जनादेश

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यह वही वितस्ता है

अंबरीश कुमार 

तीस अप्रैल 2016 की शाम .  हम जिस झेलम के किनारे खड़े हैं उसे कश्मीरी व्यथ कहते है . पहले इसे वितस्ता कहते थे . वही वितस्ता जिसके किनारे कभी  राजा पुरु और मकदूनिया (यूनान) के राजा सिकंदर  (अलेक्ज़ेंडर) के बीच युद्ध लड़ा गया था.युद्ध तो अभी भी चल रहा है पर यह अघोषित युद्ध है. इसे वे आजादी की लड़ाई कहते है . दूर चिनार के पेड़ों की कतार भी नजर आती तो लंबे दरख्त फरेश के हैं . यह डल झील के किनारे दूर तक जाते दिखते है .बर्फ़बारी के समय ये दरख्त बहुत रहस्मय से दिखते है जब इनपर बर्फ टिक जाती है . यह हब्बाकदल का झेलम पर बना पुल है . इस पर खड़े होते ही वर्ष 1981 याद आ जाता है . यही जगह थी .चारो ओर बर्फ ही बर्फ .चिनार के पेड़ भी बर्फ से ढके हुये .तब यह झेलम सफ़ेद थी जो आज काली हो चुकी है . तब अंधेरे में  बर्फ और बरसात में भीगे हुए हब्बाकदल की ख़ाक छान रहा था . तब शांति का दौर था . यह हब्बाकदल कश्मीरी पंडितों का गढ़ हुआ करता था . अब यहां  उनके पलायन के अवशेष ही दिखते हैं . वीरान ,उजड़े हुए या जले हुए घर . 

