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कबीर सिंह जैसा आशिक नहीं है स्वीकार

साक्षी मिश्रा  

आज के दौर में फिल्म इंडस्ट्री दो हिस्सों में बटी हुई दिखाई देती है. एक ओर सामाजिक कुरीतियों व रूढ़िवादी धारणाओं को खत्म करने का प्रयास करते हुए ‘पिंक’ जैसी फिल्म बनाई जा रही है. वहीं दूसरी ओर हिंसा, नशीले पदार्थ और काम वासना को बढ़ावा देते हुए ‘संजू’ और ‘कबीर सिंह‘ जैसी फिल्मों को क्रिएटिविटी के नाम पर प्रस्तुत किया जा रहा है. बीते सप्ताह रिलीज़ हुई शाहिद कपूर की फिल्म "कबीर सिंह" में भी कुछ ऐसा ही दिखाया गया है. फिल्म में बात अभिनय की करें तो सभी कलाकारों ने अच्छा काम किया है. परन्तु फिल्म की कहानी पर बात की जाए तो अभिनय की तारीफों पर, कहानी की आलोचनाओं का बोझ भारी पड़ जाएगा. फिल्म में एक ऐसे नकारात्मक किरदार को 'हीरो' के तौर पर दिखाया गया है, जो न सिर्फ गुस्सैल और घमंडी है, बल्कि ड्रग एडिक्ट और सेक्स एडिक्ट भी है. सबसे हैरानी वाली बात यह है कि, इन सबके बावजूद यह फिल्म 100 करोड़ रुपये की कमाई पार करने वाली शाहिद कपूर की पहली फिल्म बनकर उभरी है.    निर्देशक संदीप रेड्डी ने तमिल फिल्म 'अर्जुन रेड्डी' बनाने के बाद शहीद कपूर के साथ इसका हिंदी रीमेक 'कबीर        सिंह' बनाया है. फिल्म में एक ऐसे किरदार को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जा रहा है, जिसे अपने आगे कोई और नज़र ही नहीं आता है. फिल्म में अगर कोई दुखी है तो वो कबीर सिंह, परेशान है तो वो कबीर सिंह, कोई नाराज़ है तो वो कबीर सिंह, यहां तक की रोने और गुस्सा करने का कॉपी राइट भी कबीर सिंह के ही पास है. कबीर सिंह जब चाहे तब किसी को मार सकते हैं, किसी से प्यार कर सकते हैं और तो और बिना लड़की को बताए पूरे कॉलेज में एलान कर, उस पर अपना कॉपी राइट जता सकते हैं. उसके बाद सिर्फ किस्स ही नहीं, उसे जब चाहे थप्पड़ भी मार सकता है. यही कारण है कि फिल्म का हर एक दृश्य 'केंद्र बिंदु' अर्थात 'कबीर सिंह' पर ही आधारित है. फिल्म में अगर कुछ सबसे प्यारा था तो वो कबीर सिंह के लिए अन्य सभी किरदारों का 'प्यार' था. घर पर बड़ों का अपमान करने के बाद भी सभी उससे प्यार करते थे. दोस्तों को लेकर बे-परवाह होने के बाद भी, शिवा (कबीर सिंह का दोस्त) अपना सब काम छोड़कर उसके आगे-पीछे घूमता रहता था. इतना ही नहीं, जिस लड़की (प्रीति) के प्यार में कबीर सिंह मरने-मारने के लिए तैयार है, उसे भी अपने हिंसात्मक प्यार और घर वालों को छोड़ कर आने के लिए छह घंटों की महौलत के सिवा कुछ नहीं दे सकता है. पर इन सब के बावजूद अंत में प्रीति उन्हें दो - चार थप्पड़ रसीद करने के बाद उसे दिल से अपना लेती है.                            

फिल्म में दिखाए गए दृश्यों को अगर वास्तविक जीवन से जोड़ कर देखा जाए, तो आप हमारी बातों को स्पष्ट रूप से समझ सकेंगे. साथ ही, यह जान पाएंगे कि इस फिल्म के किरदार ‘कबीर सिंह’ ने संविधान के किन कानूनों और सामजिक मूल्यों की धज्जियाँ उड़ाई है. 


