गांधीवादियों की चिट्ठी सोशल मीडिया में क्यों फैली ?

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गांधीवादियों की चिट्ठी सोशल मीडिया में क्यों फैली ?


इस्लाम हुसैन

ऐसा लगता है गांधी और विनोबा के अनुयायी अब थक-मांद कर सत्ता से संघर्ष करने के स्थान पर आपस में ही दो-दो हाथ करने को जीवन की अंतिम सार्थकता मान रहे हैं.ऐसे थकेले गांधीवादी व विनोबावादी अपने अपने गढों में रहकर अपने तथाकथित समर्थकों के सहयोग से हवा में तलवार भांज रहे हैं, और  गांधी के नाम पर जो रहा बचा है उसी को दिन रात खत्म करने की जुगत कर रहे हैं.इसमें कितना ही अगर मगर लगाऐं लेकिन पिछले दिनों एक चिट्ठी के माध्यम से सर्व सेवा संघ पर सवाल उठाने वालों की नीयत का लब्बो लुआब यही लगता है.

वर्धा से लेकर दिल्ली तक और वाया वाराणसी, लखनऊ से लेकर भागलपुर तक यही आज की सच्चाई है, कि कुछ कुंठित मूर्तियां गांधी और सर्वोदय के नाम पर अपने को स्थापित और सम्मानित कराने के लिए वही सब कर रही हैं जैसे थके हारे लोग अपने रचियता व अपने पालक की प्रतिमा को धूल धूसरित करने का प्रयास करते हैं.सर्व सेवा संघ जो गांधी विनोबा के मूल्यों पर खड़ी की गई थी आजकल अपने लोगों के सहयोग से गैरों द्वारा चलाए गए चिट्ठी के तीर से आहत है. कमाल की बात यह है कि जो लोग यह तीर चला रहे हैं उन्हें सर्व सेवा संघ के विषय में और उसकी हाल की गतिविधियों के विषय में बिल्कुल भी नहीं पता, न वे ये जानते हैं कि सर्व सेवा संघ ने हाल के वर्षों में अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए क्या किया, और न उनमें कुछ को यह पता कि सर्व सेवा संघ का चुनाव कब और कैसे होता है?

इस विषय में सर्व सेवा संघ के अध्यक्ष महादेव विद्रोही का कहना है कि संघ के विषय में सोशल मीडिया में जो चिट्ठी फ़ैल रही है उन चिट्ठी भेजने वालों का सर्व सेवा संघ से भी कोई नाता नहीं है. श्री विद्रोही ने एक और बात बताई कि सर्व सेवा संघ के विषय में जो पत्र कुछ लोगों ने इधर उधर लिखा है, वह पत्र उनको नहीं भेजा है, जबकि नैतिकता का तकाजा था, कि जो पत्र जिसके लिए लिखा जाए उसे जरूर भेजा जाना चाहिए था.
सर्व सेवा संघ के बारे में पत्र लेखकों की अज्ञानता संघ के चुनाव के विषय में भी सामने आई है. कुछ कथित गांधीवादियों के नाम से जो पत्र सर्व सेवा संघ संघ के लिए जारी हुआ है उसमें सबसे पहले यही लिखा  है कि सर्व सेवा संघ के तुरंत चुनाव कराएं जाएं, लेकिन यह चिट्ठी सर्व सेवा संघ को या उसके अध्यक्ष को नहीं भेजी जाती, आसपास घूमती है, इधर उधर जाती है, अखबारों में सोशल मीडिया में चक्कर लगाती है. लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि पत्र लेखकों को यह नहीं पता था कि सर्व सेवा संघ के चुनाव इस वर्ष मार्च के अंतिम सप्ताह में होने वाले अधिवेशन में 31 मार्च को कोट्टायम केरल में आवश्यक रूप से होने थे, लेकिन कोरोना के कारण अन्तिम समय में अधिवेशन स्थगित करना पड़ा था. जिसके कारण सर्व सेवा संघ के चुनाव नहीं हो पाए. चुनाव से पूर्व सभी औपचारिकताएं सर्व सेवा संघ के संविधान के अनुसार ही होती हैं, और जिसमें सदस्यता के नियम से लेकर ट्रस्ट्रियों तक की भूमिका के विषय में स्पष्ट विवरण है, और पूर्व अध्यक्षों की कोई भूमिका सर्व सेवा संघ के संचालन में नहीं होती. जिसकी मांग के लिए ही चिट्ठी लिखी गई है.

