कौन हैं ये राहुल बजाज ,जानते हैं ?

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कौन हैं ये राहुल बजाज ,जानते हैं ?

अरुण कुमार त्रिपाठी

नई दिल्ली .उद्योगपति राहुल बजाज ने मुंबई में इकानमिक टाइम्स के कार्यक्रम में गृहमंत्री अमित शाह, पीयूष गोयल और निर्मला सीतारमन के सामने प्रतिरोध के जिस साहस का परिचय दिया वह अचानक नहीं था. यह वीरता उन्हें अपने पुरखों से विरासत में मिली है. इस बात को भाजपा के आईटी सेल के प्रभारी शायद जानते नहीं या वित्त मंत्री और उनके समर्थकों को इसका भान नहीं है. राहुल बजाज उन जमनालाल बजाज के पोते हैं जिन्हें महात्मा गांधी अपना पांचवां बेटा मानते थे. जमनालाल बजाज सिर्फ बजाज समूह के संस्थापक ही नहीं थे. वे देश के उन उद्योगपतियों में थे जो न सिर्फ आजादी की लड़ाई में चंदा देते थे बल्कि स्वतंत्रता सेनानियों के साथ जेल भी जाते थे. उन्हीं जमना लाल बजाज के बड़े बेटे और राजनेता कमलनयन बजाज के पुत्र हैं राहुल बजाज. ये जो फोटो देख रहें हैं इसमें जमना लाल बजाज के साथ महात्मा गांधी और सुभाष चन्द्र बोस खड़े हैं .यह वह विरासत है जिसने आज राहुल बजाज को बनाया है .वे यूं ही नहीं बोले .

जमनालाल जी के आग्रह पर ही महात्मा गांधी साबरमती छोड़ कर वर्धा रहने गए और फिर वहीं बस गए. जमनालाल जी ने न सिर्फ गांधी की सेवा की बल्कि उनके साथ कांग्रेस पार्टी और देश की सेवा की. वे 1920 में कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य बने और उसी के साथ ही कोषाध्यक्ष भी. फिर वे जब तक जीए कांग्रेस के खजांची बने रहे. आजादी से पहले देश में तीन तरह के उद्योगपति हुए. एक वे जो अंग्रेजों के साथ मिलकर अपना व्यापार करते थे और जिनका आजादी की लड़ाई से कोई वास्ता नहीं था. दूसरे वे जो अंग्रेजों को भी चंदा देते थे और कांग्रेस पार्टी को भी. तीसरे वे जो कांग्रेस के साथ खड़े होकर अंग्रेजों से लड़ाई लड़ते थे और अपना सब कुछ लुटा देने को तैयार रहते थे. जमनालाल जी तीसरी श्रेणी की मिट्टी के बने थे और उन्हीं का रक्त राहुल बजाज की धमनियों में प्रवाहित हो रहा है. शायद इसीलिए उन्हें इस देश से इतना प्यार है और इसके लोकतंत्र की बदलती फिजां का विरोध करने की हिम्मत भी.

जमनालाल बजाज पांच बार जेल गए और सी क्लास में रहकर कष्ट सहा. इतना ही नहीं उन्होंने पत्नी जानकी देवी और बच्चों को भी जेल यात्रा का साथी बना दिया. 1920-22 में जमनालाल बजाज `झंडा सत्याग्रह’ में रायबहादुर की पदवी छोड़ी और जेल गए. जुर्माना नहीं भरा तो उनकी मोटर और बग्घी जब्त कर ली गई. सरकार ने दो बार उनकी नीलामी का प्रयास किया लेकिन कोई उन्हें खरीदने ही नहीं आया. ऐसी थी जमनलाल जी की साख. उन्होंने वर्धा में समाजसेवी संस्थाओं की झड़ी लगा दी. वे गांधी जी के `हरिजन’ वाले काम से जुड़े तो दलित छात्रों के लिए मारवाड़ी छात्रावास के द्वार खोले. वे मुसलमान बच्चों को पढ़ाने के लिए छात्रवृत्ति देते थे और उनकी उपस्थिति के कारण ही वर्धा में कभी हिंदू मुस्लिम दंगा नहीं हुआ. एक बार नागपुर में दंगा हुआ तो मुसलमानों को बचाने गए जमनालाल की जी को गहरी चोट आई. 

उन्होंने गांधी जी के कहने पर अपनी फोर्ड कार आगे से काट डाली और उसमें बैल जोड़कर खिंचवाने लगे. इसीलिए उस कार का नाम आक्सफोर्ड रखा गया. वे देश के ऐसे उद्योगपति थे जो गांधी जी की ट्रस्टीशिप के रास्ते पर चलने को तैयार थे. दुर्भाग्य से उनका निधन 1942 में ही हो गया और देश ने एक वीर और बलिदानी सपूत खो दिया और गांधी जी का आर्थिक क्षेत्र का प्रयोग अधूरा रह गया.

तभी उनके निधन पर गांधी जी ने कहा था, `` उन्होंने मुझे अपना सर्वस्व दे दिया था. उनके पास बुद्धि की तीव्रता और व्यवहार की चतुरता का सुंदर सुमेल था. धन तो कुबेर के भंडार जैसा था. वे किस तरह मेरे पुत्र बन कर रहे सो हिंदुस्तानवालों ने सब कुछ अपनी आंखों से देखा है. मैं कह सकता हूं कि ऐसा पुत्र आज तक किसी को नहीं मिला.’’ 

बजाज परिवार अंग्रेजों से ही नहीं इंदिरा गांधी और संजय गांधी के तानाशाही रवैए से भी भिड़ता रहा है. राहुल बजाज के चाच रामकृष्ण बजाज को पूरे आपातकाल बहुत सताया गया. संजय गांधी चाहते थे कि दिल्ली के मध्य में स्थित युवाओं के प्रशिक्षण के लिए बना अराजनीतिक विश्व युवक केंद्र रामकृष्ण बजाज उन्हें सौंप दें. इसके लिए वे तैयार नहीं थे और बदले की भावना से उनके 114 स्थानों पर आयकर के छापे डाले गए. मई 1976 में बजाज परिवार पर सरकार का दमन चरम पर पहुंचा और उनकी 84 वर्षीय मां और विनोबा भावे की सहयोगी जानकी देवी को भी नहीं बख्शा गया. फिर भी अपने को गांधी का कुली कहने वाले रामकृष्ण बजाज डिगने वाले नहीं थे. वे 1942 से 1946 तक भारत छोड़ो आंदोलन में जेल में रह चुके थे. इसलिए उन्होंने इंदिरा गांधी से संपर्क भी किया लेकिन दमन रुका नहीं. बाद उन्होंन यह मामला शाह आयोग में भी उठाया.  

ऐसे बजाज परिवार के बूढ़े योद्धा राहुल बजाज पर हमलावर होने से पहले सरकार और उसके समर्थकों को जान लेना चाहिए कि वे गांधी की सत्य और सेवा की मजबूत धातु के बने हैं और जल्दी टूटने वाले नहीं हैं.शुक्रवार से 

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