फिल्म की शुरुआत में ही, कबीर सिंह एक लड़की के बुलाने पर, सेक्स करने की इच्छा से उसके घर जाता है. परन्तु, जब मंगेतर के आने पर लड़की मना करती है, तो वह चाकू दिखा कर जबरन कपड़े उतारने के लिए  कहता है. फिर, बिना कुछ किए वहां से चला जाता है और अपने दोस्त (शिवा) को फोन कर अपनी हवस मिटाने के लिए एक लड़की की डिमांड करता है. फिल्म में यह दिखाते हुए इन सब बातों का समर्थन किया गया है कि कबीर सिंह एक ऐसा दुखी आशिक है जो अपनी प्रेमिका के लिए तड़प रहा है. अभी तक आप ने राधा-कृष्ण और लैला-मजनू जैसी स्वार्थहिन प्रेम कहानियों से प्रेरणा ले रहे थे. पर आज, युवाओं के लिए समाज में फिल्मों के माध्यम से वासना और हिंसा से भरे हुए ‘सच्चे’ प्रेम का उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है. इस पर सिर्फ एक ही सवाल मन में आता है कि, अगर प्रेमिका से दूर हो जाने के बाद कबीर सिंह का यूं लड़कियां तलाशना ठीक है, तो क्या प्रीति के ऐसा करने पर भी समाज द्वारा इतनी सरलता से अपना लिया जाता? क्योंकि प्रीति तो अपनी सारी खुशियां कुर्बान करके, घमंडी आशिक के प्यार की निशानी को पाल रही थी. वह चाहती तो वह भी जीवन में बे-परवाह आगे बढ़ सकती थी, परन्तु क्या उसी सम्मान के साथ समाज यह भी अपना लेता जैसे कबीर सिंह को अपनाया जा रहा है?


फिल्म शुरू होने से ख़त्म होने तक, कबीर सिंह अपने आसपास के लोगों के साथ बुरा व्यवहार करता हुआ नज़र आ रहा है. कभी वे अपने कॉलेज के डीन को कुछ कह देता है, तो कभी अपने करीबी दोस्त और पिता पर ही चिल्ला उठता है. लेकिन फिर भी, किसी के भी दिल में उनके लिए प्यार कम नहीं होता है. ये गुस्सा, ये आक्रोश कबीर सिंह के व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है. प्रीति के साथ भी उसका ऐसा ही व्यवहार है. कबीर सिंह को कॉलेज में पहली नज़र में ही प्रीति पसंद आ जाती है. जिसके बाद वे खुद ही तय कर लेता है कि, ‘ये कबीर सिंह की बंदी है’ और इसके बाद प्रीति के पास कोई ऑप्शन ही नहीं होता है. कबीर सिंह जब चाहे, जहां चाहे प्रीति को ले जा सकता है, उसे किस्स कर सकता है. इतना ही नहीं, वो खुद ही प्रीति पर अपना कॉपीराइट कर, उसके लिए किसी से भी लड़ सकता है और अपनी मर्जी से उसे गर्ल्स हॉस्टल से बॉयज हॉस्टल ले आ सकता है. साथ ही, प्रीति के कपड़े पहनने के ढंग पर भी अपना आदेश चलते हुए नज़र आता है, “प्रीति चुन्नी ठीक करो” जैसे प्रीति के चुन्नी की चिंता कबीर सिंह को प्रीति से कहीं ज्यादा है. आपको बता दें, कि कबीर सिंह के इस नियंत्रित व्यवहार के लिए प्रीति की सहमति की कोई जरूरत नहीं है, भले ही भारतीय संविधान के आर्टिकल 21 ने प्रीति को यह अधिकार दिया हो. जब पढ़ाई में अव्वल आने वाले कबीर सिंह को संविधान की परवाह नहीं तो प्रीति कैसे अपने इन अधिकारों के बारे में सोच सकती है?    

कबीर सिंह के प्यार में कुछ ऐसा पागलपन है कि वह प्रीति को सरे-आम सड़क पर थप्पड़ मार सकता है. देश में एक ओर डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट, 2005 का कानून बनाकर घरेलू हिंसा को ख़त्म करने का प्रयास किया जा रहा है. वहीं दूसरी ओर कबीर सिंह प्यार की आड़ में प्रीति को कभी थप्पड़ मारता है, तो कभी उसे अपने घरवालों को छोड़ कर उनके साथ आने के लिए छह घंटों की मोहलत देने लगता है. इस पर कबीर सिंह शायद यह सोच कर निश्चिन्त होगा कि, IPC की धारा 498 के तहत मानसिक उत्पीड़न की सज़ा सिर्फ शादी-शुदा जोड़ों पर ही लागू होती है. 


कबीर सिंह को फिल्म में इतना आकर्षित व्यक्ति दिखाया है कि अस्पताल में नर्स भी उस पर फ़िदा हो जाती है. फिल्म के एक दृश्य में कबीर सिंह नर्स के सामने ही पैंट उतारने लगता है, इस बेशर्मी को ‘हास्य’ की दृष्टि से देखा जा रहा है. इस पर तालियां बजाने वाली ऑडियंस शायद ही यह जानते होगी कि, कबीर सिंह सेक्सुअल हरैस्मेंट ऑफ़ वीमेन एट वर्कर्प्लेस के अधिनियम, 2013 का उल्लंघन किया जा रहा है, जिसके कारण कबीर सिंह को नर्स की शिकायत पर जेल भी हो सकती थी. परन्तु, फिल्म में ऐसा कुछ नहीं हुआ, क्योंकि एक विलेन जैसा व्यक्तित्व रखने वाले किरदार को फिल्म का मुख्य हीरो बनाया गया है. वो भी ऐसा हीरो जिसमें एक भी खूबी नहीं है, पर फिर भी सब उस पर अपनी जान निछावर करने को तैयार हैं.