बात करीब पैतीस साल से भी पहले की है .  किसी काम से दूसरी बार पठानकोट तक गया था तो वहां से घूमते हुए जम्मू पहुंच गया . जम्मू और श्रीनगर दोनों जगह अपने बचपन के मित्र थे . पता चला जम्मू से रात भर में श्रीनगर पहुंचा जा सकता है . अकेले था इसलिए जाने का फैसला आनन  फानन में कर लिया . देर शाम एक खटारा सी बस मिल गई जिसपर बैठते ही काफी थके होने की वजह से नींद भी आ गई . अचानक ठंढ और तेज हवा चलने जैसी आवाज से नींद खुली तो चारो और सफेदी नजर आई . बगल के मुसाफिर ने बताया पटनीटाप आ गया है और भारी बर्फबारी की वजह से बर्फ रुक गई है . अपने पास कुल एक हाफ स्वेटर था जिसे निकाल लिया . जीवन में पहली बार बर्फ गिरते देख रहा था . बाहर  निकला तो महसूस हुआ कोई रुई के फाहे ऊपर फेंक रहा है . पास ही चाय की दुकान पर लोग इकठ्ठा रहे . चाय पी गई और कुछ देर बाद बस चल पड़ी . आंखों  में नीद भारी थी और बगल वाले ने तरस खाकर कम्बल दे दिया जिससे गरमी मिली और फिर उठे तो बताया गया जवाहर टनल के आगे बर्फ के चलते रास्ता बंद है . वही पास के ढाबे में चाय और अंडा पराठा का नाश्ता हुआ और तबतक बर्फ साफ़ करने वाले कर्मचारियों ने रास्ता साफ़ कर डाला था . चारो और बर्फ और खाई में गिरे ट्रक भी नजर आ रहे थे जिनसे गिरा सेब बिखरा हुआ था . सफ़र फिर शुरू हुआ और दोपहर तक श्रीनगर पहुंचे तो अभिभूत थे . यह वाही जगह थी जिसे देख मुगल बादशाह जहांगीर ने कहा था ‘गर फ़िरदौसे बर रुए ज़मीन अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त.’ मतलब ‘यदि जमीन पर कहीं स्वर्ग है तो यही है, यही है. अब हम स्वर्ग में थे और एक ही दिन रुक कर वापस लौटना चाहते थे इसलिए हाउसबोट तलाशने लगे तो किसी ने झेलम का रास्ता बता दिया और मोलभाव कर एक हाउसबोट में रुक गए . जिसके बारे में लिखा हुआ मिला 'आज हाउसबोट एक तरह की लग्जरी में तब्दील हो चुके हैं और कुछ लोग दूर-दूर से केवल हाउसबोट में रहने का लुत्फउठाने के लिए ही कश्मीर आते हैं. हाउसबोट में ठहरना सचमुच अपने आपमें एक अनोखा अनुभव है भी. पर इसकी शुरुआत वास्तव में लग्जरी नहीं, बल्कि मजबूरी में हुई थी. कश्मीर में हाउसबोट का प्रचलन डोगरा राजाओं के काल में तब शुरू हुआ था, जब उन्होंने किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा कश्मीर में स्थायी संपत्ति खरीदने और घर बनाने पर प्रतिबंध लगा दिया था. उस समय कई अंग्रेजों और अन्य लोगों ने बडी नाव पर लकडी के केबिन बना कर यहां रहना शुरू कर दिया. फिर तो डल झील, नागिन झील और झेलम पर हाउसबोट में रहने का चलन हो गया. बाद में स्थानीय लोग भी हाउसबोट में रहने लगे. आज भी झेलम नदी पर स्थानीय लोगों के हाउसबोट तैरते देखे जा सकते हैं. ' बर्फ इस कदर फैली हुई थी कि झेलम पर बने लकड़ी का पुल पर करने के बाद कई बार फिसले और गिरे भी . रहने की जगह जब मिल गई तो अपने मित्र राजेंद्र कौल को तलाशने निकला जो श्रीनगर दूरदर्शन में कैमरामैन थे . दूरदर्शन परिसर  परिसर में पहुंचने  पर पता चला वे घर जा चुके है जो हब्बाकदल में है . इस बीच फिर बर्फ गिरने लगी थी और भूख भी लग रही थी . लाल चौक में काफी हाउस दिखा तो कुछ देर वहा बैठे भी क्योकि बाहर कड़ाके की ठंढ भी थी . शाम अंधेरे में बदल चुकी थी और बर्फ के बीच बरसात भी . हब्बाकदल की गलियों में राजा का घर तलाशते तलाशते रात के आठ बज गए . खैर तीन मंजिल का लकड़ी का वह घर मिल ही गया . भीगने और अंधेरे की वजह से राजा एकदम से पहचान नहीं पाया और फिर जैसे समझ आई गले से लिपट चुके थे . वह हैरान इस आंधी पानी में मै कैसे यहाँ पहुंच गया . फिर अपने कपडे दिए और बोला -पहले बोट से सामान लाते है . बहुत मना किया पर माना नहीं . एक ऑटो लिया और बरसात में झेलम के हाउस बोट पर पहुंच  गए . उसका भुगतान किया और सामान लेकर राजा के घर में . थोड़ी देर बाद खाने का बुलावा आया . सबसे ऊपर की मंजिल में नीचे