अखबारों की मोतियाबिंदी नजर

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अखबारों की मोतियाबिंदी नजर

राजेंद्र तिवारी

कोरोना भयावह होता जा रहा है, चीन सीमा पर पीछे हटने पर सहमति और विकास दुबे प्रकरण पूरे हफ्ते चर्चा का विषय रहा. सभी अखबारों ने इस पर खूब रोचक सामग्री पाठकों को परोसी. हिंदी अखबार तो बहुत आगे रहे. अलबत्ता, जरूरी सवाल नदारद ही रहे. 

कोरोना को लेकर दो भ्रम फैलाए जा रहे हैं. पहला यह कि कोरोना से निपटने के मामले में हमारा देश अव्वल है. हमारे यहां पाजिटिविटी रेट बहुत कम है, रिकवरी रेट अधिकतम है और मृत्युदर ज्यादा केसेज वाले तमाम देशों से कम है. दूसरी बात यह है कि कोरोना की वैक्सीन बस बनकर बाहर निकलने ही वाली है जैसा आईसीएमआर के निर्देश पत्र से पता चला था. सारे अखबारों ने उसे खूब बड़ा-बड़ा छापा. लेकिन एक-दो अखबारों को छोड़कर, बाकी किसी ने इस खबर पर सवाल नहीं खड़े किये. सवाल खड़े करने वालों को भी प्रमुखता से नहीं छापा. आखिर क्या वजह हो सकती है इसकी? हमारे अखबार और खासतौर पर हिंदी के, अपने जर्नलिज्म को समृद्ध करने में कम संसाधन लगाते हैं बनिस्बत विज्ञापन जुटाने की. संपादकीय विभाग में विशेषज्ञता अब गये जमाने की बात हो गई है. और, बात विज्ञान करें तो अज्ञानता के केंद्र ही निकलेंगे न्यूजरूम्स. ऐसे में चिकित्सा विज्ञान के अनुसंधानों व औषधि-टीका विकसित करने की प्रक्रिया की जानकारी की जानकारी की अपेक्षा कैसे रखी जा सकती है? इसी तरह, कोरोना को लेकर जिस तरह की तस्वीर  स्वास्थ्य मंत्रालय प्रस्तुत करता चला आ रहा है, साढ़े चार महीने के बाद भी उस पर सवाल नहीं उठाये जा रहे हैं जबकि मार्च से लेकर अब तक के उनके दावों की पोल आंकड़ों में खुलती जा रही है.

चीन सीमा की बात करें, क्या हुआ वहां, क्या हो रहा है वहां और क्या होगा वहां…इन तीनों बातों को लेकर तमाम भ्रामक बातें तथ्य और सत्य के तौर पर लोगों के बीच फैली हुई हैं लेकिन हमारे यहां का स्वतंत्र-स्वायत्त मीडिया चीन के सरकार-पार्टी नियंत्रित मीडिया से प्रोपेगैंडा में आगे निकलने की होड़ करता प्रतीत हो रहा है. टेलीग्राफ व इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबार सवाल उठाती हुई खबरें देते भी है लेकिन बाकी तो सरकारों बयानों से फैले भ्रम के संवाहक का ही काम रहे हैं. इन अखबारों को पढ़कर क्या कोई यह जान सकता है कि पेट्रोलिंग प्वाइंट 14, 15 व 17 आपस में कितनी दूरी पर हैं और इनका मतलब क्या होता है? चीन के साथ रविवार को बनी सहमति में दबाव किस पर दिखाई दे रहा है? अपने हिंदी अखबार पढ़ें तो लगेगा जैसे चीन भारत से डर गया. लेकिन यदि चीन के सरकारी मीडिया के जरिये वहां की सरकार के प्रोपेगैंडा को देखें तो तस्वीर उलटी नजर आएगी. मजेदार बात तो यह हिंदी के बड़े अखबार अमर उजाला ने शुक्रवार को अंदर के पेज पर चीनी अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की छपी खबर को फैलाकर लगाया है - जैसा अखबार अपने पाठकों के सामने हर्षोल्लास में कह रहा हो - हा हा हा…देखो चीन का अखबार भी मान रहा कि चीन भारत के दबाव में आ गया. इसको क्या कहा जाए- जानबूझकर कुछ लोगों को खुश करने का उपक्रम या न्यूजरूम की विपन्नता!

गुरुवार को विकास दुबे के उज्जैन में पकड़ाये जाने की खबर को ही लें. टाइम्स ऑफ इंडिया ने जरूर अप्रत्यक्ष रूप से जरूर कुछ सवाल खड़े करने की कोशिश की है. आश्चर्य तो इस बात का है कि कानपुर व लखनऊ में बड़े अखबारों ने विकास दुबे को लेकर तमाम तरह की कहानियां छापीं और इस तरह से कि भरपूर मनोरंजन पाठकों का हो. लेकिन जमीन से लाई गई कोई ऐसी स्टोरी नहीं दिखाई दी जिससे अपने देश और खासतौर पर हिंदी प्रदेशों की राजनीति की “विकास दुबे” प्रवृत्ति पर दृष्टि मिल सके. वैसे राजनीति के अपराधीकरण पर बड़े-बड़े लेख-आलेख-टिप्पणियां मीडिया में दिखती हैं लेकिन जब कोई ऐसी घटना होती जिससे इस प्रवृत्ति को सींग से पकड़ा जा सके, हमारा मीडिया चूक जाता है. ऐसा नहीं है कि जमीन पर इसकी जानकारी हमारे पत्रकारों को नहीं है, लेकिन उस जानकारी को छापने का काम तो दूसरे लोगों के हाथ में है.

एक और बहुत ही महत्वपूर्ण खबर है कि नेपाल ने भारतीय न्यूज चैनलों को प्रतिबंधित कर दिया. ऐसा करने वाला वह पाकिस्तान के बाद दूसरा देश है. इस खबर को बहुत ही सामान्य तरीके से ट्रीट किया गया है। वास्तव में यह खबर सामान्य नहीं है. हिंदुस्तान समेत लगभग सभी अखबारों ने इसे ब्रीफ में निपटा दिया है. अंगरेजी में जरूर कुछ जगह इस खबर को महत्ता दी गई है.

यदि बीते सात दिनों पर नजर डालें तो राष्ट्रीय महत्व की इन प्रमुख खबरों के मामले में अधिकतर अखबार ‘मोतियाबिंदी’ ही नजर आ रहे हैं.टाइम्स ऑफ इंडिया में शुक्रवार को छपी एक रिपोर्ट से हमारे यहां के सूचना माहौल के संकेत मिलते हैं. यह रिपोर्ट अमेरिका एमआईटी के दो रिसर्चरों की एक स्टडी से संबंधित है. हमारे यहां के सोशल मीडिया और खासतौर पर व्हाट्सएप ग्रुप्स के जरिये फैलाई जा रही सूचनाओं पर. इसके मुताबिक, व्हाट्स एप पर हर आठ में एक फोटो भ्रामक होती है. एमआईटी के इन रिसर्चरों ने अक्टूबर 2018 में भारत में व्हाट्सएप पर चल रहे 5000 ग्रुप्स की सदस्यता ली और जून 2019 तक ढाई लाख से ज्यादा यूजर्स की 50 लाख पोस्ट्स एकत्र कीं. फिर उनका विश्लेषण किया.


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