जनादेश

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धुंध और बरसात से घिरा एक बंगला

शंभूनाथ शुक्ल

सुबह जब मैं उठा, तो दूसरी मंज़िल पर बने अपने उस शयन हाल की खिड़की खोली, सामने का दृश्य किसी परीलोक जैसा था. पारदर्शी बादलों की परत सब तरफ छाई थी. नीचे सड़क थी, और सड़क के उस पार कई एकड़ में फैला एक बंगला दिख रहा था, बिलकुल कुमायूं के किसी फार्महाउस जैसा. बंगले के अंदर जो घर था, उसे चारों तरफ से नीले रंग के तिरपाल से ढक दिया गया था. लेकिन ऊपर की छत को नहीं ढका गया था. मालूम हो कि भारी बारिश के चलते यहाँ के हर घर तिरपाल से लपेट दिए जाते हैं. ताकि मकान में चिप-चिप न रहे. मकान की छत खपड़े की थी, जिन पर काई लगी हुई थी. इस बंगले के चारो ओर हरियाली फैली थी. रात की भारी बारिश के निशान कहीं नहीं थे. नमी थी, लेकिन कहीं भी न तो पानी भरा था न कहीं कीचड़. चूंकि ‘दोड्ड-मने’ में चाय की व्यवस्था नहीं थी, इसलिए हम चाय पीने के लिए बाहर निकले. कुछ कदम चलने पर एक तिराहा था, वहां से बाईं तरफ कुछ दूर पर एक बस अड्डा दिखा. वहीँ पर एक ढाबा था, हम उधर ही गए. अलस्सुबह भी वहां खूब भीड़ थी. यह ढाबा एक तरह से अल्पाहार गृह था, खूब बड़ा और साफ़-सुथरा. उसके हाल में तमाम टेबलें लगी थीं, हम एक टेबल पर बैठे औए कॉफ़ी पी गयी. थोड़ी ही देर में बारिश होने लगी. जब बारिश थमी. तब हम बाहर आए. बस अड्डा खूबसूरत था और काफी बड़ा था. एक कोने पर कर्नाटक सरकार की तरफ से शौचालय बना है, जिसका पैसे देकर इस्तेमाल कर सकते हैं. बस अड्डे को साफ़-सुथरा बनाए रखने के लिए यह शौचालय बनाने का आइडिया कमाल का लगा.


हम वापस ‘दोड्ड-मने’ आए और तैयार हुए. तब तक दिल्ली से  ब्रजेन्द्र त्रिपाठी और जमशेद पुर से विजय शर्मा भी आ गईं. नाश्ते के बाद हम लोग सोमेश्वर के जंगल में स्थित ‘स्नैक रिसर्च इंस्टीट्यूट’ गए. यह इंस्टीट्यूट ढाई किमी दूर जंगल में स्थित है, और इसे रोमुलुस व्हाइटकर नाम के एक रेपटाइल विशेषज्ञ ने बनाया है. हम लोग चले, तो बताया गया कि जंगल में कोबरा सांप और लीच (जोंक) से बच कर रहना. साँप तो फिर भी दिख जाएगा, लेकिन जोंक का तो पता नहीं चलता. जोंक चिपक गई, तो वह भरपेट खून चूस कर ही पिंड छोडती है. अभी कुछ ही दूर चले थे, कि बारिश शुरू हो गई, लेकिन हम सब ने रेन कोट पहन रखा था, इसलिए चले गए. घने जंगल के बीच हमें हिरन भी मिले और एक साँप का बच्चा भी. अगुम्बे में सबसे पहले व्हाइटकर ने सबसे पहले 1971 में कोबरा साँप देखा था, तब तक अगुम्बे की ज़मीन संरक्षित नहीं थी, और यहाँ पर खेती होती थी. व्हाइटकर ने ही इस इलाके को अगुम्बे रेन-फोंरेस्ट रिसर्च स्टेशन बनाया और यहाँ की ज़मीन को संरक्षित कर लिया. इस इंस्टीट्यूट में हमने कई साँपों को देखा, और उनकी हरकतों को भी. व्हाइटकर मूल रूप से अमेरिकी हैं, और वहीं इंका जन्म हुआ, बाद ये अपने सौतेले पिता रामा चट्टोपाध्याय के साथ भारत आ गए. इनके पिता कलर फिल्मों की प्रोसेसिंग में माहिर थे. व्हाइटकर को ऐसा माहौल मिला. बाद में व्हाइटकर ने मशहूर पक्षी विशेषज्ञ डॉक्टर सालिम अली की भतीजी से शादी की, और बाद में उन्हें तलाक देकर चेन्नई की जानकी लेनिन से विवाह किया. भारत के जंगलों में सरकने वाले जीव-जन्तु (रेपटाइल) पर उन्होंने बहुत शोध किए हैं. चेन्नई में भी उन्होंने साँपों के लिए रिसर्च इंस्टीट्यूट बनाया हुआ है.  


लौटते में सभी साथियों के पैरों में जोंक चिपकी, सिर्फ अनिल माहेश्वरी, सतीश जायसवाल और मृदुला शुक्ला को छोड़कर, क्योंकि इन लोगों ने रेन-बूट पहन रखे थे. लौट कर आए, तो लंच किया. लंच में भी चावल, कई तरह की सब्जियाँ, चटनियाँ और आम थे. रोटी यहाँ बिलकुल ही नहीं खाई जाती. चूंकि इस 'दोड्ड मने' की मालकिन कस्तूरी अक्का की तबीयत नहीं ठीक थी, इसलिए उन्हें इतने लोगों का भोजन बनाने में दिक्कत हो रही थी. और बिना भोजन कराए वे अपने घर में किसी भी अतिथि को नहीं रोकती थीं, इसलिए हमने वह होम स्टे छोड़ने का एक निर्णय किया. और 'माल्या रेज़िडेन्सी' चले गए. था, तो यह भी होम स्टे जैसा, लेकिन कुछ-कुछ होटल का लुक भी था. मसलन छह बेड वाले हाल में दो बाथरूम और कमरों में जूते-चप्पल ले जाने की इजाजत थी. लेकिन यहाँ भोजन की व्यवस्था नहीं थी, इसलिए हमने सामने स्थित बस अड्डे के ढाबे में भोजन करने की सोची. शाम को हम सन-सेट पॉइंट देखने गए, पर बारिश और कोहरे की परत के कारण न तो सूर्य दिखा न उसका अस्त होना. हम उस पॉइंट पर काफी देर रुके. शाम को चूंकि बस अड्डे वाला ढाबा साढ़े सात बजे बंद हो जाता था, इसलिए सब ने जल्दी ही कुछ इडली बड़ा खा लिया. हालांकि विकास झा जी ने एक अन्य घर में भोजन का बंदोबस्त किया, पर रोटी वहाँ भी नहीं मिल सकी. शाम को एक हाल में सभी की बैठक जुटी और सब ने अपने यात्रा संस्मरण सुनाए.


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