ही समूचा परिवार बैठा था और बड़ी गोल थाली में तरह तरह के व्यंजन . इन दोनों कश्मीरी परिवारों से बचपन से सम्बन्ध रहा है इसलिए कहवा ,रोगन होश से लेकर 'हाक ' जैसे साग से पहले से वाकिफ था . कश्मीरी लोग तेल घी का ज्यादा इस्तेमाल करते है और मांस उनके भोजन का अनिवार्य अंग भी होता है . खैर तब मौसम बिगड़ने और बर्फ़बारी से रास्ता बंद हुआ तो दस दिन श्रीनगर में ठहरना पड़ा था . इस बार विवाह के छब्बीस साल जिस दिन पूरे हुए उसी दिन सविता के साथ दोपहर श्रीनगर पहुंच गए थे . डल झील एक छोर यानी डल गेट पर एक होटल में ठहरे थे . देवदार के घने जंगलों और बर्फ से घिरे गुलमर्ग और खिलनमर्ग को देखा तो नाशपाती के लिए मशहूर तंगमर्ग को भी .गुलमर्ग से खिलनमर्ग की यात्रा यादगार थी .देवदार के घने जंगल के पीछे बर्फ से लदी चोटियां दिख रही थी .आगे का सफ़र केबल कार यानी गंडोला से था .गंडोला आपको जमीन से उठाकर आसमान तक ले जाता है .यह सफ़र दो चरण में पूरा होता है .नीचे से चले तो हरियाली थी पर अठारह मिनट  बाद  ही हम दस हजार फुट से ज्यदा की उंचाई पर बर्फ के मैदान में थे .चारो ओर बर्फ ही बर्फ .अभी इस गंडोला को और ऊपर दूसरे चरण में और ऊपर जाना था .बताते है उसके आगे ही एलओसी है . पर बर्फ के इस बड़े मैदान को देखकर हतप्रभ थे .ऊपर पहाड़ियों पर बादल ही बादल नजर आ रहे थे .इस बीच सैलानियों को बर्फ के स्कूटर और स्लेज पर घुमाने वालों की भीड़ इकठ्ठा हो गई .  कोलकोता में जिस तरह आदमी आदमी को रिक्शे में खींचता है ठीक उसी तरह गंडोला से बर्फ के मैदान में पहुंचने पर स्लेज गाडी लिए नौजवान से लेकर बुजुर्ग तक खड़े नजर आ जाएंगे .सुना था कि कई कुत्ते स्लेज गाडी को खींचते हैं पर यहां तो आदमी ही काठ के स्लेज को खींच रहा था . मना करने के बावजूद एक अधेड़ कुली सविता की स्लेज को खींचते खींचते हांफने लगा . तब हमने आगे यह कहकर जाने से मना कर दिया कि आगे भी तो ऐसी ही बर्फ है .पर ऊपर की पहाड़ियों का नजारा वाकई अद्भुत था . लौटे तो पैदल चलते चलते थक चुके थे . पर शाम को डल किनारे पहुंच गए .  सविता  डल झील और उसके सामने के मुग़ल कालीन बागीचे देखकर हैरान थी . चाहे शालीमार हो या निशात या फिर चश्मेशाही . चश्मे , झरने और पानी के अन्य प्राकृतिक स्रोत को किस तरह बगीचों के बीच मोड़ कर उन्हें खूबसूरत बगीचे में बदला गया होगा यह सोचकर हैरानी होती है . इसी तरह आदि शंकराचार्य का डल के ऊपर की पहाड़ी पर बना मंदिर भीं अद्भुत नजर आता है . अब आतंकवाद का वह दौर नहीं है इसलिए सैलानियों की भीड़ फिर बढ़ रही है . ज्यादातर सैलानी दल झील के सामने से लेकर डल गेट पर स्थित होटलों में रुकते है . उनका एक आकर्षण यह भी है कि इस तरफ सरदारों के कुछ ढाबे भी है .उत्तर भारत का आम सैलानी कहीं भी जाता है तो उत्तर भारतीय खाना नही छोड़ता इसलिए तंदूरी रोटी ,दाल मखनी ,पराठा सब्जी दही आदि जहां मिल जाए उसी के आसपास ठहरता है . चाहे गोवा हो या श्रीनगर . श्रीनगर में डल गेट स्थित कृष्णा ढाबा इसका उदाहरण है जिसके यहां रात के खाने के समय टेबल के लिए आधे पौन घंटे से ज्यादा इंतजार करना पड़ सकता है .खैर  हमने कुछ कश्मीरी व्यंजन का भी स्वाद लिया . श्रीनगर से आजाद कश्मीर दो ढाई घंटे की दूरी पर बताया जाता है और कुछ और आगे बढ़ने पर पकिस्तान का इलाका आ जाता है . कई तरह के सामान इधर से उधर जाते हैं तो उधर से इधर भी आते है . हमने कश्मीर में पाकिस्तान का शहद बिकते देखा तो अंजीर भी . मुजफ्फराबाद से आने वाले कपडे कश्मीरी महिलाओं की पहली पसंद होते है .दरअसल ये संबंध कुछ सालों का नहीं है बल्कि सैकड़ों सालों का है और बहुत से परिवार दोनों तरफ बंट गए है  . पर ये वह मुद्दा है जिसपर कोई सैलानियों से ज्यादा खुलना नहीं चाहता  . श्रीनगर में चारो ओर पहाड़ है ,बाग़ बगीचे हैं झरने और झील भी हैं पर अब वे बदहाल हो रहे है  . खासकर डल झील और झेलम  .

