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यूपी में पचहत्तर हजार ताल तालाब पाट दिए

तो तालाब पाट कर बनी बहुमंजिली इमारते और हाई कोर्ट !

राजेंद्र कुमार 

लखनऊ .पानी के इस संकट के दौर में यह जानना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में बीते सत्तर साल में करीब 75 हजार झीलों और तालाबों का अस्तित्व पूरी तरह से मिटा दिया गया है .लखनऊ में तो हाई कोर्ट की नई इमारत तक एक तालाब के हिस्से पर ही बनी है .हम हर साल कई हजार ताल तालाब पाटते हैं और फिर पानी संकट पर रोते भी हैं .हर साल जून में भीषण गर्मी और घटते जलस्तर की खबरें अखबारों की प्रमुखता से छपने लगती हैं. तमाम सरकारी और गैर सरकारी सर्वे रिपोर्ट में घटते जलस्तर पर चिंता जताई जाती है. सरकार तमाम घोषणाएँ करती है. करीब दो माह तक ये सिलसिला चलता है, फिर ऐसी खबरे छपना बंद हो जाती है. जबकि घटते जलस्तर को बेहतर करने को लेकर सरकार या समाज के स्तर पर कोई ठोस पहल नहीं होती. और लोगों को घटे जलस्तर की चिंता के साथ छोड़ दिया जाता है. वर्षों से ऐसा ही होता आ रहा है और अब भी ऐसा ही हो रहा है.  हर बार सरकार के स्तर से घटते जलस्तर और प्रदूषित होती नदियों को लेकर चंद योजनायें शुरू करने की घोषणा होती है, पर ना तो जलस्तर का घटना रुकता है और ना ही नदियों   का प्रदूषण ही रुकता है. 

अब घटते जलस्तर को लेकर दूसरी तस्वीर को देखे, एक वक्त था जब उत्तर प्रदेश ही नहीं देश के हर शहर, कस्बे और गांव में पानी से लबालब झीलें हुआ करतीं थीं. कुओं में पानी रहता था. मगर अब राजस्थान को छोड़ कर देश के अन्य राज्यों में हजारों-हजार झीलें,  तालाब और कुएं न जाने कहां गायब हो गये. उत्तर प्रदेश में हजारों झीलें, तालाब और कुएं  सूख गये हैं, या उनका अस्तित्व  ही खत्म हो गया है. बची है तो सिर्फ इनकी चर्चाएं और गजेटियर में उनका जिक्र.

तो कहाँ लुप्त हो गई सूबे की ऐतिहासिक झीले, तालाब और कुएं? जिनका जिक्र सरकारी नक्शों में तो है पर अब जमीन पर उनका वजूद नही है. इस बारे में पड़ताल की तो पता  चला कि शहर हो या गांव, दोनों ही जगहों पर छुटभैया अफसरों ने चंद हजार रुपयों के लिए कई छोटी झीलों की जमीनों के पट्टे कर, उनका नामोनिशान मिटा दिया. फिर भी समाज के किसी भी स्तर से इसका विरोध नहीं हुआ. लखनऊ में भी  हाईकोर्ट के आलीशान भवन को बनाने के लिए एक झील को गुपचुप तरीके से पाटा गया. जब कोर्ट में याचिका दाखिल हुई  तो उसपर सुनवाई नहीं हुई. समाज, अदालत और अफसरों के झीलों और तालाबों के प्रति  ऐसे रुख के चलते आज ना झील दिखाई देती हैं, ना तालाब और ना ही कुएं. तमाम रिसर्च  ये बताती हैं की देश के हर गांव और शहर में बने कुएं समाज की उदासीनता का शिकार  हुए. उन्हें कूड़ेदान ने तब्दील कर दिया गया. लाखों की संख्या में लोगों की प्यास बुझाने  वाले कुएं सूख गए, पर किसी ने इसकी फ़िक्र नहीं की. यही वजह है कि अब शहर हो या  गांव गर्मी में भारी जल संकट झेलने को मजबूर हैं.

सरकारी रेकॉर्ड बताते हैं कि यूपी में करीब 65 सालों में करीब 75 हजार झीलों और तालाबों का अस्तित्व पूरी तरह से मिटा दिया गया. लाखों कुओं को पाट दिया गया. गांवों के भीतर  के तालाबों को पाट कर मकान बना लिए गए हैं. जबकि गांव के बाहर बने तालाबों पर   दबंगों ने कब्जे कर लिया. मनरेगा से बने तालाबों से स्थिति भी ठीक नहीं है. उनमे पानी नहीं है. जबकि पानी बचाने के लिए ही उन्हें बनाया गया था. आज कोई लखनऊ के आसपास वर्षों पहले बनाई गई झीलों और तालाबों को देखने निकले तो उसे न तो कहीं पानी से भरी झीलें मिलेगी और न ही तालाब या इंदारा कुएं. 