 

फिल्म में कबीर सिंह प्रीति के प्यार में पागल है और उसका दोस्त, शिवा, उसकी दोस्ती में सारी हदें पार करने को तैयार है. शिवा का किरदार शाहरुख खान की फिल्म ‘देवदास’ के ‘चुन्नी बाबू’ से मिलता है. परिवार होने के बाद भी शिवा की एक ही जिम्मेदारी है - कबीर सिंह. कबीर सिंह को सिर्फ नशे में सोने देने के लिए ही शिवा उसे अकेले छोड़ कर जाता है. वरना क्लिनिक से कबीर और कबीर से क्लिनिक के दौरे तक ही शिवा का जीवन सिमित है. शिवा की दोस्ती इतनी शिद्दत वाली है कि कबीर सिंह के जीवन को व्यवस्थित करने के लिए उसने अपनी ही बहन को थाली में परोसी हुई ‘खीर’ की तरह आगे कर देता है. शिवा ने अपनी बहन की इच्छा जानने की जरुरत ही नहीं समझी, और इससे उसने यह साफ़ कर दिया कि कबीर सिंह का वो कितना पक्का दोस्त है. 

फिल्म की शुरुआत से अंत तक कबीर सिंह ने अपने रुतबे का दुरुपयोग किया है. क्लास में अचानक सबके सामने, एक सीधी साधी लड़की को ‘हीरो’ बनकर जबरन उसे अपने साथ चलने को कहता है. किससे उसे दोस्ती करनी चाहिए, किस के साथ क्लास में बैठना है, इन सब बातों का फैसला कबीर सिंह है. इस सब बातों पर आप कहेंगे कि मनोरंजन के उद्देश्य से बनी फिल्म पर इतनी चर्चा क्यों हो रही है. इस पर हम आपके सामने अपने कुछ तर्क प्रस्तुत करना चाहते हैं-


इस बात को आप नकार नहीं सकते कि,टीवी और फिल्म की दुनिया से जुड़ी हर बात का देश के युवाओं पर गहरा असर होता है. शायद तभी कभी कोई बच्चा शक्तिमान बन कर उड़ने के चक्कर में कभी छत से गिर जाता है. तो कभी,कोई सलमान खान का स्टंट कॉपी करने के प्रयास में अपनी जान गवां बैठता है.


आज समाज में महिलाओं के प्रति यौन हिंसा, मानसिक उत्पीड़न और शारीरिक हिंसा के अपराधों पर शिकंजा कसने का प्रयास किया जा रहा है. लेकिन संजू और कबीर सिंह जैसी फिल्मों में महिलाओं को एक वस्तु मात्र के रूप में दिखाया जाता है. जिन्हें, पुरुष अपने हवस के लिए उपयोग करते हैं. 


फिल्म में यह दिखाया गया है कि प्यार में मिले गमों को भूलने के लिए कबीर सिंह नशीले पदार्थों का सेवन करता है. आप ही बताइए कि इससे देश के युवाओं को क्या सन्देश जाएगा? इम्तिहान में कम अंक मिलने से दुखी हो, तो शराब पी लो. नौकरी मिलने में कठिनाई आ रही है, तो सेक्स एडिक्ट बन जाओ. क्या यह सीख हम घरों में अपने बच्चों को देना चाहेंगे? अगर हाँ, तो देर रात नशे की हालत में लौटे अपने बेटे को मत टोकिए और न ही इसके अश्लील आचरण पर आपत्ति जताएं.       

फिल्म में कबीर सिंह एक ऐसा आशिक है, जो अपने हिसाब से प्रीति से जुड़ी हर बात का फैसला खुद ही करता है. अब सवाल ऑडियंस में ताली बजाती उन लड़कियों से - क्या आप एक ऐसा जीवन साथी चाहेंगी, जो आपकी सभी इच्छाओं को नियंत्रित करने का प्रयास करे? जिसके कारण आपको अपना ही अस्तित्व खो देना पड़े? अगर हाँ, तैयार हो जाएं, अब आपको ऑफिस से घर वापस आने की डेडलाइन दी जाएगी. मायके जाने की बात पर या सेक्स के लिए मना करने पर दो-चार थप्पड़ पड़ सकता है. पर आपको इन सबका बुरा नहीं मानना है, क्योंकि यही आपके हीरो कबीर सिंह के प्यार करने का अंदाज़ है. कबीर सिंह के गुस्से पर तालियां बजाने वाली ऑडियंस भी अब तैयार हों जाए, समाज में प्यार के नाम पर हिंसा की बढ़ती घटनाओं के लिए. क्योंकि आपने स्वयं ही अपने मौलिक अधिकारों और इच्छाओं का रिमोट कंट्रोल किसी और को सौंप दिया है. सबरंग इंडिया


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