पर  लौट कर बार बार झेलम से गुजरना होता तो उसकी दशा देखकर मन खिन्न हो जाता . 


अब यह  झेलम दम तोड़ रही है .मई महीने में ऊपर की पहाड़ियों से बर्फ पिघलने के बाद इसका पानी बढ़ता है और प्रवाह भी .पर  मई के पहले हफ्ते में पुराने शहर में बने हब्बाकदल पुल पर खड़े होने पर यह नदी एकदम काले रंग की दिखती है .पानी भी ठहरा हुआ . पास जाने पर दुर्गंध भी महसूस होती है . यह नदी वेरीनाग से जब निकलती है तो इसका पानी अमृत माना जाता है .बाद में झेलम कश्मीर के तीन बड़े जिलों अनंतनाग, श्रीनगर और बारामूला से होती हुई पाकिस्तान चली जाती है पर अपना प्रदूषित पानी लेकर . सबसे बुरा हाल श्रीनगर में इस नदी का होता है .कश्मीरी में झेलम को व्यथ कहते है जो अब अपनी व्यथा खुद कहती नजर आती है . पुराने कश्मीर में सात पुल इस झेलम पर बने हुए है कदल कहा जाता है .हब्बाकदल इसमें से एक है जो कश्मीरी पंडितों का कभी गढ़ माना जाता था . इसी झेलम के किनारे यह इलाका है .झेलम के दोनों ओर घनी आबादी है और सभी का कचरा सीधे झेलम में डाला जाता है . श्रीनगर शहर का ज्यादातर नाला इसी झेलम में गिरता नजर आता है .इस श्रीनगर शहर को ऊपर की पहाड़ी पर बने शंकराचार्य के मंदिर से देखे तो पूरा शहर पानी पर तैरता नजर आएगा . डल झील के साथ झेलम भी ऊपर से नीचे को जाती नजर आती है . झेलम में एक तरफ तो हाउस बोट की कतार नजर आती है तो दूसरी तरफ गिरते हुए नाले . पुराने श्रीनगर में सीवेज के निस्तारण की कोई आधुनिक व्यवस्था नही है और घने बसे मोहल्लो का सारा कचरा इसी नदी में बहाया जाता है . इसी तरह जितने भी हाउस बोट है सभी अपना कचरा सीधे इसमें बहाते हैं . इस सबकी वजह से नदी में गाद भर गई है और इसे दोनों तरफ से पक्का कर बांध भी दिया गया है . शहरों में नदियों के दोनों किनारों को बांधने की जो नई परम्परा शुरू हुई है उससे  श्रीनगर भी नहीं बच पाया है . नए शहर की तरफ तो यह नदी कुछ चौड़ी दिखती है पर पुराने श्रीनगर की तरफ जाते जाते संकरी हो जाती है .दोनों तरफ से अतिक्रमण ने इस नदी को और बदहाल कर दिया है .ऐसे में जब बर्फ तेजी से पिघलती है तो नदी का पानी शहर के निचले इलाकों में भर जाता है .दरअसल झेलम नदी के खादर के इलाके में बड़े पैमाने पर निर्माण किया गया है और पानी की निकासी के ज्यादातर रास्ते और ढलान पर पक्के मकान बना दिए गए है .ऐसे में बरसात में झेलम कहर बन जाती है तो बाकी दिनों में शहर का बड़ा नाला नजर आती है . ठीक उसी तरह जैसे देश के अन्य शहरों से गुजरने वाली नदियों का हाल है . श्रीनगर बाग़ बगीचों और ताल तालाब का शहर है .इन ताल तालाब से झेलम को और पानी भी मिलता है जिसे लेकर वह आगे जाती है .पर अब श्रीनगर के ताल तालाब भी बदहाल हो चुके हैं तो झेलम नदी भी .श्रीनगर में बहुत दिन से सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की योजना बन रही है पर अभी तक इस दिशा में कोई पहल नहीं हुई है .बीते करीब तीन दशक में अलगाववाद के दौर से गुजर रहे कश्मीर में पर्यावरण का मुद्दा भी हाशिये पर है जिसके चलते ताल तालाब और नदी पहाड़ सभी बर्बाद हो रहे है .डल झील तो सिकुड़ती जा रही है तो झेलम दम तोड़ रही है .झेलम को लेकर सरकार और समाज ने जल्द जरुरी कदम नहीं उठाए तो यह नदी नहीं बचेगी  . श्रीनगर में ज्यादातर लोगों की जीविका पर्यटन उद्योग पर निर्भर है  . हर सैलानी यहां झील नदी बर्फ से ढके पहाड़  देखने आता है  . पर अब ये झील और नदी देखने लायक नहीं रह जाएंगे तो सैलानी कैसे आएंगे  .


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