तड़का, छौंक या बघार ,स्वाद के साथ सेहत भी

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तड़का, छौंक या बघार ,स्वाद के साथ सेहत भी

 फज़ल इमाम मल्लिक 

नई दिल्ली .सियासत से लेकर भोजन में तड़का खूब लगाया जाता है. दरअसल चटपटापन खाने में न हो तो भोजन का मजा ही क्या. इसी तरह सियासत में भी खूब तड़का लगाया जाता है. जनादेश पर सियासी और सामाजिक विषयों पर तो चर्चा होती ही रहती है लेकिन जनेदाश के संपादक अंबरीश कुमार ने हर रविवार को भोजन यानी खानपान पर भी चर्चा की शुरुआत कर खाने से जुड़ी अच्छी बातों को बताने का सिलसिला शुरू किया है और इसका नाम दिया है भोजन के बाद, भोजन की बात. इस बार बातों में नहीं खाने में तड़के की बात हुई. प्रियंका संभव इस बातचीत की सूत्रधार थीं और चर्चा में अंबरीश कुमार के अलावा पूर्णिमा अरुण और शेफ अन्नया खरे शामिल हुईं.

दरअसल तड़का यानी बघारा खाने में जरूरी है और अलग-अलग इलाकों में इसे अलग तरह से लगाया जाता है. अंबरीश कुमार ने चर्चा की शुरुआत करते हुए कहा कि तड़का स्वाद के साथ-साथ सेहत के लिए भी जरूरी है क्योंकि इसमें लहसुन, जीरे और मिर्च का इस्तेमाल होता है. अंबरीश ने अपने छात्रावास के दिनों को याद करते हुए कहा कि हम मेस में खाने के लिए जाते थे तो अपना घी और कटोरा साथ लेकर जाते थे. वहां महाराज से अपनी पसंद का तड़का लगवाते थे. मेस में अमूमन खाना बहुत स्वादिष्ट नहीं मिलता था. तो एक तो लोग अपना घी वगैरह लेकर आते थे और बिना तड़का के खाना नहीं होता था. तड़के की वजह से दाल बहुत स्वादिष्ट हो जाती थी, खाना भले बहुत स्वादिष्ट नहीं होता था. दूसरा अनुभव छात्र आंदोलन के दौरान का है. आंदोलन के दौरान हम लोग जेल जाते थे तो हमें बी क्लास की सुविधा मिलती थी. वहां अरहर की दाल बनती थी तो वहां सरसों के तेल में तड़का लगाया जाता था. सरसों के तेल के पहले तड़के का अनुभव मुझे जेल में मिला. प्रियंका ने चर्चा में पूर्णिमा अरुण को शामिल करते हुए पूछा कि तड़के की स्वाद और स्वास्थ्य की क्या कहानी है. पूर्णिमा अरुण ने अंबरीश की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि यह सही है कि तड़के से स्वाद बढ़ जाता है, लेकिन यह स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है. उबला हुआ खाना तो मरीजों के लिए ठीक है लेकिन बाकी लोगों को छौंक कर ही खाना, खाना चाहिए. उसकी वजह यह है कि तड़के में जिन चीजों का हम इस्तेमाल करते हैं उनका गुण तड़के से ही हमें मिलते हैं. उन्होंने कहा कि दाल पूरे घर के लिए बनती है और उसमें एक या देढ़ चाय का चम्मच ही जीरा डाला जाता है, लेकिन पूरे घर को इसका फायदा मिलता है. जीरे में जिंक, आयरन और फासफोरस होता है तो सारे गुए तेल और घी में आ जाते हैं. घी व तेल की यह खासियत है कि वह दूसरे के गुण को अपने में समाहित कर लेता है. तो छोंक या बघार के बाद जीरे या हींग का गुण तेल या घी में आ जाता है और वह तेय या घी पूरे सब्जी में लग जाता है. इसका नतीजा यह होता है कि शरीर में वह अच्छी तरह से जाता है और पाचन में भी मदद करता है. उन्होंने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश वगैरह में सब्जियां सादी बना कर ऊपर से तड़का लगा लिया जाता है उससे सब्जियों देखन में भी अच्छी लगती है और उसका एरोमा खाने के लिए प्रेरित करती है. उन्होंने कहा कि तड़के का प्रचलन न सिर्फ स्वाद के लिए किया जाता है बल्कि भूख को बढ़ाने के लिए भी किया जाता है. राजस्थान का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वहां भी छौंक का काफी महत्त्व होता है और इसमें लाल मिर्च का बहुत इस्तेमाल किया जाता है. वहां कढ़ी में छौंक दिया जाता है और कई बार छौंका जाता है. वहां बड़ा समारोह होता है तो पंगत में जितनी बार कढ़ी परोसी जाएगी उतनी बार छौंकी जाती है.

अंबरीश ने अलग-अलग प्रांतों में तड़के का जिक्र करते हुए कहा कि हमारे यहां के अलावा गुजरात और महाराष्ट्र में भी तड़का लगाया जाता है. दक्षिण में सांबर का इस्तेमाल होता है. दही और रायते में भी बघार लगाया जाता है, जिससे स्वाद काफी बढ़ जाता है.चर्चा में हिस्सा लेते हुए अन्नया ने कहा कि तड़का, छौंक और बघार के बिना भारतीय खाना अधूरा है. चाहे वह कश्मीर का खाना हो या दक्षिण का या फिर महाराष्ट्र का, तड़का जरूरी है. उन्होंने कहा कि तड़का सिर्फ स्वाद या सुगंध के लिए ही नहीं न्यूट्रेंशन के लिए भी महत्त्वपूर्ण है. अन्नया ने कहा कि दही में भी छौंक लगाया जाता है. दक्षिण भारत में यह काफी लोकप्रिय है. इसमें प्याज, जीरे और खड़ी लाल मिर्च का घी में डाल कर गाढ़े दही में तड़का लगाया जाता है. उसका स्वाद बहुत बढ़ जाता है और वहां यह बहुत शौक से खाया जाता है. यहां तक कि छाछ में भी राई या करी पत्ते का तड़का लगा कर पीते हैं सादा नहीं पीते हैं क्योंकि इससे स्वाद बढ़ जाता है. चर्चा में छौंक या तड़के में तेल के इस्तेमाल पर भी बातचीत हुई. https://youtu.be/hbERUotu3u4


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