेकिन उत्तर प्रदेश के गैंगस्टर विकास दुबे से जुड़े पिछले हफ्ते भर के घटनाक्रम से प्रमाणित होती है. विकास दुबे ने जब उसे पकड़ने आई पुलिस पार्टी के छह अधिकारियों को अपने गांव में क्रूरतापूर्वक मारकर ढेर कर दिया तब से उत्तर प्रदेश के समाज में अपराध और अपराधी को लेकर तीव्र जातिवादी प्रतिक्रियाएं हो रही हैं. सबसे ताजा प्रतिक्रिया लखनऊ के एक बौद्धिक की है जिसमें ब्राह्मण समाज के युवाओं की भावनाओं को छूने की कोशिश है. वे अपने फेसबुक पर लिखते हैं, `` उत्तर प्रदेश में तीन दिन का लाकडाउन कोरोना से बचाने के लिए नहीं किया गया है. यह विकास दुबे के `फर्जी इनकाउंटर’ पर उठने वाले विरोध को दबाने के लिए है. मामला ठाकुर बनाम ब्राह्मण बन गया है. सवाल उठ रहा है कि योगी यानी अजय सिंह बिष्ट की सरकार ने चुलबुल सिंह, बृजेश सिंह, विनीत सिंह, राजा कुंडा, अभय सिंह और बृजभूषण सिंह जैसे अपराधी चरित्र के लोगों का क्यों नहीं इनकाउंटर किया. क्यों प्रतापगढ़ में पुलिस अफसर जिया उल हक और बुलंदशहर में सुबोध सिंह की हत्या करने वालों का इनकाउंटर नहीं किया गया. शायद इसलिए कि वे लोग संघ से जुड़े थे.’’

उत्तर प्रदेश में ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है जो सब कुछ कानून और संविधान के अनुरूप किए जाने की मांग कर रहे हैं या करते हैं और इस बात से गुस्सा हैं कि कानून की प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ. ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है जो या तो इस `संदेहास्पद इनकाउंटर’ पर खुशी जता रहे हैं या फिर इसका जातिगत आधार पर विरोध कर रहे हैं. छह दिन पहले जब विकास के गांव में आठ पुलिस वालों की ड्यूटी पर हत्या हुई थी तब सोशल मीडिया पर सवर्ण समाज और विशेषकर ब्राह्मण बिरादरी के युवा विकास के पक्ष में प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे. उनका कहना था कि आखिर पुलिस उसके घर क्या करने गई थी. क्या वह रिश्वत लेने गई थी. जब पुलिस ऐसी हरकतें करेगी तो ऐसे ही होगा. कई लोग तो यह भी कह रहे थे कि क्या पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यक बिरादरी के लोगों को ही अपराध करने और गैंगस्टर बनने का हक है? क्या ब्राह्मणों को गैंगस्टर बनने का हक नहीं है?

वास्तव में विकास दुबे का पूरा मामला उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक चरित्र का एक नमूना है. उत्तर प्रदेश का समाज न सिर्फ घोर जातिवादी और सांप्रदायिक है बल्कि वह अपराधियों के प्रति आदर रखने वाला भी है. पिछले दिनों आए दो अपराध धारावाहिक---पाताल लोक और रंगबाज उत्तर प्रदेश में अपराध और राजनीति के गठजोड़ और उससे निपटने में लगी पुलिस व्यवस्था पर पड़ने वाले दबाव को उजागर करते हैं.

इसलिए राजनीति और अपराध के इस रिश्ते को देखने के तीन नजरिए हो सकते हैं. एक नजरिया तो दरोगा का है जो या तो ठोक देने में यकीन करता है या फिर पैसा लेकर छोड़ देने में. दूसरा नजरिया आम आदमी का है जो अपराधी के भीतर अपने दबे हुई मनोभावों की अभिव्यक्ति पाता है. तीसरा नजरिया एक इतिहासकार और समाजशास्त्री का है जो अपराध को राजनीति के साथ एक क्रम में जोड़कर देखता है. यहीं पर इतिहासकार इरिक हाब्सबाम की 1969 में आई बैंडिट्स किताब प्रासंगिक हो जाती है. वे कहते हैं कि यह अपराध एक प्रकार का वर्ग संघर्ष है. वे लिखते हैं कि डकैती लोगों के राजनीतिक रूप से जागरूक होने से पहले की अवस्था है. जब वे राजनीतिक रूप से जाग जाते हैं तो वे अपराध से दूर होते जाते हैं. गरीब आदमी जब तक विरोध की राजनीतिक भाषा नहीं सीख पाता तब तक वह अपराध की शरण लेता है. यानी सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन जितने प्रबल और व्यापक होंगे अपराध उतने ही कम होंगे.

हालांकि रंजीत गुहा जैसे सब आल्टर्न इतिहासकार हाब्सबाम के इस नजरिए से पूरी सहमति नहीं जताते. वे कहते हैं कि भारत में आरंभ में जो आदिवासियों के नेतृत्व में किसान आंदोलन हुए और हिंसा हुई उसमें राजनीतिक चेतना थी. इसी तरह इंग्लैंड में 1830 के मजदूर आंदोलन में भी राजनीतिक चेतना थी हालांकि उन लोगों ने थ्रेसिंगग मशीनों को तोड़ा था.