चिट्ठी में सर्व सेवा संघ की भूदान आन्दोलन और स्वराज आन्दोलन? की भूमिका को याद करते हुए उस पर निष्क्रिय होने का आरोप लगाया. यहां भी पत्र लेखकों की सर्व सेवा संघ के बारे में अज्ञानता दिख गई. संस्थागत रूप से सर्व सेवा संघ ने इस बीच जितने कार्यक्रम कराए हैं उतने विगत में कम ही हुए हैं, सर्व सेवा संघ ने भारत छोड़ो आंदोलन की हीरक जयंती पर कार्यक्रम कराया, कश्मीर समस्या पर सेमीनार किया, लींचिंग के विरोध में पदयात्रा निकाली, कार्यक्रम किए, नागरिकता कानून के विरूद्ध कार्यक्रम किए. विश्वविद्यालयों के छात्रों के दमन के विरूद्ध झंडा बुलंद किया. कृषि बीमा से बदहाल किसानों के समर्थन में भी प्रस्ताव किया. सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि सर्व सेवा संघ ने बापू के सेवाग्राम आश्रम के ठीक बाहर नागरिकता कानून के बारे में कार्यक्रम किया. जिसमें वरिष्ठ पत्रकार, हाईकोर्ट के एडवोकेट सहित अनेक वक्ताओं ने इस कानून के खिलाफ आवाज़ उठाई.... . क्या इसी से कुछ पुराने परम्परागत गांधीवादियों को ऐतराज हो गया कि सरकार के खिलाफ आवाज़ क्यों उठाई गई. चिट्ठी भेजने वाले वहीं हैं जो सत्ता प्रतिष्ठान से किए जाने वाले सवालों के साथ नहीं, सवालों के खिलाफ और सत्यता प्रतिष्ठान के पक्ष में खड़े हुए हैं.

क्योंकि जिस तरह चिट्ठी में सर्व सेवा संघ के पुराने अध्यक्षों को साथ लेने की बात उठाई है वहीं चिट्ठी की नियत को भी स्पष्ट करती है. सर्व सेवा से अलग होकर अपने अपने मठ चलाने वाले ये गांधीवादी लम्बे समय से सर्व सेवा संघ के प्रति विरक्ति के भाव से अपने अपने संसार (मठ) में रमें हुए हैं, और अब वे आंदोलनकारी नहीं सरकारी समन्वयवादी होकर सरकार से सहयोग के इच्छुक हैं. उनकी सर्व सेवा संघ और उसके चलाए गए कार्यक्रमों के प्रति निष्क्रियता का आलम यह है कि पिछले कुछ वर्षों में सत्ता प्रतिष्ठान के हर जनविरोधी कार्य व कार्यक्रमों के प्रति वह निस्पृह हो गए हैं, कुछ कथित गांधीवादी सत्यता के सुख सुविधा पाने के लिए भी जुगत करते देखे गए हैं, यहां तक की ऐसे ही गांधीवादियों ने गांधी शताब्दी के नाम पर लम्बा चौड़ा बजट लेने की जुगत भी की गई.

यह बात का साफ हो गई है कि वो सर्व सेवा संघ में घुसकर उसको गांधी के मूल्यों पर नहीं सरकारी मूल्यों पर चलाना चाहते हैं, गांधी शताब्दी के नाम विशाल परियोजना बनाकर करोड़ों रूपया सरकार से लेने की योजना सर्व सेवा संघ के वर्तमान रूप व संविधान के अनुसार तो हो नहीं सकती थी,(सर्व सेवा संघ अपने संविधान के अनुसार सरकार से कोई सहायता नहीं ले सकता) जब तक कि उसमें घुसपैठ करके उसे बदल ही न डाला जाए. ऐसा सोचना एकदम ग़लत भी नहीं है, क्योंकि सर्व सेवा संघ से अलग होने वाले तथाकथित गांधीवादियों ने अपने अपने मठ मजबूत करके सर्व सेवा संघ अनेक स्थानों में सम्पत्तियों पर कब्जा कर लिया है. सर्व सेवा संघ लाख लिखा पढी और मुकदमेबाजी के बाद भी हालत नहीं सुधरी और ऐसे गांधीवादियों का अभी भी सम्पत्तियों पर कब्जा बरकरार है. गांधी विनोबा के जिन मानने वालों ने दिल्ली, वर्धा और वाराणसी के हालात देखें हैं वो गांधी संस्थाओं की त्रासदी व कथित गांधीवादियों की लालसा आसानी से समझ गए  हैं.

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