लखनऊ के इतिहास को अपने भीतर सजोने वाले योगेश प्रवीन के मुताबिक मोहनलालगंज के पास एक झील है चदवक या करेला झील. लगभग एक दर्जन गांवों को हरा भरा करने व बड़ी संख्या में गांवों की जीवनदायनी इस  झील को दबंगों ने ही मार दिया. इस झील पर लोगों ने कब्जा  कर रखा है. जब झील के जलग्रहण वाले क्षेत्र पर ही कब्जा हो जाएगा तो पानी कहां से आएगा. इस झील में कमल खिलते थे लेकिन अब सब उजाड़ पड़ा हुआ है. इसी से मिला हुआ था एक विशाल तालाब मुडियार. लेकिन झील के साथ वह भी खत्म हो गया. लखनऊ  में ही स्टेडियम के पास नेशनल कालेज के पीछे एक झील थी चिरैया झील. अब इस झील  का नामोनिशान नहीं बचा है. इस झील को लेकर नगरनिगम ने बंदरियाबाग़ चौराहे पर    एक बोर्ड लगा रखा है. 

बिहार के राज्यपाल लालजी टंडन जब मायावती सरकार में नगर विकास मंत्री थे तो उन्होंने शहर के तमाम इंदारा कुओं की सफाई कराकर उन्हें नया जीवन देने का प्रयास किया था. इंदारा कुओं को लेकर कहा जाता है कि इन कुओं का पानी कभी नहीं सुखता. लेकिन अब  ऐसे कुओं पर भी लोगों की नजर लग गई है. सैकड़ों इंदारा कुओं में कूड़ा फेंक-फेंक कर   सुखा दिया गया. दुखद बात यह है कि झीलों, तालाबों और कुओं को खत्म करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई. इसका नतीजा यह हुआ की आज झीलों व तालाबों पर  हुए कब्जों का असर भू जल स्तर पर भी पड़ा है. भीषण गर्मी के चलते शहर और गांव को लोगों को जल संकट झेलना पड़ रहा है. केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट भी यह बता रही है. 

केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2001 में प्रति व्यक्ति 1816 घन मीटर जल उपलब्ध था. आबादी बढ़ने के और लाखों की संख्या में झीलों, तालाबों तथा कुओं के नष्ट  होने कारण 2011 में यह घटकर 1544 घन मीटर रह गया. भारत में फिलहाल 1123 अरब घन मीटर जल उपलब्ध है. इसमें 433 अरब घन मीटर भूमिगत जल है, जबकि 690 अरब घन मीटर जल नदी, तालाबों और जलाशयों में है. नेशनल कमीशन फॉर इंटीग्रेटेड वाटर रिसोर्सेस डवलपमेंट की एक रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2050 तक देश में जल की मांग 973  से 1180 अरब घन मीटर तक होने का अनुमान है. उस समय जल की 70 फीसदी मांग कृषि, नौ फीसदी घरेलू और सात फीसदी औद्योगिक इस्तेमाल के लिए होगी. आज सिंचाई तथा अन्य उपयोग के लिए भूमिगत जल का भी तेजी से दोहन हो रहा है. दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में कई ऐसे ब्लॉक हैं जहां भूमिगत जल का अति दोहन हुआ है. ऐसे में देश में सभी परिवारों को स्वच्छ पेयजल मुहैया कराना सबसे बड़ी चुनौती होगा. ऐसे में मोदी सरकार की हर घर को जल पहुचाने की योजना पर भी असर पड़ेगा. 

विशेषज्ञ बताते है, कि देश में हर साल प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता घटती जा रही है. वर्ष 2050 में देश में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता घटकर 1140 घन मीटर रह जाएगी, जबकि 2010 में यह 1608.26 घन मीटर थी. देश जब आजाद हुआ था उस समय प्रति व्यक्ति  जल उपलब्धता छह हजार घन मीटर से अधिक थी. आम तौर पर एक व्यक्ति रोजाना     2-4 लीटर पानी पीता है. लेकिन, उसके दो वक्त का भोजन पैदा करने के लिए 2,000 से 5,000 लीटर जल की जरूरत पड़ती है. इसलिए जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है, घरेलू, औद्योगिक और कृषि के लिए पानी की जरूरत भी तेजी से बढ़ती जा रही है. इस जरूरत   को पूरा करने के लिए अब भूजल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है. बोतलबंद पानी का कारोबार करीब 160 अरब रुपये का हो गया है. महानगरों से लेकर गांव-गांव में पैर पसार चुका है. दूसरी ओर देश में लोगों को पेयजल मुहैया कराने वाली झील, तालाब और कुओं पर सरकार और समाज का ध्यान नहीं है. सरकार नये कुएं और तालाब बनाने के बजाये सबमर्सिबल   पंप से पानी पहुचाने वाली योजनाओं पर ध्यान दे रही है, दूसरी तरफ गांव कस्बे और    शहरों में लोग झील,तालाब, कुएं और नदियों को बचाने के लिए किसी भी तरह की ठोस   पहल नहीं कर रहे हैं. ऐसे में जब जलसंकट बढ़ेगा तो उसकी मार सभी को झेलनी होगी,   जैसे कि आज चेन्नई के लोग झेल  रहें हैं.

फोटो -लखनऊ में हाई कोर्ट की नई इमारत जो एक ताल पर बना दी गई 

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