लेकिन इस सैध्दांतिक बहस के बीच उत्तर प्रदेश के गैंगस्टरों की कहानी को देखे जाने की जरूरत है. उत्तर प्रदेश देश की राजनीतिक आजादी की लड़ाई में भले अगुआ रहा हो लेकिन वह सामाजिक और आर्थिक आजादी की लड़ाई में देश के दक्षिणी प्रांतों की तुलना में पिछड़ा रहा है. वह पूरब से पश्चिम तक एक घनघोर जातिवादी समाज है और हाल के सांप्रदायिक उभार ने उसके कोढ़ में खाज पैदा कर दिया है. अब उत्तर प्रदेश व्यापक सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक तरक्की को लक्ष्य मानने की बजाय सांप्रदायिक और जातिवादी शक्तियों की राजनीति का अखाड़ा बन चुका है. ऐसे समाज में हिंसक प्रतिरोध का चरण राजनीतिक विरोध में परिवर्तित नहीं हो रहा है. बल्कि अपराध राजनीति का सहोदर हो गया है और प्रतिक्रियावादी राजनीति की शक्ति बन गया है. जातिवादी अपराध के सम्मानित होने की अपनी सीमा है. फिर भी जाति अपने में एक बीमा है और वह जाति के नाम पर अपराधियों को एक हैसियत और सम्मान देती है. हालांकि किसी भी जातिवादी गैंग में सारे लोग उसी जाति के हों ऐसा जरूरी नहीं. न ही यह जरूरी है कि किसी जाति के नाम पर गैंग चलाने वाला व्यक्ति विजातीय व्यक्ति को ही निशाना बनाए. अब विकास दुबे को ही लीजिए उसने संतोष शुक्ला से लेकर सीओ मिश्रा तक ऐसा तमाम हत्याएं की हैं जो सब सजातीय ही हैं. जातिवादी अपराधी जब सांप्रदायिक रूप से लेता है तो वह और ज्यादा सम्मान का हकदार हो जाता है. उत्तर प्रदेश में यह परिवर्तन तेजी से हुआ है. उसे आप हर स्तर पर देख सकते हैं. इससे पहले अगर तमाम डकैत परिवर्तनकारी आंदोलनों से जुड़कर सम्मान हासिल करते थे तो आज तमाम अपराधी राष्ट्रवादी आंदोलन का हिस्सा बनकर हैसियत पा रहे हैं.

विकास दुबे के घटनाक्रम में महाकाल मंदिर का एक मोड़ ऐसा आया जिसमें धार्मिक स्थलों की शक्ति दिखाने की कोशिश की गई. वह शक्ति उस राजनीतिक दल के लिए मुफीद है जो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में सत्ता में बैठी है. यहां सत्तर और अस्सी के दशक में पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक गैंगस्टर की कहानी प्रासंगिक हो जाती है. वह हत्याएं करने के बाद अपने पुरोहित से यज्ञ और मंत्रों का जाप कराता था. वे पुरोहित तो बूढ़े थे और बाद में चल बसे लेकिन उसी दुष्चक्र में फंस कर उनका बेटा एक बदमाश की गोली का शिकार हो गया. जाति और संप्रदाय का ढांचा आखिरकार हिंसा और अपराध पर ही टिका होता है. वह जितना हिंसा से दूर होता जाएगा उतना उदार होता जाएगा और अपनी पहचान खोता जाएगा. यही एक लोकतांत्रिक समाज की पहचान है. चूंकि उत्तर प्रदेश सामाजिक लोकतंत्र से निरंतर दूर होता जा रहा है इसलिए उसमें जाति और संप्रदाय की हिंसक प्रवृत्तियां प्रबल हो रही हैं.

कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश के सामाजिक--राजनीतिक तालाब का पानी सड़ गया है. वहां ऊंचे आदर्शों के जो भी कमल हैं वे कुंभलाने लगे हैं. वहां की सफाई न तो पुलिस मुठभेड़ से होने वाली है और न ही अपराधी को जाति और धर्म के आधार पर प्रश्रय देने से. वहां लोकतांत्रिक आंदोलन तेज होना चाहिए और तेज होना चाहिए पुलिस सुधार. उसी के साथ होना चाहिए न्यायिक प्रणाली का सम्मान. लेकिन न्यायिक प्रणाली व्यक्तियों पर कार्रवाई करती है. वह भ्रष्ट हो चुकी पूरी की पूरी जाति और संप्रदाय पर कार्रवाई नहीं कर सकती.उसके पास ऐसा इंतजाम नहीं है. न ही वह किसी को किसी के खिलाफ गवाही देने के लिए मजबूर कर सकती है. इसलिए यूपी का समाज बुनियादी परिवर्तन की मांग कर रहा है. उसे जितना रोका जाएगा उतनी ही सड़ांघ बढ़ेगी. उतने ही अपराधी पैदा होंगे और उतनी ही बार पुलिस वालों को जान से हाथ धोना पड़ेगा और इस तरह के संदेहास्पद इनकाउंटर का नाटक करना पड़ेगा. फिर लखनऊ के उन राजनीतिशास्त्री की बात सही निकलेगी कि राजनीतिशास्त्र अपराधशास्त्र की ही एक शाखा है.


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